BusinessIndia

​क्या 15 साल पीछे चला गया शेयर बाजार? निफ्टी में ऐतिहासिक गिरावट के संकेत, जानिए क्या कहते हैं आंकड़े

शेयर बाजार में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है. खासकर 2026 में शेयर बाजार ने निवेशकों को कुछ ज्यादा ही परेशान किया है. अब हम सभी साल के आखिरी तीन महीनों में कदम रखने जा रहा है. डर इस बात का है कि शेयर बाजार की ये गिरावट और भी ज्यादा बढ़ सकती है. अगर ऐसा होता है तो निफ्टी बीते 15 बरस के बाद अपनी सबसे बड़ी गिरावट पर खड़ा होगा. साल 2011 में निफ्टी में आखिरी बार 24.6 फीसदी की गिरावट देखने को मिली थी. हम ये बात उस शेयर बाजार के बारे में कर रहे हैं जो बीते कुछ समय पहले दुनिया के टॉप 5 सबसे बड़े बाजारों में से एक था. ग्लोबल झटके इस शेयर बाजार को छू भी नहीं पा रहे थे. अब सबसे बड़े सवाल ये है कि आखिर साल 2026 में ऐसा क्या हुआ, जिसकी वजह से भारत के शेयर बाजार में बड़ी गिरावट देखने को मिली. ऐसी गिरावट जो साल 2011 के रिकॉर्ड को तोड़ती हुई दिखाई दे रही है. आइए आंकड़ों जुबान में इसे समझने की कोशिया करते हैं…

​क्या 15 साल पीछे चला गया शेयर बाजार? निफ्टी में ऐतिहासिक गिरावट के संकेत, जानिए क्या कहते हैं आंकड़े

अब तक निफ्टी में आई कितनी गिरावट

आंकड़ों की भाषा में बात करें तो नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक 13 फीसदी से ज्यादा टूट चुका है. वैसे निफ्टी को सबसे ज्यादा नुकसान कैलेंडर ईयर की पहली तिमाही में हुआ. जब जनवरी से मार्च तक निफ्टी में 15 फीसदी की गिरावट देखने को मिली. उसके बाद निवेशकों को थोड़ी उम्मीद इसलिए जगी क्योंकि दूसरी तिमाही यानी अप्रैल से जून तक में निफ्टी में 7 फीसदी से ज्यादा की रिकवरी देखी गई. लेकिन ये खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाई और जुलाई से सितंबर के बीच निफ्टी में 5 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आ गई. अगर बात अकेले सितंबर की ही करें तो इसी महीने में निफ्टी 5 फीसदी टूट चुका है. यह कमज़ोरी इस साल से भी आगे तक फैली हुई है. सितंबर 2024 के अंत से, निफ्टी में लगभग 12 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है. ब्रॉडर मार्केट के कुछ हिस्से राहत देने वाले रहे हैं. निफ्टी मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स इस साल अब तक बढ़त पर हैं.

एआई की एंट्री और विदेशी निवेशकों की एग्जिट

  1. महंगे शुरुआती वैल्यूएशन, विदेशी निवेशकों की भारी निकासी, जियोपॉलिटिकल झटके, तेल की बढ़ती कीमतें और कमाई में बढ़ोतरी को लेकर चिंता इन सबने मिलकर उस प्रीमियम को धीरेधीरे खत्म कर दिया है जो निवेशक भारतीय इक्विटी के लिए देने को तैयार थे.
  2. विदेशी पैसा सबसे बड़ा दबाव वाला कारण रहा है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने अगस्त में खरीदार के तौर पर लौटने के बावजूद, 2026 में अगस्त तक रिकॉर्ड 24.6 बिलियन डॉलर की भारतीय इक्विटी बेची है.
  3. उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे AIप्रधान मार्केट की ओर गया, जहां सेमीकंडक्टर और टेक्नोलॉजी शेयरों ने कहीं बेहतर रिटर्न दिया.
  4. एनालिस्ट्स का कहना है कि भारत में AI से सीधे फायदा उठाने वाली कंपनियों की सीमित मौजूदगी के कारण, मार्केट पिछले साल के सबसे बड़े ग्लोबल इक्विटी ट्रेड में से एक से बाहर रहा.
  5. सितंबर में फिर से बिकवाली शुरू हो गई. महीने के पहले छमाही में FPIs ने भारतीय इक्विटी से 13,138 करोड़ रुपए निकाले. जिसका सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतें रही, जिसकी वजह से बॉन्ड यील्ड और डॉलर इंडेक्स में उछाल देखने को मिला. तब तक 2026 के लिए कुल विदेशी बिकवाली 2.37 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई थी.
  6. मोतीलाल ओसवाल इस बदलाव के पैमाने को और साफ तौर पर दिखाते हैं. उनका अनुमान है कि विदेशी निवेशकों ने पिछले 24 महीनों में लगभग 56 अरब डॉलर निकाले हैं, जिससे पिछले आठ वर्षों में आया कुल FII निवेश लगभग खत्म हो गया है.
  7. घरेलू संस्थानों ने इस कमी को काफी हद तक पूरा किया है. उन्होंने इसी दौरान रिकॉर्ड 177 अरब डॉलर का निवेश किया, जिसमें म्यूचुअल फंड SIP से हर महीने 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश शामिल है. अगर यह घरेलू पैसा नहीं आता, तो बाजार में गिरावट और भी ज्यादा गंभीर हो सकती थी.

जियो पॉलिटिकल टेंशन और कच्चे तेल की कीमत

दूसरा झटका जियोपॉलिटिक्स से लगा. इस साल की शुरुआत में मिडिल ईस्ट में संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं. यह उस अर्थव्यवस्था के लिए एक मुश्किल स्थिति थी जो अपनी ज़्यादातर तेल जरूरतें आयात करती है.

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से महंगाई, करंट अकाउंट और कंपनियों के मुनाफ़े पर खतरा पैदा हुआ, साथ ही रुपए और बॉन्ड यील्ड पर भी दबाव पड़ा. मार्च में हुई बिकवाली के दौरान, संघर्ष की वजह से ऊर्जा की सप्लाई में रुकावट आने से निफ्टी में एक ही महीने में लगभग 7 फीसदी की गिरावट आई.

सितंबर में भी ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है, जबकि रुपया डॉलर के मुकाबले 9596 के स्तर पर कारोबार कर रहा है. तेल की बढ़ती कीमतों ने महंगाई और ब्याज दरों को लेकर चिंताएं फिर से बढ़ा दी हैं, जबकि निवेशक कंपनियों की कमाई में बेहतर सुधार की उम्मीद कर रहे थे.

भारत के IT सेक्टर ने भी बाजार पर दबाव डाला है. इस साल की शुरुआत में टेक्नोलॉजी शेयरों पर सबसे ज़्यादा असर पड़ा क्योंकि निवेशकों को चिंता थी कि जेनरेटिव AI कीमतों और पारंपरिक आउटसोर्सिंग मॉडल पर दबाव डाल सकता है, साथ ही अमेरिकी क्लाइंट भी खर्च करने में सावधानी बरत रहे थे. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अब तक निफ्टी IT इंडेक्स में 21 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है.

वैल्यूएशन से कुछ राहत

वैसे इस गिरावट ने भारत के वैल्यूएशन प्रीमियम के एक बड़े हिस्से को कम कर दिया है. निफ्टी अब अपनी कमाई के लगभग 20.9 गुना पर कारोबार कर रहा है, जो इसके पांच साल के औसत और 10 साल के औसत से कम है. फॉरवर्ड बेस पर, यह मल्टीपल घटकर लगभग 18.5 गुना हो गया है, जबकि नैस्डैक के लिए यह 31.1 गुना और S&P 500, डॉव, जापान और ताइवान के लिए लगभग 2122 गुना है. मिडकॉप्स में भी नरमी आई है. निफ्टी मिडकैप 150 का P/E दो साल पहले के 45.8 से घटकर 31.1 गुना हो गया है, जबकि स्मॉलकैप 250 का P/E 31.7 गुना है.

क्या बदलेगा निफ्टी का ट्रेंड?

मोतीलाल ओसवाल का मानना ​​है कि सस्ती वैल्यूएशन, कमाई में सुधार, मजबूत घरेलू निवेश और आर्थिक विकास ने मार्केट के रिस्करिवॉर्ड को बेहतर बनाया है. जून तिमाही में निफ्टी कंपनियों की मुनाफे की ग्रोथ औसतन 18 फीसदी तक पहुंच गई है, जो पिछले 10 क्वार्टर में सबसे तेज रफ्तार है. ब्रोकरेज ने कमाई में कटौती के मुकाबले बढ़ोतरी की ज्यादा रिपोर्ट दी है, जिससे कमाई से जुड़ी स्थिति बेहतर हो सकती है.

जेफरीज ने भी पाया है कि विदेशी निवेशकों का सेंटीमेंट धीरेधीरे बेहतर हो रहा है, भले ही ज्यादातर FPI भारत में कम निवेश बनाए हुए हैं. ब्रोकरेज लार्जकैप में फाइनेंशियल्स, खासकर BFSI को काफी आकर्षक मानती है, जबकि निवेशकों की दिलचस्पी पावर, इंफ्रास्ट्रक्चर, नए जमाने की मैन्युफैक्चरिंग और कंज्यूमर इंटरनेट कंपनियों की ओर बढ़ रही है. तेल की कीमतें, महंगाई और ब्याज दरें अभी भी बड़े अहम फैक्टर बने हुए हैं.

कोटक इक्विटीज का नजरिया ज़्यादा सतर्कता वाला है. उसका तर्क है कि ग्लोबल इक्विटी वैल्यूएशन हाई लेवल पर हैं, इसलिए अगर तेल की कीमतें या बॉन्ड यील्ड फिर से बढ़ती हैं, तो निराशा की गुंजाइश कम ही बचती है ये ऐसे रिस्क हैं जो कमाई में हुए सुधार पर तेजी से हावी हो सकते हैं.इसलिए, मार्केट 2026 के आखिरी तीन महीनों में बेहतर कमाई और घरेलू लिक्विडिटी के साथ प्रवेश कर रहा है, लेकिन विदेशी निवेशक अभी तक पूरी तरह से वापस नहीं लौटे हैं, तेल का खतरा बना हुआ है और रुपया दबाव में है.

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply