
आज के समय में जब शहरों में खाना ज्यादातर आधुनिक किचन और रेस्टोरेंट के माहौल में तैयार होता है, वहीं राजस्थान के भीलवाड़ा में एक ऐसी जगह है जहां भोजन का अनुभव बिल्कुल अलग है। यहां खेतों के बीच बैठकर मिट्टी के बर्तनों में तैयार किया गया देसी खाना परोसा जाता है।
खास बात यह है कि इस भोजनालय में इस्तेमाल होने वाली कई सब्जियां और अनाज उसी फार्म पर उगाए जाते हैं। देसी गाय के घी, मिट्टी के बर्तन और पत्तल-दोने में परोसा जाने वाला भोजन इस जगह को पारंपरिक ग्रामीण खान-पान का अनुभव देता है।
10 एकड़ बंजर जमीन को बनाया जैविक फार्म
भीलवाड़ा शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर ओज्यारा गांव में यह फार्म स्थित है। इसे भीलवाड़ा की पूर्वा जिंदल ने विकसित किया है।
पूर्वा ने मुंबई से एमबीए की पढ़ाई करने के बाद अपने परिवार के पारंपरिक कारोबार से अलग खेती और एग्रोटूरिज्म की दिशा में काम करने का फैसला किया। करीब 10 एकड़ बंजर और पथरीली जमीन को उन्होंने धीरे-धीरे खेती के लिए तैयार किया।
साल 2021 से जमीन को उपजाऊ बनाने का काम शुरू किया गया। मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, जीवामृत और नीमास्त्र जैसे प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल किया गया। पानी बचाने के लिए ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग जैसी तकनीकों को भी अपनाया गया।
आज इसी जमीन पर कई तरह की सब्जियां और फसलें उगाई जाती हैं।
खेत में ही उगती हैं कई सब्जियां
फार्म पर मौसम के अनुसार अलग-अलग फसलें तैयार की जाती हैं। इनमें ब्रोकली, गाजर, मूली, फूलगोभी, पत्तागोभी, टमाटर, मटर, तरबूज, भिंडी और स्ट्रॉबेरी जैसी फसलें शामिल हैं।
इन्हीं खेतों में उगाई गई सामग्री से भोजन तैयार करने की कोशिश की जाती है। इससे खेत और भोजन के बीच सीधा जुड़ाव दिखाई देता है।
मिट्टी के बर्तनों में तैयार होता है खाना
पूर्वा ने फार्म हाउस में ही सात्विक भोजन के लिए एक रसोई तैयार करवाई है। यहां खाना पारंपरिक तरीके से मिट्टी के बर्तनों में पकाया जाता है।
भोजन को पत्तल में और दाल-सब्जियों को दोने में परोसने की व्यवस्था है। खेतों के बीच प्राकृतिक वातावरण में बैठकर खाना इस अनुभव को और खास बनाता है।
खाने में देसी गाय के घी का इस्तेमाल किया जाता है। फार्म पर कुछ गिर गाय भी पाली गई हैं, जिनके दूध से घी और छाछ जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं।
मेन्यू में क्या-क्या मिलता है?
यहां का मेन्यू मौसम के हिसाब से बदलता रहता है। उपलब्ध व्यंजनों में मक्के की रोटी, मेथी का पराठा, ब्रोकली-लेटिस सलाद, ताजी पत्तागोभी की सब्जी, हरे टमाटर की सब्जी, मूली का अचार और चुकंदर का हलवा शामिल हैं।
इसके अलावा ऑर्गेनिक दाल, आलू-मटर की सब्जी और गाय के दूध से तैयार छाछ भी परोसी जाती है। देसी घी से बनाया जाने वाला चुकंदर का हलवा भी यहां के खास व्यंजनों में शामिल है।
गायों से लेकर खेत तक जुड़ा है पूरा मॉडल
इस फार्म की एक और खासियत यह है कि यहां खेती और पशुपालन को एक-दूसरे से जोड़ा गया है। फार्म पर पाली गई गायों से मिलने वाले गोबर का इस्तेमाल खाद तैयार करने में किया जाता है, जबकि दूध से छाछ और घी जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं।
फार्म पर उगाई जाने वाली सब्जियां भी भीलवाड़ा शहर में ऑर्डर पर भेजी जाती हैं। यानी यहां सिर्फ भोजन परोसने का काम नहीं है, बल्कि खेती से लेकर खाने की थाली तक एक पूरा स्थानीय मॉडल तैयार किया गया है।
सिर्फ रविवार को मिलता है खेत वाला खाना
अगर कोई व्यक्ति इस खास माहौल में भोजन करना चाहता है तो उसे पहले से योजना बनानी पड़ती है। यहां भोजन हर दिन उपलब्ध नहीं होता। फार्म पर रविवार को भोजन करवाया जाता है।
फार्म पर जाने से करीब दो दिन पहले ऑर्डर देना होता है और कितने लोगों के लिए भोजन चाहिए, इसकी जानकारी पहले से देनी होती है। इससे उसी हिसाब से ताजा भोजन तैयार किया जा सके।
खाना ही नहीं, खेती का अनुभव भी
यहां आने वाले लोगों के लिए अनुभव सिर्फ खाना खाने तक सीमित नहीं रहता। कई लोग खेतों में घूमते हैं, खेती के काम को करीब से देखते हैं और ग्रामीण जीवन का अनुभव लेते हैं।
शहर की भागदौड़ से दूर खेतों के बीच बैठकर मिट्टी के बर्तनों में तैयार पारंपरिक भोजन करना उन लोगों के लिए अलग अनुभव हो सकता है, जो प्राकृतिक माहौल और देसी खान-पान को करीब से महसूस करना चाहते हैं।
भीलवाड़ा का यह फार्म इस बात का उदाहरण है कि खेती को सिर्फ फसल उत्पादन तक सीमित न रखकर उसे भोजन, ग्रामीण अनुभव और एग्रोटूरिज्म से भी जोड़ा जा सकता है। यहां की खासियत खेत में उगी सामग्री, पारंपरिक तरीके से तैयार भोजन और प्रकृति के बीच बैठकर खाने का अनुभव है।


