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​कॉफी डेट, दोस्त नहीं डॉग के साथ, शहरों में क्यों हिट हो रहे पेट कैफे?

कैफे में लोग कॉफी पीते थे और डॉग बाहर इंतजार करता था. अब सीन बदल रहा है. टेबल पर कॉफी के साथ डॉग के लिए ट्रीट है. कहीं उसका बर्थडे सेलिब्रेट हो रहा है, कहीं डॉग आइसक्रीम मिल रही है और कहीं लोग सिर्फ डॉग्स के साथ कुछ घंटे बिताने पहुंच रहे हैं. खासकर उन लोगों के लिए, जो घर में पेट नहीं रख सकते, ये कैफे डॉग के साथ टाइम बिताने का स्पेस बन रहे हैं.

​कॉफी डेट, दोस्त नहीं डॉग के साथ, शहरों में क्यों हिट हो रहे पेट कैफे?

डॉग कैफे अब सिर्फ एक न्यू कॉन्सेप्ट नहीं, शहरों की बदलती पेट लाइफ का हिस्सा हैं.

डॉग अब सिर्फ पेट नहीं, फैमिली मेंबर

ग्लोबल मार्केट रिसर्च कंपनी यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल का डेटा बताता है साल 2025 में भारत में करीब 3.34 करोड़ डॉग्स पालतू आबादी का हिस्सा थे और डॉग रखने वाले घर करीब 2.55 करोड़ थे. जबकि साल 2020 में ऐसे घरों की गिनती 2.07 करोड़ थी. यानी पांच साल में डॉग रखने वाले घरों की संख्या लगातार बढ़ी. इसके साथ ही पेट पर खर्च भी सिर्फ खाने और वैक्सीन तक सीमित नहीं रहा.

स्विगी इंस्टामार्ट के जून 2025 से जून 2026 तक 130 से ज्यादा शहरों के डेटा में पेटकेयर ऑर्डर्स 41% बढ़े. बेंगलुरु में पेट के ट्रीट्स, टॉयज और प्रीमियम प्रोडक्ट्स पर खर्च सबसे ज्यादा रहा. डॉग आइसक्रीम की सर्च 245% बढ़ी और डॉग शैंपू की सर्च में 600% का जंप आया. पेट रखना अब सिर्फ केयर नहीं, एक लाइफस्टाइल बन रहा है.

डॉग कैफे, बस कॉफी नहीं कंपनी भी

बेंगलुरु के थरपप डॉग कैफे जैसे स्पेस में लोग डॉग्स के साथ समय बिताने पहुंचते हैं.साल 2018 से पुणे में द पेट कैफे चला रहे अभिषेक मंत्री बताते हैं शुरुआत खाने के साथ एनिमल एडॉप्शन की अवेयरनेस से हुई थी. बाद में समझ आया कि लोग यहां सिर्फ खाने नहीं, डॉग्स के साथ टाइम बिताने और रिलैक्स करने भी आ रहे हैं. यानी यहां बिकने वाली चीज सिर्फ कॉफी या डॉग ट्रीट नहीं है. कंपनी भी है.

दिल्लीएनसीआर में भी बदल रहा सीन

दिल्ली में डॉग कैफे और डॉगबेकरी जैसे कई छोटे बिजनेस अब दिखाई दे रहे हैं. नोएडा में पप्स एंड कप्स जैसे डॉग कैफे हैं, जहां इंसानों के साथ डॉग्स के लिए भी स्पेस तैयार किया गया है. कुछ जगहों पर डॉग बर्थडे पार्टी, ग्रूमिंग, डॉग केक और एडॉप्शन इवेंट भी कैफे एक्सपीरियंस हो रहे हैं.

दिल्ली में बो बोस डेन, पपीशेफ पेट कैफे, द फर्स्ट पॉ और बार्क ऑन गॉरमेट डॉगी बार्करी भी ऐसी जगहें हैं.

विदेशों में मॉडल और आगे

न्यूयॉर्क का बोरिस एंड हॉर्टन डॉगफ्रेंडली कैफे होने के साथसाथ कम्युनिटी स्पेस और एडॉप्शन इवेंट्स भी करता है. इनके एडॉप्शन इवेंट्स से करीब 3,000 डॉग्स को घर मिल चुका है. यहां कॉफी के साथ एडॉप्शन डे, फंडरेजर और डॉग सेंट्रिक इवेंट्स भी होते हैं. विदेशों में मॉडल सिर्फ कॉफी और डॉग का नहीं. यह कॉफी + कम्युनिटी + एडॉप्शन + पेट एक्सपीरियंस बन चुका है.

क्यों पॉपुलर हैं डॉग कैफे

लोनलीनेस और भागती लाइफस्टाइल इसकी एक वजह हो सकती हैं. नोएडा के ऐसे ही एक कैफे में डॉग लवर सोनाली ने कहा उसे लगता है डॉग्स उसकी सारी नेगेटिविटी सोख लेते हैं. मम्मी के साथ डॉग कैफे गई कसली ने कहा घर में पेट रख नहीं सकते तो यहां आकर मज़ा आता है.

यही इस ट्रेंड का इंटरेस्टिंग फैक्ट है. कुछ लोग हर जगह डॉग को लेकर नहीं जा सकते और कुछ लोग डॉग को घर नहीं ला सकते. इसीलिए ये कैफे दोनों का ही फुलऑन इंटरटेनिंग सॉल्यूशन हैं.

पेट कैफे से पेट इकोनॉमी तक

डॉग कैफे सिर्फ सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं हैं, तेजी से बढ़ता पेट केयर मार्केट भी है. ग्लोबल मार्केट रिसर्च और डेटा एनालिटिक्स कंपनी यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल का डेटा कहता है साल 2025 में भारत में पेट फूड की रिटेल बिक्री 769.7 मिलियन डॉलर रही और भारत में करीब 3.34 करोड़ पेट्स में से 85% डॉग्स थे.

गॉडरेज पेट केयर के हिसाब से भारत का पेट केयर मार्केट साल 6,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2028 तक 10,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. डॉग फूड से डॉग बर्थडे, ग्रूमिंग से कैफे, एडॉप्शन से पेट ट्रैवल तक अब पेट सिर्फ घर का हिस्सा नहीं, एक पूरा लाइफस्टाइल और तेजी से बढ़ता मार्केट बन रहा है. हो सकता है आने वाले समय में कैफे का सवाल बस ये ना हो कि आप क्या खाएंगे? सवाल ये भी हो सकता है आपके डॉग के लिए क्या लाएं?

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