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​तस्वीरों पर फूल, विचारों से दूरी… महात्मा गांधी की सबसे बड़ी विरासत कहां खो गई?

Gandhi Jayanti 2026:दफ्तरोंस्कूलों की ऊंची दीवारों से बापू की तस्वीरें नीचे उतार ली गईं हैं. मेजों पर इन्हें फूल चढ़ाने और माला पहनाने के लिए सजा दिया गया है. जहां प्रतिमाएं हैं, उनकी भी साफसफाई कर दी गई है. जहांतहां उनके प्रिय भजन भी सुनाई दे रहें हैं. चंद घंटे बापू के उन आदर्शों और रास्ते की चर्चा में बीतेंगे, जिन्हें उनकी जिंदगी के आखिरी दिनों में ही भूलना शुरू हुआ और आज तो पूरी तौर पर भुलाया जा चुका है. लेकिन रस्मी तौर पर ही सही. जाने के दशकों बाद भी गांधी रहरह कर देश को याद आ जाते हैं. बिगड़ते सामाजिक तानेबाने, बढ़ती राजनीतिक कटुता और असहिष्णुता के चरम दौर में देश के सार्वजनिक विमर्श में गांधी अनुपस्थिति में भी उपस्थित हैं. फिर जब उनकी चर्चा होगी तो विरासत की बात होगी.

​तस्वीरों पर फूल, विचारों से दूरी… महात्मा गांधी की सबसे बड़ी विरासत कहां खो गई?

ऐसे में सवाल होगा कि उनकी किस विरासत से इस देश ने सबसे ज्यादा मुंह मोड़ा? जवाब होगा असहमति को स्वीकार करने की क्षमता. वह असहमति जिसे लोकतंत्र की आत्मा कहा जाता है.

वैचारिक विरोध बना वैयक्तिक वैमनस्य

आजादी के लगभग आठ दशक बाद आज भारतीय लोकतंत्र में पक्षविपक्ष के रिश्ते किस मुकाम पर हैं? वैचारिक भिन्नता वैयक्तिक वैमनस्य की सीमा तक पहुंच चुकी है. आरोप और पलटवार में भाषा की मर्यादा ताख पर रख दी गई है. सड़कों के तेवरभंगिमाएं संसद में दोहराए और चित्रित किए जा रहे हैं. टेलीविजन डिबेट्स में गुत्थमगुत्था से परहेज नहीं. सोशल मीडिया में गलियों की बौछार है.

जनता मंतर पर GenZ प्रोटेस्ट की तस्वीर. फाइल फोटो

सड़कों पर आक्रोश प्रदर्शनों में GenZ पीढ़ी के लड़केलड़कियों के बोल बेलगाम हैं. रोष के बढ़ते ताप के बीच विवेक और शालीनता गुम हो गए हैं. ऐसे अनेक मौकों पर तीखेतेजाबी भाषणों के बीच जबतब गांधी का हवाला दिया जाता है. क्या गांधी विरोध के इस अंदाज से सहमत होते?

भाषा की हिंसा गांधी को नहीं स्वीकार

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है. लेकिन यह अभिव्यक्ति जब किसी को अपमानित करने, गाली देने या फिर मानवीय गरिमा नष्ट करने का माध्यम बन जाए और हवाले में गांधी को ढाल बनाया जाए तो यह गांधी स्मृति का असहनीय अपमान है. गांधी की अहिंसा शारीरिक हिंसा के निषेध तक सीमित नहीं थी. उन्होंने तो भाषा की हिंसा को भी असहिष्णुता का रूप बताया. गांधी ने लोकतंत्र और असहमति के प्रश्न पर 2 फरवरी 1921 के यंग इंडिया में लिखा, यदि हमें लोकतंत्र की सच्ची भावना विकसित करनी है तो हम असहिष्णु होने का जोखिम नहीं उठा सकते. असहिष्णुता हमारे अपने उद्देश्य में विश्वास की कमी को प्रकट करती है. गांधी इसी लेख में सत्याग्रहियों को चेतावनी देते हैं कि संघर्ष में अधीरता, बर्बरता, उद्दंडता और अनुचित दबाव के लिए कोई जगह नहीं हो सकती.

जंतरमंतर हिंसा के बाद की तस्वीर

संघर्ष में भी मर्यादा का रखा ख़्याल

गांधी जीवन पर्यंत संघर्षरत रहे. लेकिन संघर्ष के दौरान उन्होंने विवेक कभी नहीं खोया. विरोध में भी मर्यादा का कभी अतिक्रमण नहीं किया. उनके लिए संघर्ष के साथ उसकी भाषा और तरीका भी समान महत्व का था. चूंकि देशसमाज गांधी की सीख पर भले न चले लेकिन सार्वजनिकराजनीतिक जीवन में गांधी का बारबार जिक्र हो जाता है, इसलिए हमें याद रखना होगा कि उन्होंने हमेशा इस बात पर बल दिया कि जिस अधिकार का हम दावा कर रहें हैं, वह अधिकार दूसरे का भी है.

26 जनवरी 1922 के यंग इंडिया में उन्होंने लिखा, “अपने स्वतंत्र विचार और स्वतंत्र कर्म के अधिकार का दावा करते हुए हमें वही अधिकार दूसरों को भी देना चाहिए. देश के मौजूदा राजनीतिक वातावरण में गांधी की यह कसौटी परेशान करेगी. सरकार के किसी निर्णय से असहमत होने में कुछ गलत नहीं. विपक्ष के आरोपों से सरकार भी असहमत हो सकती है. किसी नेता के बयान को गलत, भ्रामक या राजनीतिक रूप से अवसरवादी माना जा सकता है. लेकिन क्या असहमति की वजह से वैयक्तिक वैमनस्य और मनभेद की गांधी के देश और लोकतंत्र में कोई जगह हो सकती है?

आजादी के संघर्ष के दौरान महात्मा गांधी ने विवेक कभी नहीं खोया. फोटो: Getty Images

बहुमतअल्पमत दोनों की सीमाएं

लोकतंत्र में बहुमत की ताकत निर्णायक होती है. लेकिन बहुमत की यह ताकत अल्पमत पर बलपूर्वक अपनी जिद थोपे, यह भी गांधी को स्वीकार नहीं था. उन्होंने बहुमत को अल्पमत को चुप कराने की कोशिश की जगह विनम्रता और तर्कसंगत तरीके से समझाने की सीख दी. गांधी ने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को उनकी सीमाएं बताईं. सत्ता को यह याद रखना होगा कि चुनावी बहुमत उसे शासन का अधिकार देता है लेकिन हर विचार पर अंतिम सत्य का अधिकार नहीं.

विपक्ष को भी यह समझना होगा कि सरकार का विरोध लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन जनादेश को नकार देना लोकतंत्र नहीं है. गांधी ने बहुमत के शासन को स्वीकार किया, लेकिन केवल बहुमत को लोकतंत्र का पर्याय नहीं माना. 2 मार्च 1922 के यंग इंडिया में उन्होंने लिखा,” लोकतंत्र ऐसी अवस्था नहीं है जिसमें लोग भेड़ों की तरह एक दिशा में चलते रहें. लोकतंत्र में व्यक्ति की विचार और कर्म की स्वतंत्रता सुरक्षित रहनी चाहिए. अल्पमत को बहुमत से अलग कार्य करने का अधिकार है.” उन्होंने सचेत किया कि जब बहुमत का शासन दबाव डालने वाला बन जाए तो वह नौकरशाही के अल्पमत शासन जितना ही असहनीय हो जाता है.

आजादी के संघर्ष के दौरान उन्होंने विवेक कभी नहीं खोया. फोटो: Getty Images

अंतरात्मा की आवाज सबसे ऊपर

गांधी के सामने सिर्फ सत्ता और विपक्ष के बीच असहमति का सवाल नहीं था. अगर संगठन विशेष में ही असहमति के स्वर हों और यह असहमति उस दल के बहुमत की तुलना में क्षीण हो तो गांधी क्या कहते हैं? उनके लिए अंतरात्मा का प्रश्न बहुमत से भी ऊपर था. 4 अगस्त 1920 के यंग इंडिया में उन्होंने लिखा, “अंतरात्मा के प्रश्नों में बहुमत के कानून का कोई स्थान नहीं.”

गांधी की नज़र में किसी दल में बहुमत की राय जरूरी थी. लेकिन हर असहमति को उन्होंने अनुशासनहीनता नहीं माना. राजनीतिक दलों के भीतर विचारविमर्श की जगह केवल नेतृत्व की राय थोपा जाना गांधी को स्वीकार नहीं था. गांधी विरोधी को सुनने और उसके समझने की सलाह देते हैं. असलियत में गांधी जिस लोकतंत्र में भरोसा करते थे, उसमें विरोधी के अल्पमत में रहने के बाद भी उसके दृष्टिकोण के प्रति पर्याप्त उदारता बरते जाने का सत्ता पक्ष के लिए संदेश है.

महात्मा गांधी के रूप में बेंगलुरु के 62 वर्षीय शंकरप्पा. फोटो: PTI

पारस्परिक सहिष्णुता बहुत जरूरी

असहमत पक्ष के दृष्टिकोण को समझने का गांधी क्यों आग्रह करते थे? 17 अप्रैल 1924 के यंग इंडिया में उन्होंने लिखा,”कोई भी विचारधारा सही निर्णय पर एकाधिकार का दावा नहीं कर सकती.” हम सबसे भूल हो सकती है और हमें अपने निर्णय बदलने पड़ सकते हैं.

गांधी आगे कहते हैं कि इतने विशाल देश में सभी ईमानदार विचारों के लिए जगह होनी चाहिए और कम से कम इतना तो हमारा कर्तव्य है कि हम विरोधी के दृष्टिकोण को समझने की कोशिश करें. स्वीकार न कर सकें तो भी उसका उतना ही सम्मान करें जितना अपने विचार के लिए चाहते हैं. उन्होंने इसे स्वस्थ सार्वजनिक जीवन और स्वराज की योग्यता की अनिवार्य कसौटी माना.

गांधी ने कहा कि पहले विचार सुनिए, फिर व्यक्ति पर राय बनाइए. 23 सितंबर 1926 के यंग इंडिया में गांधी ने पारस्परिक सहिष्णुता को सभ्य समाज का नियम बताया. उनका तर्क था कि हम सभी एक जैसा नहीं सोच सकते और सत्य को अलगअलग कोणों से देखते हैं. इसलिए सभ्य समाज में आचरण का संभव नियम पारस्परिक सहिष्णुता है.यहां गांधी एक महत्वपूर्ण अंतर करते हैं, सहिष्णुता का अर्थ सहमति नहीं है.मैं आपके विचार को पसंद किए बिना भी आपको उसे रखने का अधिकार दे सकता हूं. मैं आपके धर्म, राजनीति, जीवनशैली या विचार से असहमत होकर भी आपकी स्वतंत्रता का सम्मान कर सकता हूं.

बापू का मानना था कि क्रोध को ऐसी शक्ति में बदलें जो दुनिया को गति दे सके. फोटो: PTI

गांधी क्यों प्रासंगिक?

आज के दौर में गांधी क्यों प्रासंगिक हैं? हम गर्व कर सकते हैं कि हमने शासन की सर्वोत्तम प्रणाली लोकतंत्र को अंगीकार किया. 1952 से लगातार चुनावों और शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण का यश और संतोष है. लेकिन कुछ खोया भी है? असहमति के प्रति असहिष्णुता बढ़ी है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भाषा और तेवरों ने मर्यादा खोई है. गांधी आज नहीं हैं. लेकिन उनके विचार हैं. विदेशी सत्ता से संघर्ष के चरम दौर में विरोध में विवेक और अभिव्यक्ति की मर्यादा के अनुपम उदाहरण उन्होंने प्रस्तुत किए. उन्होंने असहयोग आंदोलन किया. ब्रिटिश कानून तोड़े. जेल गए.

साम्राज्यवादी शासन की खुलकर आलोचना की. लेकिन उनका संघर्ष अंग्रेजों से घृणा का अभियान नहीं बना.ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सविनय अवज्ञा की तैयारी के बीच गांधी ने वायसराय लॉर्ड रीडिंग को पत्र लिखा 9 फरवरी 1922 के यंग इंडिया में यह छपा. पत्र में उन्होंने सरकार की नीतियों पर गंभीर ऐतराज किये. राजनीतिक बंदियों की रिहाई और प्रेस की स्वतंत्रता की मांग की. सविनय आंदोलन की चेतावनी दी. लेकिन पत्र का अंत उन्होंने मैं आपका विश्वस्त सेवक और मित्र बना रहता हूं, के साथ किया. अंग्रेजी सत्ता की नीति के कड़े विरोध और इसके विपरीत नतीजों से बेपरवाह गांधी ने लेकिन सत्ता के प्रतिनिधि लॉर्ड रीडिंग के प्रति व्यक्तिगत रूप से सम्मान की भाषा का प्रयोग किया.

गांधी देवता नहीं, एक सच्चे इंसान

गांधी व्यवस्था से संघर्ष करते रहे लेकिन व्यक्ति से घृणा से दूर रहे. गलत नीतियों पर प्रहार किया लेकिन विरोध की मर्यादा को कायम रखा. असहमति से पीछे नहीं हटे लेकिन कटुता को पास नहीं आने दिया. 14 अगस्त 1937 के हरिजन में उन्होंने लिखा, “असहिष्णुता, अशिष्टता और कठोरता अच्छे समाज में वर्जित होनी चाहिए क्योंकि वे लोकतंत्र की भावना के विपरीत हैं.

गांधी के विचार आज के सार्वजनिक जीवन के लिये सीधी चुनौती हैं. सोशल मीडिया के दौर में एक ट्वीट, पोस्ट, वीडियो या टिप्पणी कुछ ही मिनटों में विवाद बन जाती है. गांधी का संयम इस डिजिटल समय में शायद पहले से कहीं अधिक कठिन है. गांधी ने क्रोध को नकारा नहीं, उसे साधने की बात की. गांधी को अक्सर केवल शांत और मुस्कुराते हुए व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. लेकिन गांधी के भीतर भी क्रोध था. अंतर यह था कि वे क्रोध को अपनी भाषा और कर्म का स्वामी नहीं बनने देना चाहते थे.उन्होंने लिखा, अपने क्रोध को संचित करना और उसे ऐसी शक्ति में बदलना, जो दुनिया को गति दे सके.”

गांधी की अहिंसा का अर्थ यह नहीं था कि अन्याय का प्रतिकार न करें. लेकिन सचेत किया था कि अन्याय का विरोध करते समय स्वयं अन्याय का रूप न बन जाएं. उनका जीवन सत्य के प्रयोग के लिए समर्पित रहा. 17 अप्रैल 1924 का उनका कथन कि हमसे भूल हो सकती है. हमें अपने निर्णय बदलने पड़ सकते हैं. यह सिर्फ उनकी आत्मस्वीकृति नहीं, किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए बड़ी पूंजी है.

गांधी को देवता न मानिये. लेकिन एक सच्चे इंसान के तौर पर उनकी सीख गांठ बांधिए पहले सुनो. फिर समझो. फिर असहमत हो. और यदि आवश्यक हो तो विरोध करो. लेकिन विरोध करते समय भी यह संभावना खुली रखो कि शायद पूरी तरह तुम सही नहीं हो.

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