
जैन धर्म में खान-पान से लेकर जीवन जीने तक सादगी और सात्विकता को काफी महत्व दिया जाता है. लेकिन जैन धर्म में दीक्षा लेने की परंपरा भी अपने आप में बेहद खास है. खासकर कुछ जैन समुदायों में दीक्षा से पहले का दृश्य लोगों का ध्यान खींचता है.
दीक्षा लेने वाली लड़कियां इस मौके पर दुल्हन की तरह सजती हैं, अच्छे कपड़े और आभूषण पहनती हैं. इसके बाद जब दीक्षा की प्रक्रिया पूरी होती है, तो यही श्रृंगार और सांसारिक पहनावा पीछे छूट जाता है और वे बेहद साधारण वस्त्रों में आ जाती हैं. आखिर क्या है दीक्षा लेने से पहले श्रृंगार का महत्व जान लें.
वैराग्य से पहले क्यों करते हैं श्रृंगार
जैन धर्म में दीक्षा का अर्थ केवल वस्त्र बदलना नहीं बल्कि यह सांसारिक जीवन से वैराग्य लेकर संयम और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प माना जाता है.
दीक्षा से पहले किया जाने वाला ये श्रृंगार सिर्फ सजने-संवरने की रस्म नहीं बल्कि गृहस्थ जीवन से विदाई को दर्शाता है.
इस समय साधक अच्छे कपड़े और आभूषण पहनकर अपने सांसारिक जीवन को सम्मान के साथ पीछे छोड़ने की तैयारी करता है.
ये सौंदर्य, आकर्षण का आखिरी अनुभव होता है, मेहंदी लगाना ये दर्शाता है कि साधक ने अपने जीवन में समस्त रंगों का अनुभव कर लिया है अब वह मोह-माया से दूर साधारण जीवन को अपनाने जा रहा है.
ये संदेश होता है कि अब ये वस्तुएं उसके जीवन की प्राथमिकता नहीं रहेंगी.
अपरिग्रह का महत्व
जैन दर्शन में अपरिग्रह यानी संग्रह और वस्तुओं के प्रति आसक्ति का त्याग महत्वपूर्ण सिद्धांत है. दीक्षा ग्रहण करने वाला व्यक्ति सांसारिक संपत्ति, पारिवारिक-सामाजिक जीवन और भौतिक मोह से स्वयं को अलग करने का संकल्प लेता है. दीक्षा के बाद साधु-साध्वी जीवन में आवश्यक वस्तुओं तक ही सीमित रहने की परंपरा होती है.
खुशी से सबके सामने लेते हैं संकल्प
दीक्षा समारोह में किया गया श्रृंगार सिर्फ बाहरी सजावट नहीं होता. समुदाय के सामने सजने के बाद जब साधक अपने आभूषण, श्रृंगार और सांसारिक सुख-सुविधाओं को छोड़ता है, तो यह उसके त्याग के संकल्प को सबके सामने दिखाता है. इसके बाद केशलोंच, सादे वस्त्र और संयमपूर्ण जीवन की शुरुआत होती है.
जो बदलाव मन के भीतर आया है, उसे इन परंपराओं के जरिए बाहरी रूप भी दिया जाता है. यही दीक्षा का मूल भाव है. गृहस्थ जीवन को पीछे छोड़कर त्याग, संयम और आत्मअनुशासन के रास्ते पर आगे बढ़ना.



