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राहुल गांधी की ‘गुरिल्ला: पॉलिटिक्स’ की क्यों हो रही चर्चा? अचानक एक्शन से सड़क तक कैसे बदली रणनीति.

राहुल गांधी की ‘गुरिल्ला: पॉलिटिक्स’ की क्यों हो रही चर्चा? अचानक एक्शन से सड़क तक कैसे बदली रणनीति.

नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की हालिया राजनीतिक गतिविधियों में अचानक कार्रवाई, औचक धरना और छोटे समूह के साथ विरोध दर्ज कराने की रणनीति चर्चा में है। कई मौकों पर वह बिना लंबे कार्यक्रम या बड़े जमावड़े के अचानक किसी मुद्दे पर सक्रिय होते नजर आए हैं। कांग्रेस की राजनीति में इसे सरकार के सामने राहुल गांधी की अलग और आक्रामक राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

कभी अचानक धरने पर बैठना, कभी पुलिस थाने की ओर बढ़ना और कभी बिना पहले से बड़े स्तर पर घोषणा किए किसी जगह पहुंच जाना—राहुल गांधी की राजनीति में इस तरह के कदमों की चर्चा बढ़ी है। उनके इन कदमों में एक बात समान दिखाई देती है कि बड़े प्रदर्शन के बजाय सीमित लोगों के साथ सीधे मौके पर पहुंचकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की जाती है।

अचानक एक्शन को बनाया रणनीति का हिस्सा

राहुल गांधी की यह शैली पूरी तरह नई नहीं है। वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश के भट्टा-पारसौल में किसानों के आंदोलन के दौरान भी वह अचानक वहां पहुंचे थे। उस समय उनके इस कदम ने काफी राजनीतिक सुर्खियां बटोरी थीं।

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में उनकी सड़क और जमीनी राजनीति में ऐसे औचक कदमों की आवृत्ति बढ़ी है। उनका फोकस कई बार बड़े कार्यक्रम के बजाय सीधे उस जगह पहुंचने पर दिखाई देता है, जहां कोई राजनीतिक या सामाजिक मुद्दा गर्म हो।

मार्शल आर्ट से राजनीति तक कनेक्शन

राहुल गांधी लंबे समय से मार्शल आर्ट का अभ्यास करते रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी उन्होंने यात्रियों के साथ मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग से जुड़े अभ्यास किए थे।

राहुल गांधी कई मौकों पर यह भी कह चुके हैं कि मार्शल आर्ट ने उन्हें मुश्किल परिस्थितियों में संतुलन और प्रतिक्रिया को लेकर अलग नजरिया दिया है। उनकी राजनीतिक शैली को देखने वाले कुछ लोग उनके इस प्रशिक्षण को उनके आत्मविश्वास और आक्रामक राजनीतिक तेवर से जोड़कर देखते हैं।

धरना और सड़क की राजनीति में फिटनेस भी अहम

सड़क पर लंबे समय तक रहना, लगातार यात्रा करना और धरने जैसे राजनीतिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहना शारीरिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता है। राहुल गांधी अपनी फिटनेस को लेकर भी सार्वजनिक रूप से बात करते रहे हैं और नियमित कसरत को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बताते हैं।

हालांकि, उनकी राजनीतिक रणनीति को केवल फिटनेस या मार्शल आर्ट से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे मुद्दे का चयन, राजनीतिक समय, संगठनात्मक रणनीति और जनता तक संदेश पहुंचाने की कोशिश भी महत्वपूर्ण होती है।

‘अड़ियल तेवर’ या सोची-समझी रणनीति?

हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों में राहुल गांधी कई बार सरकार के खिलाफ सीधे मोर्चे पर उतरते दिखाई दिए हैं। धरने से लेकर पुलिस कार्रवाई का सामना करने और किसी मुद्दे पर मौके पर डटे रहने तक, उनकी शैली में टकराव का संदेश स्पष्ट नजर आता है।

कांग्रेस के भीतर इसे सरकार पर दबाव बनाने और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय नेतृत्व की छवि मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। वहीं राजनीतिक विरोधी इसे आक्रामक या टकराव वाली राजनीति के तौर पर पेश करते हैं।

राहुल गांधी के समर्थकों का तर्क रहा है कि वह कई बार राजनीतिक नफा-नुकसान की गणना से ज्यादा अपने मुद्दे पर टिके रहने को प्राथमिकता देते हैं। यही वजह है कि उनकी मौजूदा राजनीति में अचानक फैसले और मौके पर पहुंचकर विरोध दर्ज कराने की शैली को खास तौर पर नोटिस किया जा रहा है।

‘ब्रैंड मोदी’ के सामने अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश?

राष्ट्रीय राजनीति में राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लंबे समय से स्थापित राजनीतिक छवि है। ऐसे में कांग्रेस की रणनीति में राहुल गांधी को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करने की कोशिश दिखाई देती है, जो सत्ता के स्थापित तौर-तरीकों से अलग सड़क पर उतरकर सीधे संघर्ष करने वाली राजनीति करता है।

एक ओर मोदी की स्थापित और केंद्रीय नेतृत्व वाली राजनीतिक शैली है, तो दूसरी ओर राहुल गांधी की मौजूदा रणनीति में सड़क पर उतरना, अचानक कार्रवाई करना और राजनीतिक टकराव को स्वीकार करना प्रमुखता से दिखाई देता है।

आने वाले समय में यह रणनीति राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए कितना राजनीतिक लाभ लेकर आती है, यह चुनावी राजनीति और जनता की प्रतिक्रिया से तय होगा। फिलहाल ‘गुरिल्ला पॉलिटिक्स’ की चर्चा इस बात का संकेत है कि राहुल गांधी की राजनीतिक शैली में अचानक और सीधे एक्शन को एक अलग पहचान के तौर पर स्थापित करने की कोशिश तेज हुई है।

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