Rupee vs Dollar: भारतीय मुद्रा पर बना दबाव कम करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक लगातार नए उपाय आजमा रहा है. जब भी डॉलर के मुकाबले रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर की तरफ फिसलता है, केंद्रीय बैंक बाजार में दखल देता है. हाल के दिनों में आरबीआई ने रुपये में भारी गिरावट रोकने के लिए सेलबाय स्वैप का रास्ता चुना. इस व्यवस्था के तहत केंद्रीय बैंक हाजिर बाजार में डॉलर बेचता है और साथ ही भविष्य की किसी तारीख पर उसे वापस खरीदने का वादा करता है. ये रणनीति कुछ हद तक कामयाब भी रही और रुपये की तेज गिरावट पर ब्रेक लगा. लेकिन बाजार के जानकारों का मानना है कि इस कदम से एक अनचाही परेशानी भी खड़ी हो गई है. इस दांव की वजह से फॉरवर्ड प्रीमियम में भारी उछाल आ गया है, जिसने विदेशी निवेशकों का पूरा गणित बिगाड़ दिया है.

रुपये को सहारा देने की कोशिश में नया पेंच
बैंकिंग जानकारों के अनुसार, केंद्रीय बैंक का मकसद रुपये को एक मजबूत सहारा देना था. लेकिन फॉरवर्ड प्रीमियम बढ़ने से एक उलटा असर देखने को मिल रहा है. विदेशी फंड्स के लिए रुपये से जुड़ी संपत्तियों को खरीदना अब पहले से काफी महंगा साबित हो रहा है. इसकी मुख्य वजह हेजिंग लागत का अचानक बढ़ जाना है. जब विदेशी निवेशक किसी दूसरे देश में पूंजी लगाते हैं, तो वे अपनी रकम को मुद्रा के उतारचढ़ाव से सुरक्षित रखने के लिए हेजिंग का सहारा लेते हैं.
शिनहान बैंक इंडिया के ट्रेजरी प्रमुख कुणाल सोधानी के मुताबिक, जो विदेशी निवेशक अपनी करेंसी रिस्क को पूरी तरह सुरक्षित रखते हैं, उनके लिए फॉरवर्ड प्रीमियम का बढ़ना लागत में सीधा इजाफा करता है. इससे रुपये में मिलने वाला कुल रिटर्न कम आकर्षक हो जाता है. नतीजा ये होता है कि डेट और पोर्टफोलियो बाजार में आने वाले विदेशी निवेश पर थोड़ा ब्रेक लग सकता है. आंकड़ों पर नजर डालें तो एक साल के डॉलररुपया फॉरवर्ड प्रीमियम की कुल लागत एक महीने से भी कम समय में 7.40 फीसदी से उछलकर 8.65 फीसदी तक पहुंच गई थी. हालांकि गुरुवार को ये थोड़ा घटकर 8.45 फीसदी पर आई, लेकिन विदेशी निवेशकों के लिए अब भी अपनी पूंजी को सुरक्षित रखना काफी खर्चीला बना हुआ है.
विदेशी निवेशकों के लिए बढ़ता खर्च बना सिरदर्द
फॉरवर्ड प्रीमियम के इस तरह चढ़ने का असर सिर्फ विदेशी फंड्स तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पूरे बाजार का मिजाज बदल रहा है. कुणाल सोधानी का कहना है कि मौजूदा माहौल में सबसे बड़ा असर हेजिंग के तरीके पर दिख रहा है. प्रीमियम ज्यादा होने पर निर्यातकों को भविष्य के लिए अपने डॉलर बेचने का प्रोत्साहन मिलता है. इसके उलट, आयातकों और कर्ज लेने वालों के लिए फॉरवर्ड हेजिंग काफी महंगी हो जाती है.
आयातकों की लागत बढ़ने से बाजार में डॉलर की मांग को लेकर दबाव महसूस होने लगता है. दूसरी तरफ, रुपये की स्थिति भी बेहद नाजुक बनी हुई है. गुरुवार के कारोबारी सत्र में रुपया 96.68 के स्तर पर मजबूती के साथ खुला था. लेकिन दोपहर होतेहोते कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से इस पर फिर दबाव दिखने लगा. कारोबार के अंत में रुपया थोड़ा कमजोर होकर 96.79 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जबकि बुधवार को ये 96.7750 पर था. रुपया अब भी अपने रिकॉर्ड निचले स्तर 96.96 के बेहद करीब बना हुआ है, जिससे सेंट्रल बैंक की चिंताएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं.
सस्ते घरेलू कर्ज से डॉलर बाहर जाने का नया खतरा
इस पूरी प्रक्रिया का एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है, जो देश से डॉलर बाहर जाने की नई वजह बन सकता है. देश की बड़ी कंपनियां, जिनका कारोबार विदेशों में भी फैला है, वे अब विदेशी बाजारों के बजाय भारतीय बाजार से कर्ज जुटाना ज्यादा पसंद कर रही हैं. बैंकिंग अधिकारियों का कहना है कि भारतीय कंपनियों के लिए देश के भीतर रुपये में कर्ज लेना और फिर उसे डॉलर में बदलकर विदेशी कामकाज में इस्तेमाल करना काफी सस्ता पड़ रहा है.
विदेशी बाजारों में ब्याज दरें काफी ऊंची हो चुकी हैं. अगर भारत की कोई बेहतरीन रेटिंग वाली कंपनी विदेश से तीन साल का कर्ज लेती है, तो उसे लगभग 5.50 फीसदी की दर पर पैसा मिलता है. लेकिन जब उसमें करीब 3.25 फीसदी की हेजिंग लागत जुड़ती है, तो ये कर्ज 9 फीसदी से भी ऊपर चला जाता है. इसके विपरीत, वही कंपनी अगर भारत में 7.75 फीसदी के आसपास तीन साल का कर्ज लेती है, तो उसे डॉलर में स्वैप करने की लागत बहुत कम आती है. इस वजह से देश से डॉलर बाहर ले जाना ज्यादा मुफीद साबित हो रहा है. जब कंपनियां ऐसा करती हैं, तो रुपये पर दबाव और ज्यादा बढ़ जाता है.



