India

​मुलायम की विरासत, अखिलेश का इम्तिहान, 2027 का UP चुनाव सपा के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव को 2012 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पद अपनी खुशी से सौंपा था. 2017 में अखिलेश ने उनसे टकरा कर समाजवादी पार्टी पर नियंत्रण हासिल किया. फिर पिता पीछे हटे. पुत्र की राह आसान की. पार्टी को टूट से बचाया. दशकों की मेहनत से तैयार वोट बैंक को संजोए रखा. मुलायम के जीवनकाल में अखिलेश की अगुवाई में 2017 और 2022 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव लड़े गए.

​मुलायम की विरासत, अखिलेश का इम्तिहान, 2027 का UP चुनाव सपा के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

2017 का झटका तगड़ा था. सत्ता खो दी. विधायक सिर्फ 41 रह गए. 2022 में भी सत्ता दूर रही. लेकिन 111 सीटों पर जीत ने पार्टी को राहत दी. 2019 में लोकसभा की 5 सीटें बरकरार रहीं. लेकिन 2024 में यह 37 पर पहुंच गई. जाहिर है कि इसने पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ाया. 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में लगी सपा सरकार बनाने के दावे के साथ मैदान में उतर रही है.

फिर मुलायम मान गए

मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी को लम्बे जमीनी संघर्ष, सामाजिक समीकरणों और संगठनात्मक पकड़ के सहारे खड़ा किया था. जनवरी 2017 में पार्टी के भीतर वर्चस्व की लड़ाई में अखिलेश यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए थे. शुरुआत में लगा कि पार्टी टूट जाएगी. लेकिन मुलायम पीछे हट गए. यदाकदा पार्टी मुख्यालय जाते रहे. पर फैसलों में उनकी कोई दख़ल नहीं रह गई.

उत्तर प्रदेश की राजनीति करते हुए मुलायम सिंह यादव ने देश की राजनीति में बड़ा कद बनाया. फोटो: Getty Images

नेतृत्व में यह बदलाव मुलायम को मंजूर नहीं था. यह लड़ाई पिता पुत्र के बीच की थी. पिता ने सिर्फ पार्टी नहीं बनाई थी. उसके लिए मजबूत वोट बैंक भी तैयार किया था. उत्तराधिकार में यह सब पुत्र को ही मिलना था. लेकिन पिता अपनी जिंदगी में उस पर पकड़ बनाए रखना चाहते थे. दूसरी तरफ पार्टी बचाने के लिए पुत्र को पिता का रिटायरमेंट जरूरी लगता था. थक हार कर पिता मान गए थे. पिता के मुक़ाबले अखिलेश की इस जीत के बाद सवाल हुआ था कि क्या वे उस राजनीतिक पूंजी को संभाल पाएंगे जिसे मुलायम ने दशकों में अर्जित किया था?

2017: पिता की असहमति, बेटे का असफल प्रयोग

परिवार की लड़ाई में अखिलेश यादव जीत गए थे. वोटरों के बीच इस जीत पर मोहर लगवानी थी. 2017 के विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव उपस्थित रहते हुए भी अनुपस्थित थे. कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर मुलायम सिंह यादव की असहमति जगजाहिर थी. लेकिन अखिलेश ने गठबंधन का रास्ता चुना. नतीजे निराशाजनक थे. 2012 में 224 विधानसभा सीटें जीतने वाली सपा 2017 में केवल 47 पर सिमट गई.

कांग्रेस को सात सीटें मिलीं. भाजपा ने 312 सीटों पर जोरदार जीत के साथ सरकार बना ली. इस हार को सिर्फ कांग्रेस से गठबंधन का परिणाम मानना मुनासिब नहीं होगा. एंटी इनकंबेंसी और अन्य कारणों की भी भूमिका थी. 2014 के लोकसभा चुनाव की जबरदस्त कामयाबी बाद भाजपा के हौसले बढ़े हुए थे. केंद्र में उसकी सरकार रहने के कारण राज्य में कुछ कर दिखाने के उसके वायदे ने वोटरों को लुभाया. वजहें और भी हो सकती हैं. लेकिन संदेश यही गया कि मुलायम के बिना अखिलेश के लिए आगे का सफ़र खासा चुनौतीपूर्ण होगा.

अखिलेश यादव. फोटो: PTI

2019: घाटे का सौदा

2019 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने बसपा के साथ हाथ मिला कर चौंकाया. 1995 के गेस्ट हाउस कांड के बाद से मुलायममायावती के रिश्ते बेहद तल्ख थे. लेकिन 2014 और 2017 की हार के बाद सपा और बसपा दोनों ही अकेले भाजपा से मुकाबले को मुनासिब नहीं मान रहे थे. उन्हें 1993 की वो कामयाबी याद थी, जब उनके गठबंधन ने राम लहर में भी भाजपा की राह रोक दी थी. मुलायम सिंह फिर भी गठबंधन की हिमायत में नहीं थे. सिर्फ जीत का प्रश्न नहीं था. उन्हें गठबंधन की स्थिरता पर भी संदेह था. लेकिन निर्णायक स्थिति में अखिलेश यादव थे.

उन्हें उम्मीद थी कि सपा के यादवमुस्लिम आधार और बसपा के दलित जनाधार का मेल भाजपा को पस्त कर देगा. कामयाबी आंशिक रही. बड़ा फायदा बसपा के हिस्से में गया. वह शून्य से दस पर पहुंच गई. सपा पांच पर ही अटकी रही. चुनाव के बाद बसपा ने सपा पर अनेक आरोप मढ़ते हुए गठबंधन खत्म कर दिया. मुलायम सिंह यादव की राय को दूसरी बार नजरअंदाज करने का अखिलेश यादव का फैसला सपा के लिए घाटे का सौदा रहा.

बसपा सुप्रीमो मायावती.

2022 ने दी राहत, 2024 ने दिया हौसला

2022 के विधानसभा चुनाव सपा को राहत देने वाले रहे. बेशक इस चुनाव में भी सत्ता दूर रही लेकिन 2017 की 47 सीटों की तुलना में 111 पर जीत ने संदेश दिया कि अखिलेश पिता मुलायम सिंह की विरासत सुरक्षित रख सकते हैं. इस चुनाव में सपा ने छोटे और क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया. भाजपा 255 सीटें जीतकर फिर सरकार बनाने में सफल रही. लेकिन 2017 की तुलना में उसकी 57 सीटें कम हुईं.

एक संदेश यह भी था कि सपा अपने समर्थन को दोबारा संगठित कर सकती है. इसने अखिलेश की स्थिति मजबूत की. समर्थकों को भरोसा दिया कि वे सत्ता में वापस आ सकते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के नतीजों ने अखिलेश यादव का कद और बड़ा किया. एक बार फिर उन्होंने कांग्रेस को साथ लिया. पिछड़े, दलित तथा अल्पसंख्यक—पीडीए का नया चुनावी रसायन पेश किया. संविधान को खतरे में बताया. फार्मूला हिट रहा. राज्य की 80 लोकसभा सीटों में सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं. भाजपा 33 सीटों पर सिमट गई. 2019 की सपा की पांच सीटें 2024 में 37 पर पहुंच गईं. इस कामयाबी ने 2027 के लिए सपा को बड़ा हौसला दे दिया.

2017 की 47 सीटों की तुलना में 2022 के चुनाव में 111 सीटों पर जीत ने संदेश दिया कि अखिलेश पिता मुलायम सिंह की विरासत सुरक्षित रख सकते हैं.

कांग्रेस से गठबंधन अपनी शर्तों पर

केंद्र में भाजपा विरोधी खेमे में सपा की भूमिका एक सहयोगी की रहती है. उत्तर प्रदेश उसकी राजनीतिक जमीन और ताकत का मुख्य स्रोत है. सत्ता से दूर रहते हुए भी वह इस राज्य में भाजपा के मुख्य प्रतिद्वंदी के तौर पर सत्ता की दावेदार है. 2017 में पारिवारिक कलह के बीच अखिलेश चुनाव मैदान में उतरे थे. 2022 तक पिता साथ हो चुके थे. लेकिन चाचा शिवपाल यादव दूर थे. 2027 के मुकाबले में जाते समय सैफई कुनबा एकजुट है. परिवार ने पूरी तौर पर अखिलेश के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है.

दो बार की लगातार सरकार के कारण भाजपा को सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना पड़ सकता है. सपा 2017 और 2019 के झटकों के बाद संभली है. दूसरी ओर राज्य की तीसरी बड़ी राजनीतिक ताकत बसपा लगातार पिछड़ती जा रही है. कांग्रेस अपने बूते अभी तक खड़ी नहीं हो सकी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के सहयोग से उसे राज्य की छह सीटों पर जीत मिली.

गैर भाजपाई वोटों का बिखराव रोकने के लिए सपा एक बार फिर कांग्रेस को साथ लेना चाहेगी, लेकिन अपनी शर्तों पर. कांग्रेस गठबंधन में 150 सीटों की उम्मीद लगाए है. दूसरी ओर अखिलेश यादव ने राहुल गांधी के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली से अपने चुनावी अभियान की जोरदार शुरुआत करके कांग्रेस को याद दिलाया कि वहां उसकी बड़ी जीत सपा के सहयोग से ही मुमकिन हुई.

भाजपा से सीधे मुकाबले में

उत्तर प्रदेश की राजनीति करते मुलायम सिंह यादव ने देश की राजनीति में बड़ा कद बनाया. अखिलेश यादव को पिता के श्रमसंघर्ष से खड़ी संगठित पार्टी प्राप्त हुई. उससे भी अधिक एक मजबूत वोट बैंक हासिल हुआ. मुलायम सिंह यादव ने जाति की राजनीति के आरोपों और मुल्ला मुलायम के खिताबों से बेपरवाह रहते हुए इसे संजोया. मुलायम सिंह यादव की पुण्यतिथि के मौके पर सवाल हो सकता है कि क्या अखिलेश ने उनकी राजनीतिक विरासत हासिल कर ली? विधानसभा और लोकसभा की सीटें और पार्टी का वोट प्रतिशत क्या कहता है?

मुलायम सिंह को 2012 में सबसे बड़ी कामयाबी मिली, जब सपा ने 29.15 प्रतिशत वोटों के साथ 224 सीटों पर जीत कर उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. लोकसभा में उनके दौर में अधिकतम 36 सीटें 2004 में प्राप्त हुईं. अखिलेश के नेतृत्व में 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में पार्टी को 111 सीटें प्राप्त हुईं. यह 2012 की तुलना में आधी से एक कम हैं. लेकिन 2022 की तुलना में वोट प्रतिशत लगभग तीन प्रतिशत अधिक 32.06 रहा.

2024 के लोकसभा चुनाव में मिली 37 सीटें, पार्टी का अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. हर चुनाव का माहौल और समीकरण जुदा होते हैं. लोकसभा और विधानसभा चुनाव में वोटर अलग राह पकड़ते नज़र आते हैं. लेकिन पिछले नतीजे पार्टियों को सीख और हौसला दोनों देते हैं. चुनाव में अभी कुछ महीने की देर है. फिलहाल का माहौल भाजपा और सपा के बीच मुकाबले का है.

contact.satyareport@gmail.com

Leave a Reply