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29 साल तक कोर्ट के चक्कर ‘काटते रहे दो दोस्त, जवानी में लगा ठगी का आरोप आखिरकार धुला’; अधूरा रह गया सेना में जाने का सपना

29 साल तक कोर्ट के चक्कर ‘काटते रहे दो दोस्त, जवानी में लगा ठगी का आरोप आखिरकार धुला’; अधूरा रह गया सेना में जाने का सपना

कभी दोनों दोस्त सेना में भर्ती होने का सपना देखते थे। सुबह दौड़ लगाना, सेहत बनाना और देश की सेवा करने की तैयारी करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। लेकिन साल 1997 में दर्ज एक मुकदमे ने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। ठगी के आरोप में फंसे इन दोनों दोस्तों को अदालत की तारीखों के बीच अपनी जिंदगी के 29 साल गुजारने पड़े। आखिरकार फैसला आया और दोनों को दोषमुक्त कर दिया गया। राहत तो मिली, लेकिन जवानी में देखा गया सेना में जाने का सपना अब बीते वक्त की कहानी बन चुका था।

स्कूटर से निकले थे, पुलिस ने दर्ज कर दिया मुकदमा

यह मामला 2 जुलाई 1997 का है। उस समय दोनों दोस्त बरेली कॉलेज में बीए प्रथम वर्ष के छात्र थे। विक्रम सिंह अपने दोस्त गोपालकृष्ण शर्मा के साथ स्कूटर से मनोरंजन सदन की ओर निकले थे। रास्ते में पुलिस चेकिंग चल रही थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने दोनों को रोका और तलाशी के बाद कोतवाली ले गई। उन पर आरोप लगाया गया कि वे 50-50 रुपये के नोटों के बीच सफेद कागज के टुकड़े लगाकर लोगों के साथ ठगी करते थे। इसी आरोप में उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ और अदालत में पेश किए जाने के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया।

बाद में पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया और कुछ समय बाद दोनों को जमानत मिल गई। लेकिन जेल से बाहर आने के बावजूद मुकदमे का बोझ उनके साथ बना रहा।

तारीख पर तारीख, गुजरते गए जिंदगी के साल

मुकदमा शुरू होने के बाद दोनों दोस्तों को बार-बार अदालत जाना पड़ता था। हर सुनवाई के साथ उन्हें उम्मीद रहती कि शायद अब मामला खत्म हो जाएगा, लेकिन कानूनी प्रक्रिया लंबी खिंचती चली गई।

इस दौरान उनकी उम्र बढ़ती गई और जिंदगी की जिम्मेदारियां भी बदलती गईं। जिस उम्र में वे अपने करियर की नींव रख सकते थे, उस उम्र का बड़ा हिस्सा मुकदमे की चिंता और अदालत के चक्कर काटने में बीत गया।

रिपोर्ट के अनुसार, उनके अधिवक्ता राहुल उपाध्याय ने बताया कि सुनवाई के दौरान पुलिसकर्मी गवाही देने के लिए अदालत में उपस्थित नहीं हुए। कई अवसर दिए जाने के बावजूद पर्याप्त गवाही और साक्ष्य पेश नहीं किए गए।

सेना में जाने का सपना रह गया अधूरा

दोनों दोस्तों के लिए इस मुकदमे का सबसे बड़ा दर्द केवल अदालतों के चक्कर नहीं थे, बल्कि वह सपना भी था जिसे वे पूरा करना चाहते थे। दोनों सेना में भर्ती होना चाहते थे। इसके लिए वे सुबह दौड़ लगाते और अपनी शारीरिक तैयारी करते थे।

लेकिन मुकदमे और उससे जुड़ी परिस्थितियों ने उनके जीवन पर गहरा असर डाला। विक्रम सिंह के मुताबिक, उस समय उनके सामने अपनी बेगुनाही साबित करने की चुनौती थी। परिवार और समाज के सामने भी उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

समय के साथ जिंदगी चलती रही। विक्रम सिंह वाहन चालक बन गए, जबकि गोपालकृष्ण शर्मा एक फर्म में नौकरी करने लगे। दोनों ने परिवार बसाया और अपनी जिम्मेदारियां निभाईं, लेकिन 29 साल पुराने मुकदमे का अंत अब जाकर हुआ।

29 साल बाद अदालत से मिली राहत

मामले की सुनवाई बाद में त्वरित न्यायालय में पहुंची। रिपोर्ट के मुताबिक, गुरुवार को सिविल जज (सीनियर डिवीजन) त्वरित न्यायालय की न्यायाधीश अंकिता चौधरी ने दोनों दोस्तों को दोषमुक्त कर दिया।

फैसले के बाद दोनों के चेहरों पर राहत दिखाई दी। अब उन्हें मुकदमे की अगली तारीख के लिए अदालत पहुंचने की चिंता नहीं रहेगी। हालांकि, 53 साल के विक्रम सिंह और 55 साल के गोपालकृष्ण शर्मा के लिए यह राहत उन वर्षों को वापस नहीं ला सकती, जो मुकदमे के दौरान गुजर गए।

न्याय मिला, लेकिन बीते साल वापस नहीं आएंगे

इस कहानी का अंत अदालत से राहत मिलने के साथ हुआ, लेकिन दोनों दोस्तों की जिंदगी में बीते 29 साल हमेशा एक कड़वी याद बनकर रहेंगे। जिस समय वे सेना में भर्ती होकर अपना भविष्य बनाना चाहते थे, उस समय उन पर लगे आरोपों ने उनके रास्ते मुश्किल कर दिए।

अब अदालत के फैसले के बाद दोनों को दोषमुक्त कर दिया गया है। उनके लिए यह केवल मुकदमे का अंत नहीं, बल्कि लंबे समय से साथ चल रहे आरोप के बोझ से राहत भी है।

डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया है। मामले से जुड़े घटनाक्रम और अदालत के फैसले का विवरण संबंधित रिपोर्ट में दी गई जानकारी पर आधारित है।

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