भारत की नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी ने कैंसर के इलाज में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली 137 दवाओं के ट्रेड मार्जिन को MRP के 30 प्रतिशत तक सीमित कर दिया है. नई कीमतें 9 नवंबर से लागू होंगी. 137 दवाओं की यह सूची केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक विशेषज्ञ समिति द्वारा सुझाई गई है. इसमें एटेजोलिज़ुमैब , बेवासिज़ुमैब , डाराटुमुमैब , एन्ज़ालुटामाइड , एर्लोटिनिब , इपिलिमुमैब और लैपाटेनिब जैसी व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली दवाएं शामिल हैं.

इम्यूनोथेरेपी दवा ‘कीट्रूडा’ को इस सूची में शामिल नहीं किया गया है. ट्रेड मार्जिन पर 30% की यह सीमा, जिसकी गणना GST को छोड़कर अधिकतम खुदरा मूल्य के आधार पर की गई है, स्टॉकिस्ट या वितरक को मिलने वाली कीमत पर 42.86% के मार्कअप के बराबर है. NPPA ने कहा कि यह सीमा दवा की शक्ति, उसके रूप या उसे लेने के तरीके की परवाह किए बिना लागू होगी. इसमें वे दवाएं भी शामिल हैं जो अन्य दवाओं के साथ मिलाकर बनाई गई हैं.
कम करनी होंगी दवा की कीमतें
मंजूर की गई व्यवस्था के तहत, संशोधित MRP की कैलकुलेशन मार्च 2026 के लिए स्टॉकिस्ट या डिस्ट्रीब्यूटर को दी गई कीमत को आधार मानकर की जाएगी. जिन दवाओं की उस महीने कोई बिक्री नहीं हुई है, उनकी कीमत की कैलकुलेशन अप्रैल 2025 से मार्च 2026 तक के बिक्री डेटा के आधार पर की जाएगी. इस कैलकुलेशन में सरकारी बिक्री को शामिल नहीं किया जाएगा. जो मेकर नई तय की गई MRP से अधिक कीमत पर दवाएं बेच रहे हैं, उन्हें कीमतें घटाकर निर्धारित स्तर तक लानी होंगी. NPPA ने कहा कि अगर मौजूदा MRP पहले से ही कम है, तो उसे वैसा ही बनाए रखना होगा. यह आदेश अगले निर्देशों तक लागू रहेगा. साथ ही, निर्माता DPCO के तहत मिलने वाली सालाना मूल्य वृद्धि का लाभ उठा सकते हैं, बशर्ते वे ट्रेडमार्जिन की सीमा का पालन करें.
इन पर भी लागू होगी व्यवस्था
यह आदेश 31 मार्च 2026 के बाद लॉन्च किए गए उन फॉर्मूलेशन पर भी लागू होता है, जिनमें सूची में शामिल कोई भी दवा मौजूद हो. जहां मेकर्स सीधे अस्पतालों या चिकित्सा संस्थानों को दवाएं सप्लाई करते हैं, वहाँ MRP की कैलकुलेशन के लिए इन संस्थानों को स्टॉकिस्ट या डिस्ट्रीब्यूटर माना जाएगा, और इसके लिए मेकर्स के इनवॉइस डेटा का उपयोग किया जाएगा. प्राधिकरण ने मेकर्स को निर्देश दिया है कि वे दवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अपने मौजूदा उत्पादन स्तर को बनाए रखें. बैठक के मिनट्स के अनुसार, यदि कोई मेकर अपने औसत मासिक प्रोडक्शन लेवल को कम करना चाहता है, तो उसे पहले NPPA से अनुमति लेनी होगी. जो निर्माता उत्पादन या आयात बंद करना चाहते हैं, उन्हें कम से कम छह महीने पहले निर्धारित जानकारी देनी होगी.
विस्तृत रिकॉर्ड रखना होगा
NPPA ने मेकर्स के ‘पेशेंट असिस्टेंस प्रोग्राम’ के तहत मरीजों को फ्री दी जाने वाली दवाओं की मात्रा के लिए कुछ छूट दी है. हालांकि, इस छूट का लाभ उठाने के लिए मेकर्स को एक अंडरटेकिंग देनी होगी और मरीजों, प्रिस्क्रिप्शन, दवाओं की सप्लाई और उनकी खपत का विस्तृत रिकॉर्ड रखना होगा. प्राधिकरण और जानकारी मांग सकता है, ऑडिट या निरीक्षण कर सकता है, और यह जांच सकता है कि आदेश का पालन हो रहा है या नहीं.
नियमों का पालन न करने पर यह छूट वापस ली जा सकती है. आदेश के ‘ऑफिशियल गजट’ में प्रकाशित होने के सात दिनों के भीतर, मेकर्स को NPPA और संबंधित राज्य ड्रग कंट्रोलर को संशोधित MRP की जानकारी देनी होगी, भले ही MRP में कोई बदलाव न हुआ हो. उन्हें ‘इंटीग्रेटेड फार्मास्युटिकल डेटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम’ के माध्यम से निर्धारित प्राइस लिस्ट भी जारी करनी होगी और आवश्यकतानुसार इसकी कॉपीज राज्य ड्रग कंट्रोलर, डीलर्स और अन्य संबंधित पक्षों को देनी होंगी.
वर्ना लिया जाएगा एक्शन
यदि आवश्यक जानकारी नहीं दी जाती है, तो इसे ऐसा माना जाएगा कि MRP कम नहीं की गई है. ऐसी स्थिति में, DPCO के तहत अधिक वसूली गई राशि की रिकवरी के लिए कार्रवाई की जा सकती है. अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों, जो कैंसररोधी दवाओं की सप्लाई में एक बड़ा हिस्सा रखते हैं, से कहा गया है कि वे MRP पर नजर रखें और किसी भी उल्लंघन की रिपोर्ट NPPA को दें. राज्य ड्रग कंट्रोलर यह सुनिश्चित करेंगे कि निर्माता, डीलर, अस्पताल और चिकित्सा संस्थान इन नियमों का पालन कर रहे हैं.



