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दिल्ली के कनॉट प्लेस का क्या है इतिहास? अंग्रेजों के दौर में कैसा था राजधानी का यह मशहूर बाजार

दिल्ली के कनॉट प्लेस का क्या है इतिहास? अंग्रेजों के दौर में कैसा था राजधानी का यह मशहूर बाजार

नई दिल्ली: कनॉट प्लेस को आज दिल्ली का दिल कहा जाता है। यहां बड़े-बड़े शोरूम, रेस्तरां, ऐतिहासिक इमारतें और सेंट्रल पार्क लोगों को आकर्षित करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कभी इस इलाके में गांव, झाड़ियां और खुले मैदान हुआ करते थे? ब्रिटिश शासन के दौरान इसे एक भव्य बाजार के रूप में विकसित किया गया था। समय के साथ कनॉट प्लेस न केवल व्यापार का प्रमुख केंद्र बना, बल्कि सामाजिक गतिविधियों और जन आंदोलनों से भी जुड़ गया।

हाल ही में दिल्ली के कनॉट प्लेस में प्रस्तावित राजनीतिक मार्च से पहले कुछ लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबरों के बीच इस ऐतिहासिक इलाके की चर्चा फिर शुरू हुई। आइए जानते हैं कि कनॉट प्लेस कैसे बना और अंग्रेजों के जमाने में यहां का माहौल कैसा था।

1929 में शुरू हुआ था निर्माण

दिल्ली के कनॉट प्लेस का निर्माण वर्ष 1929 में शुरू हुआ और 1930 के दशक की शुरुआत में यह बाजार आकार लेने लगा। इसकी योजना नई दिल्ली को ब्रिटिश भारत की राजधानी के रूप में विकसित करने के व्यापक प्रयास का हिस्सा थी। वर्ष 1911 में ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की थी।

कनॉट प्लेस के विकास से पहले इस क्षेत्र में माधवगंज, जयसिंहपुरा और राजा का बाजार जैसे पुराने गांव और बस्तियां मौजूद थीं। आसपास खुले मैदान और झाड़ियों वाले इलाके भी थे। नई राजधानी के निर्माण के साथ इस क्षेत्र का स्वरूप बदलने लगा और यहां एक व्यवस्थित व्यावसायिक केंद्र बनाया गया।

किसने किया कनॉट प्लेस का डिजाइन?

कनॉट प्लेस का डिजाइन ब्रिटिश वास्तुकार रॉबर्ट टोर रसेल ने तैयार किया था, जबकि इसके निर्माण में ठेकेदार सरदार शोभा सिंह की अहम भूमिका रही। इस बाजार का नाम प्रिंस आर्थर, ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर रखा गया था, जो ब्रिटिश शाही परिवार के सदस्य थे।

इसकी वास्तुकला पर इंग्लैंड के बाथ शहर की जॉर्जियन शैली की इमारतों का प्रभाव दिखाई देता है। गोलाकार योजना, सफेद स्तंभ, मेहराबदार बरामदे और दुकानों की व्यवस्थित कतारें इसे दूसरी व्यावसायिक जगहों से अलग पहचान देती हैं।

कनॉट प्लेस को मुख्य रूप से दो गोलाकार हिस्सों—इनर सर्कल और आउटर सर्कल—में विकसित किया गया। बीच में खुला स्थान भी इसकी योजना का हिस्सा था। आज यही इलाका सेंट्रल पार्क और आसपास के सार्वजनिक स्थानों के कारण पहचाना जाता है।

अंग्रेजों के जमाने में कैसा था यहां का माहौल?

ब्रिटिश शासन के दौरान कनॉट प्लेस नई दिल्ली के प्रमुख खरीदारी और सामाजिक मेलजोल के केंद्रों में शामिल था। यहां कई प्रतिष्ठित दुकानें, खानपान के प्रतिष्ठान और मनोरंजन की जगहें विकसित हुईं। उस दौर में इस इलाके का संबंध खास तौर पर ब्रिटिश अधिकारियों, संपन्न लोगों और भारतीय रईसों की जीवनशैली से जुड़ा था।

वेंगर्स जैसे पुराने प्रतिष्ठानों ने यहां के खानपान की पहचान बनाने में भूमिका निभाई। वहीं, रीगल सिनेमा जैसे मनोरंजन केंद्रों ने दिल्ली के सामाजिक जीवन को नया रूप दिया। समय के साथ यहां भारतीय ग्राहकों और आम लोगों की आवाजाही भी बढ़ती गई।

कनॉट प्लेस की खासियत यह रही कि यह केवल खरीदारी की जगह नहीं रहा, बल्कि नई दिल्ली के बदलते शहरी जीवन का भी प्रतीक बन गया।

कनॉट प्लेस कैसे बना जन आंदोलनों का केंद्र?

आजादी के बाद कनॉट प्लेस और इसके आसपास के सार्वजनिक स्थानों पर राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियां भी होने लगीं। यहां की केंद्रीय स्थिति और लोगों के जुटने की सुविधा के कारण यह क्षेत्र कई जन आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों के दौरान चर्चा में रहा।

वर्ष 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान दिल्ली के विभिन्न सार्वजनिक स्थलों पर बड़ी संख्या में लोग जुटे। दिसंबर 2012 में एक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद महिलाओं की सुरक्षा और न्याय की मांग को लेकर दिल्ली में व्यापक प्रदर्शन हुए। कनॉट प्लेस सहित कई स्थानों पर लोगों ने अपनी नाराजगी और मांगें व्यक्त कीं।

बाद के वर्षों में नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर से जुड़े विरोध प्रदर्शनों के दौरान भी दिल्ली के कई इलाकों में सभाएं और प्रदर्शन हुए। हालांकि, प्रत्येक आंदोलन का स्थान और स्वरूप अलग-अलग रहा।

आज भी दिल्ली की पहचान है कनॉट प्लेस

आज कनॉट प्लेस दिल्ली के प्रमुख व्यावसायिक और पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। यहां खरीदारी के लिए आने वाले लोगों के साथ-साथ ऐतिहासिक इमारतों, खानपान और शहर की संस्कृति में रुचि रखने वाले पर्यटक भी पहुंचते हैं।

इसके सफेद स्तंभों वाले बरामदे, गोलाकार बाजार और आसपास की ऐतिहासिक जगहें पुराने और आधुनिक दिल्ली के मेल को दर्शाती हैं। मेट्रो की सुविधा और प्रमुख सड़कों से जुड़ाव ने भी इसे शहर के व्यस्त इलाकों में शामिल बनाए रखा है।

निष्कर्ष: कनॉट प्लेस का इतिहास केवल एक बाजार के निर्माण की कहानी नहीं है। गांवों और खुले मैदानों से शुरू हुआ यह क्षेत्र ब्रिटिश राजधानी की व्यावसायिक योजना का हिस्सा बना और बाद में दिल्ली के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण जगहों में शामिल हो गया।

सत्या रिपोर्ट डिस्क्लेमर: यह लेख कनॉट प्लेस के इतिहास और उसके सामाजिक महत्व से जुड़ी सामान्य ऐतिहासिक जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है।

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