
नई दिल्ली: दादा की संपत्ति में पोते-पोतियों का कितना हक होता है, यह सवाल अक्सर परिवारों में संपत्ति के बंटवारे के समय उठता है। कई लोग मानते हैं कि दादा या परदादा से जुड़ी हर संपत्ति में अगली पीढ़ी का जन्म से ही हिस्सा होता है, लेकिन कानून में ऐसा हमेशा नहीं होता। संपत्ति पुश्तैनी है या किसी व्यक्ति ने अपनी कमाई से खरीदी है, इससे अधिकार तय होने में बड़ा फर्क पड़ता है।
कर्नाटक हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी इसी तरह का सवाल उठा। अमेरिका में रहने वाली एक महिला ने अपने पिता, माता और बहन के खिलाफ मुकदमा दायर कर कुछ संपत्तियों में हिस्सा मांगा था। महिला का दावा था कि संपत्तियां पैतृक या संयुक्त हिंदू परिवार की थीं और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 के संशोधन के तहत उसे भी बराबर अधिकार मिलना चाहिए। हालांकि, अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर उसकी याचिका खारिज कर दी।
हाई कोर्ट ने बेटी का दावा क्यों खारिज किया?
मामले में अदालत के सामने पेश किए गए साक्ष्यों और महिला के चाचा की गवाही से यह बात सामने आई कि विवादित संपत्तियां उसके दादा ने अपनी कमाई से खरीदी थीं। यानी उन्हें संयुक्त हिंदू परिवार की पैतृक संपत्ति मानने के लिए पर्याप्त आधार नहीं मिला।
इसी अंतर को ध्यान में रखते हुए अदालत ने महिला का दावा स्वीकार नहीं किया। इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि बेटियों को संपत्ति में अधिकार नहीं मिलता, बल्कि यह कि अधिकार तय करने से पहले संपत्ति की कानूनी प्रकृति देखना जरूरी है।
पुश्तैनी और खुद खरीदी गई संपत्ति में क्या अंतर है?
पुश्तैनी संपत्ति: हिंदू कानून में संयुक्त परिवार की सहदायिक संपत्ति पर पात्र सहदायिकों के अधिकार जन्म से उत्पन्न हो सकते हैं। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 के संशोधन के बाद बेटियों को भी बेटों के समान सहदायिक अधिकार दिए गए हैं।
स्व-अर्जित संपत्ति: अगर किसी व्यक्ति ने अपनी कमाई से संपत्ति खरीदी है, तो सामान्य तौर पर वह उसकी व्यक्तिगत संपत्ति होती है। केवल इस वजह से कि संपत्ति दादा से पिता या पिता से अगली पीढ़ी तक पहुंची है, वह अपने आप पुश्तैनी संपत्ति नहीं बन जाती।
हालांकि, संपत्ति किस तरह हासिल हुई, उसका बंटवारा कैसे हुआ और संबंधित दस्तावेज क्या बताते हैं, इन तथ्यों के आधार पर कानूनी स्थिति बदल सकती है।
क्या पिता अपनी कमाई से खरीदी गई संपत्ति बेच सकते हैं?
सामान्य तौर पर, यदि संपत्ति पिता की स्व-अर्जित संपत्ति है और उस पर किसी अन्य व्यक्ति का कोई स्थापित कानूनी अधिकार या प्रतिबंध नहीं है, तो पिता को उसे बेचने, उपहार देने या वसीयत के जरिए किसी को देने का अधिकार होता है।
बच्चे केवल बेटे या बेटी होने के आधार पर पिता की स्व-अर्जित संपत्ति में उनके जीवित रहते जन्मसिद्ध हिस्सा नहीं मांग सकते। लेकिन यदि संपत्ति संयुक्त हिंदू परिवार की सहदायिक संपत्ति है, तो स्थिति अलग हो सकती है।
पिता की मृत्यु के बाद किसे मिलता है हिस्सा?
यदि कोई हिंदू पुरुष बिना वसीयत बनाए मृत्यु को प्राप्त होता है, तो उसकी संपत्ति का उत्तराधिकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार तय होता है। सामान्य परिस्थितियों में उसकी विधवा, बेटे, बेटियां और जीवित मां प्रथम श्रेणी के वारिसों में शामिल होते हैं और लागू कानूनी नियमों के अनुसार हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि पिता की मृत्यु के बाद हर स्थिति में सभी वारिसों को बिना किसी अन्य तथ्य को देखे एक जैसा हिस्सा मिलेगा। वसीयत, परिवार की संरचना, संपत्ति की प्रकृति और अन्य कानूनी परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं।
संपत्ति में अपना अधिकार जानने के लिए क्या करें?
यदि परिवार में संपत्ति को लेकर विवाद है, तो सबसे पहले संपत्ति के खरीद दस्तावेज, पुराने बंटवारे के कागजात, राजस्व रिकॉर्ड और अन्य संबंधित दस्तावेजों की जांच करानी चाहिए। केवल परिवार में चली आ रही मान्यता के आधार पर संपत्ति को पुश्तैनी या व्यक्तिगत मान लेना उचित नहीं है।
सबसे जरूरी बात: दादा की हर संपत्ति में पोते-पोतियों का अपने आप जन्मसिद्ध अधिकार नहीं होता। वहीं, बेटियों को भी कानून के तहत संपत्ति में महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं। किसी विशेष मामले में वास्तविक हक जानने के लिए संपत्ति के दस्तावेजों और लागू उत्तराधिकार कानून की जांच आवश्यक है।
सत्या रिपोर्ट डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य कानूनी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। संपत्ति से जुड़े अधिकार मामले के तथ्यों और लागू कानून पर निर्भर करते हैं। किसी निर्णय से पहले योग्य वकील से सलाह लें।



