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प्लास्टिक​​​ पर लेजर चलाकर बनाए नन्हे हीरे, हर शॉट में बने खरबों कण; जानिए कैसे हुआ यह अनोखा प्रयोग

प्लास्टिक​​​ पर लेजर चलाकर बनाए नन्हे हीरे, हर शॉट में बने खरबों कण; जानिए कैसे हुआ यह अनोखा प्रयोग

नई दिल्ली, भारत: वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक और शक्तिशाली लेजर की मदद से बेहद छोटे हीरे यानी नैनोडायमंड तैयार करने की तकनीक पर कामयाबी हासिल की है। जर्मनी के हेल्महोल्ट्ज-सेंट्रम ड्रेसडेन-रोसेनडॉर्फ और रोस्टॉक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह प्रयोग किया। इसमें प्लास्टिक की पतली परत पर लेजर डालकर अत्यधिक दबाव पैदा किया गया, जिससे उसमें मौजूद कार्बन के परमाणुओं ने हीरे जैसी संरचना बना ली।

यह शोध इसलिए खास है, क्योंकि नैनोडायमंड का इस्तेमाल भविष्य में चिकित्सा, बेहद संवेदनशील सेंसर और ऊर्जा से जुड़ी तकनीकों में किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का लक्ष्य ऐसे छोटे हीरे तैयार करना है, जिनका आकार एक जैसा हो और जिनकी शुद्धता भी बेहतर हो।

अंतरिक्ष के ग्रहों से मिला प्रयोग का विचार

इस प्रयोग के पीछे नेपच्यून और यूरेनस जैसे ग्रहों के अंदर मौजूद परिस्थितियों को समझने की कोशिश भी जुड़ी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन ग्रहों के भीतर अत्यधिक दबाव और तापमान के कारण कार्बन से हीरे बनने की प्रक्रिया हो सकती है।

इसी तरह की परिस्थितियों को प्रयोगशाला में तैयार करने के लिए शोधकर्ताओं ने शक्तिशाली लेजर का इस्तेमाल किया। यह प्रयोग चेक गणराज्य की राजधानी प्राग के पास स्थित एक्सट्रीम लाइट इंफ्रास्ट्रक्चर की लेजर सुविधा में किया गया।

प्लास्टिक से हीरा बनाने की प्रक्रिया क्या है?

इस प्रयोग में वैज्ञानिकों ने PET प्लास्टिक की लगभग 100 माइक्रोमीटर मोटी पतली फिल्म का इस्तेमाल किया। इसी तरह का प्लास्टिक आमतौर पर पानी की बोतलें बनाने में भी उपयोग किया जाता है।

प्रयोग की प्रक्रिया को कुछ आसान चरणों में समझा जा सकता है।

पहला चरण: प्लास्टिक पर लेजर का प्रहार

शोधकर्ताओं ने प्लास्टिक की पतली परत पर बहुत शक्तिशाली लेजर पल्स डाली। इससे प्लास्टिक के भीतर बेहद कम समय के लिए अत्यधिक ऊर्जा और दबाव पैदा हुआ।

दूसरा चरण: अत्यधिक दबाव का निर्माण

लेजर से पैदा हुई शॉक वेव यानी झटके की लहर ने प्लास्टिक के भीतर लगभग 100 गीगापास्कल तक दबाव बनाया। यह सामान्य वायुमंडलीय दबाव से लाखों गुना अधिक है।

तीसरा चरण: कार्बन से नैनोडायमंड का बनना

PET प्लास्टिक में कार्बन मौजूद होता है। अत्यधिक दबाव और तापमान के कारण कार्बन की संरचना बदल सकती है और हीरे जैसी संरचना वाले बेहद छोटे कण बन सकते हैं। इस प्रयोग में वैज्ञानिकों ने ऐसे नैनोडायमंड तैयार किए।

तैयार हीरों को सुरक्षित रखना क्यों था मुश्किल?

हीरे बनाना इस प्रयोग की एक चुनौती थी, लेकिन उन्हें नष्ट होने से बचाकर इकट्ठा करना भी उतना ही कठिन था। लेजर से पैदा हुई शॉक वेव जब प्लास्टिक से बाहर निकलती है, तो उसके साथ बने कण बहुत तेज गति से आगे बढ़ सकते हैं।

इन नन्हे हीरों को सुरक्षित रखने के लिए शोधकर्ताओं ने पानी में घुलने वाली एक विशेष आयनिक जेल का इस्तेमाल किया। इस जेल ने तेजी से आगे बढ़ रहे कणों को रोकने और उन्हें इकट्ठा करने में मदद की।

इस तरीके से वैज्ञानिकों को बने हुए नैनोडायमंड का विश्लेषण करने का अवसर मिला, जबकि पहले ऐसी परिस्थितियों में बने कणों को सुरक्षित रूप से प्राप्त करना मुश्किल था।

कितने छोटे हैं ये हीरे?

शोध से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, हर लेजर पल्स से लगभग 10 ट्रिलियन नैनोडायमंड बनने का अनुमान लगाया गया। इन कणों का औसत आकार करीब 3 नैनोमीटर बताया गया है। एक नैनोमीटर मीटर का एक अरबवां हिस्सा होता है।

इतने छोटे आकार के कारण इन कणों को सामान्य आंखों से देखना संभव नहीं है। इनकी संरचना और गुणों की जांच के लिए विशेष वैज्ञानिक उपकरणों की जरूरत होती है। शोधकर्ताओं ने इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी जैसी तकनीकों से इन कणों का अध्ययन किया।

विस्फोट से बनने वाले नैनोडायमंड से कैसे अलग है यह तरीका?

नैनोडायमंड तैयार करने के लिए विस्फोट समेत कई तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। कुछ पारंपरिक प्रक्रियाओं में कणों के आकार और शुद्धता को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

लेजर आधारित इस प्रयोग का संभावित लाभ यह है कि वैज्ञानिक बेहद कम समय में अत्यधिक दबाव पैदा कर सकते हैं और बने हुए कणों को विशेष तरीके से इकट्ठा कर सकते हैं। हालांकि, इस तकनीक को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने की व्यावहारिकता और लागत का आकलन करना अभी जरूरी है।

चिकित्सा से लेकर ऊर्जा तक कहां आएंगे काम?

नैनोडायमंड के छोटे आकार और विशेष गुणों के कारण वैज्ञानिक कई क्षेत्रों में इनके संभावित इस्तेमाल पर शोध कर रहे हैं।

चिकित्सा: कुछ नैनोडायमंड आधारित तकनीकों का अध्ययन चिकित्सा इमेजिंग और जैविक प्रणालियों में उपयोग के लिए किया जा रहा है। हालांकि, इस प्रयोग से बने कणों का किसी खास चिकित्सा उपयोग में इस्तेमाल होना अभी अलग से साबित करना होगा।

क्वांटम सेंसर: हीरे की कुछ विशेष संरचनाएं बेहद संवेदनशील मापन उपकरणों में उपयोगी हो सकती हैं। नैनोडायमंड आधारित सेंसर छोटे स्तर पर चुंबकीय क्षेत्रों और अन्य संकेतों का पता लगाने में मदद कर सकते हैं।

ऊर्जा और पर्यावरण: वैज्ञानिक नैनो-सामग्रियों की मदद से कार्बन डाइऑक्साइड से जुड़ी रासायनिक प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने की संभावनाओं का भी अध्ययन कर रहे हैं। हालांकि, इस प्रयोग में बने नैनोडायमंड से ऐसे उपयोग कितने प्रभावी होंगे, यह आगे के शोध से स्पष्ट होगा।

विशेष औद्योगिक उपयोग: नैनोडायमंड का इस्तेमाल कुछ घिसाई, पॉलिशिंग और अन्य तकनीकी सामग्रियों में पहले से किया जाता है। एकसमान आकार और बेहतर शुद्धता वाले कण इन क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो सकते हैं।

क्या प्लास्टिक से हीरे बनाना भविष्य में आम हो जाएगा?

इस शोध ने यह दिखाया है कि प्लास्टिक में मौजूद कार्बन को अत्यधिक दबाव और तापमान की परिस्थितियों में नैनोडायमंड में बदला जा सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अब सामान्य प्लास्टिक से आसानी से बड़े और आभूषणों में इस्तेमाल होने वाले हीरे बनाए जा सकेंगे।

फिलहाल यह एक वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धि है। इसकी लागत, उत्पादन क्षमता और अलग-अलग क्षेत्रों में उपयोग की संभावनाओं को समझने के लिए आगे और अध्ययन की जरूरत होगी।

Satya Report नोट: यह लेख उपलब्ध वैज्ञानिक रिपोर्टों में वर्णित जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। नैनोडायमंड के संभावित व्यावसायिक और चिकित्सा उपयोगों की पुष्टि के लिए आगे के शोध और परीक्षण जरूरी हैं।

contact.satyareport@gmail.com

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