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चेतक​​​ ही नहीं, महाराणा प्रताप का यह हाथी भी था वीरता की मिसाल, अकबर ने नाम बदलकर रखा था ‘पीरप्रसाद’; 28 दिन तक नहीं छुआ भोजन

चेतक​​​ ही नहीं, महाराणा प्रताप का यह हाथी भी था वीरता की मिसाल, अकबर ने नाम बदलकर रखा था ‘पीरप्रसाद’; 28 दिन तक नहीं छुआ भोजन

महाराणा प्रताप की वीरता और उनके घोड़े चेतक की स्वामिभक्ति के किस्से इतिहास में खूब चर्चित हैं। लेकिन बहुत कम लोग उनके एक ऐसे साथी के बारे में जानते हैं, जिसने हल्दीघाटी के युद्ध में अपनी ताकत और बहादुरी से दुश्मन की सेना को कड़ी चुनौती दी थी। इस हाथी का नाम था रामप्रसाद। लोकप्रचलित ऐतिहासिक कथाओं में उसकी वीरता के साथ-साथ महाराणा प्रताप के प्रति उसकी वफादारी का भी खास जिक्र मिलता है।

कहा जाता है कि रामप्रसाद केवल एक युद्ध हाथी नहीं था, बल्कि महाराणा प्रताप का भरोसेमंद साथी भी था। उसकी समझदारी और युद्ध कौशल ने उसे दूसरे हाथियों से अलग पहचान दिलाई थी।

कौन था महाराणा प्रताप का हाथी रामप्रसाद?

रामप्रसाद महाराणा प्रताप का एक शक्तिशाली और प्रशिक्षित हाथी बताया जाता है। जिस तरह चेतक को महाराणा प्रताप का खास साथी माना जाता है, उसी तरह रामप्रसाद भी उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण था।

कथाओं के अनुसार, रामप्रसाद अपने स्वामी के इशारों को समझता था और युद्ध के दौरान बिना बार-बार निर्देश दिए भी अपनी भूमिका निभा सकता था। उसकी ताकत और समझदारी की वजह से महाराणा प्रताप को युद्ध में काफी मदद मिलती थी।

हल्दीघाटी के युद्ध में दिखाई थी ताकत

हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप और मुगल सेना के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध से जुड़ी लोककथाओं में रामप्रसाद की बहादुरी का विशेष उल्लेख मिलता है।

प्रचलित विवरणों के मुताबिक, रामप्रसाद ने युद्ध के दौरान मुगल सेना के कई हाथियों और घोड़ों को चुनौती दी थी। उसकी सूंड में भारी हथियार लगाए जाने की बात भी कही जाती है, जिससे वह दुश्मन के हाथियों और घोड़ों पर हमला कर सकता था।

रामप्रसाद की ताकत और युद्ध कौशल से प्रभावित होकर मुगल पक्ष उसे अपने कब्जे में लेना चाहता था। कथाओं में यह भी बताया जाता है कि अकबर की इच्छा महाराणा प्रताप के साथ इस हाथी को भी हासिल करने की थी।

सात हाथियों और 14 महावतों की मदद से बनाया गया बंदी

रामप्रसाद को पकड़ना आसान नहीं बताया जाता। प्रचलित कहानी के अनुसार, उसे बंदी बनाने के लिए सात हाथियों और 14 महावतों की मदद लेनी पड़ी थी। काफी प्रयासों के बाद मुगल सेना उसे अपने कब्जे में ले जाने में सफल हुई।

इस तरह रामप्रसाद महाराणा प्रताप से अलग होकर अकबर के दरबार पहुंच गया। लेकिन कहानी का सबसे भावुक हिस्सा इसके बाद शुरू होता है।

अकबर ने बदल दिया था रामप्रसाद का नाम

कहा जाता है कि अकबर ने रामप्रसाद का नाम बदलकर पीरप्रसाद रख दिया था। उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि हाथी को अच्छी तरह खाना खिलाया जाए और उसकी देखभाल की जाए।

हालांकि, लोकप्रचलित कथा के अनुसार, रामप्रसाद ने नए ठिकाने पर भोजन करना ही छोड़ दिया। वह लगातार अपने पुराने स्वामी महाराणा प्रताप को याद करता रहा। सैनिकों की कोशिशों के बावजूद उसने खाना नहीं खाया।

28 दिनों तक भूखा रहकर भी नहीं छोड़ी स्वामिभक्ति

रामप्रसाद की वफादारी से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यता यह है कि उसने महाराणा प्रताप से बिछड़ने के बाद 28 दिनों तक भोजन नहीं किया। अंततः उसकी मृत्यु हो गई, लेकिन उसने अपने स्वामी के प्रति वफादारी नहीं छोड़ी।

यही वजह है कि महाराणा प्रताप के साथ रामप्रसाद का नाम भी बहादुरी और स्वामिभक्ति की कहानियों में याद किया जाता है। चेतक की तरह रामप्रसाद की कहानी भी यह बताती है कि युद्ध के मैदान में जानवरों का योगदान कितना महत्वपूर्ण हो सकता था।

Satya Report डिस्क्लेमर: रामप्रसाद से जुड़े कई प्रसंग लोकप्रचलित ऐतिहासिक कथाओं में मिलते हैं। विशेष रूप से युद्ध में मारे गए हाथियों की संख्या और 28 दिनों तक भोजन न करने जैसे दावों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि स्पष्ट नहीं है। इन्हें प्रमाणित इतिहास के बजाय प्रचलित विवरणों के रूप में पढ़ना चाहिए।

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