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​बिना धर्म बदले शादी का कानून… स्पेशल मैरिज एक्ट की शर्तें और प्रॉसेस क्या हैं?

जम्मूकश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने सीनियर जर्नलिस्ट निधि राजदान से हाल ही में विवाह किया है. दोनों की यह दूसरी शादी है. यह स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत हुई है. निधि कश्मीरी पंडित परिवार से आती हैं और उमर मुस्लिम परिवार से आते हैं. लेकिन यह विवाह न तो मुस्लिम रीतिरिवाज से हुआ और न ही हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत. इसलिए यह एक्ट चर्चा में आ गया है. आइए, इसी बहाने जानते हैं कि क्या है स्पेशल मैरिज एक्ट, इसके जरिए होने वाली शादी की शर्तें क्या हैं? क्या कोर्ट मैरिज की प्रक्रिया?

​बिना धर्म बदले शादी का कानून… स्पेशल मैरिज एक्ट की शर्तें और प्रॉसेस क्या हैं?

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्वनी कुमार दुबे बताते हैं कि स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 भारत में नागरिक विवाह का एक कानूनी रास्ता है. इसके तहत दो लोग बिना धर्म बदले विवाह कर सकते हैं. दोनों एक ही धर्म के हों या अलगअलग धर्मों के, वे इस कानून के तहत विवाह कर सकते हैं. अंतरजातीय विवाह के लिए भी यह कानून उपयोगी है. शादी धार्मिक रीतिरिवाजों से करना जरूरी नहीं होता.

इस तरह का विवाह दो लोग आपसी सहमति से विवाह अधिकारी के सामने कानूनी प्रक्रिया को अपनाते हुए कर सकते हैं. इस कानून का उद्देश्य विवाह के लिए एक ऐसा ढांचा देना है जो किसी खास धर्म की रस्मों पर निर्भर न हो. कानून में विवाह, पंजीकरण और तलाक से जुड़े प्रावधान भी हैं.

यह कानून कब लागू हुआ?

स्पेशल मैरिज एक्ट संसद ने 1954 में पारित किया था. इसे 9 अक्टूबर 1954 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली. यह कानून 1 जनवरी 1955 से लागू हुआ. इसलिए इसके नाम में 1954 है, जबकि इसका लागू होने का दिन 1 जनवरी 1955 है.

जम्मूकश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह और सीनियर जर्नलिस्ट निधि राजदान.

इस एक्ट के तहत शादी की मुख्य शर्तें क्या हैं?

इस कानून के तहत विवाह के लिए दोनों पक्षों की सहमति जरूरी है. दोनों को विवाह का निर्णय अपनी इच्छा से लेना चाहिए. किसी पर दबाव या जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए. कानून के अनुसार, विवाह के समय किसी भी पक्ष का जीवित पति या पत्नी नहीं होना चाहिए. यदि पहले विवाह हुआ था, तो वह कानूनी रूप से समाप्त हो चुका होना चाहिए. तलाक का आदेश हो सकता है, या पूर्व जीवनसाथी की मृत्यु हो चुकी हो.

पुरुष की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष और महिला की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष होनी चाहिए. दोनों पक्ष ऐसे मानसिक रूप से सक्षम होने चाहिए कि विवाह के लिए वैध सहमति दे सकें. कानून में निषिद्ध रिश्तों के भीतर विवाह की मनाही है, हालांकि कुछ मामलों में लागू मान्य प्रथा के आधार पर अपवाद हो सकता है. इन शर्तों का अर्थ है कि केवल अलग धर्म या जाति का होना विवाह में बाधा नहीं है. मुख्य बात यह है कि दोनों पक्ष कानूनी शर्तें पूरी करें और विवाह अपनी इच्छा से करें.

इस कानून से शादी के लिए दोनों पक्ष जिले के विवाह अधिकारी को प्रस्तावित विवाह की लिखित सूचना देते हैं. फोटो: Pexels

कोर्ट मैरिज की प्रक्रिया क्या है?

सबसे पहले दोनों पक्ष जिले के विवाह अधिकारी को प्रस्तावित विवाह की लिखित सूचना देते हैं. यह सूचना उस जिले के विवाह अधिकारी को दी जाती है जहां दोनों में से कमसेकम एक व्यक्ति ने सूचना देने से ठीक पहले कम से कम 30 दिन निवास किया हो.

सूचना देने के बाद विवाह अधिकारी इसे अपने कार्यालय में नोटिस बोर्ड पर चस्पा करता है. कानून के अनुसार, नोटिस विवाह अधिकारी के कार्यालय में निरीक्षण के लिए उपलब्ध रहता है. यदि किसी पक्ष का स्थायी निवास उस जिले के बाहर है, तो कानून में उस जिले के विवाह अधिकारी को भी नोटिस भेजने और प्रदर्शित करने का प्रावधान है.

नोटिस प्रकाशित होने के बाद 30 दिन की अवधि रहती है. इस अवधि में कोई व्यक्ति कानून में दी गई शर्तों के आधार पर आपत्ति दर्ज करा सकता है. आपत्ति का आधार यह होना चाहिए कि विवाह अधिनियम की पात्रता शर्तों में से किसी का उल्लंघन करेगा. केवल परिवार की असहमति, जाति या धर्म का अंतर अपने आप में वैध कानूनी आपत्ति नहीं बनता.

यदि आपत्ति आती है, तो विवाह अधिकारी उसकी जांच करता है. कानून के अनुसार, अधिकारी को आपत्ति पर निर्णय लेने के लिए 30 दिन से अधिक नहीं लेने चाहिए. यदि अधिकारी विवाह से इनकार करता है, तो संबंधित पक्ष जिला अदालत में अपील कर सकते हैं. यदि कोई आपत्ति नहीं आती, या आपत्ति जांच के बाद स्वीकार नहीं होती, तो विवाह संपन्न किया जा सकता है.

विवाह अधिकारी के सामने दोनों पक्ष घोषणा करते हैं कि वे एकदूसरे को अपना वैध जीवनसाथी स्वीकार करते हैं. इस समय तीन गवाहों की मौजूदगी और हस्ताक्षर जरूरी होते हैं. विवाह पूरा होने के बाद विवाह प्रमाणपत्र में प्रविष्टि की जाती है. यह प्रमाणपत्र विवाह का आधिकारिक प्रमाण होता है. यदि नोटिस के बाद तीन महीने के भीतर विवाह संपन्न नहीं होता, तो कानून के तहत नया नोटिस देना पड़ सकता है.

स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह करने के लिए धर्म परिवर्तन जरूरी नहीं है. फोटो: Pexels

30 दिन के नोटिस से किसे फायदा और क्यों है विवाद?

नोटिस और आपत्ति की प्रक्रिया को कानून की पात्रता शर्तों का पालन सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है. उदाहरण के लिए, इससे पहले से विवाहित होना, कम उम्र होना या निषिद्ध रिश्ते में विवाह जैसी बातों पर वैध आपत्ति सामने आ सकती है. इस अर्थ में यह प्रक्रिया विवाह अधिकारी को कानूनी शर्तें जांचने का समय देती है. लेकिन सार्वजनिक नोटिस पर निजता और सुरक्षा को लेकर सवाल भी उठते रहे हैं. नोटिस में निजी जानकारी सार्वजनिक हो सकती है.

आलोचकों का कहना है कि इससे जोड़ों को परिवार या समुदाय के दबाव, दखल या उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है. इस कारण 30 दिन की प्रक्रिया को कुछ लोग सुरक्षा का उपाय मानते हैं, जबकि कुछ इसे निजी जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप और जोखिम मानते हैं. कानून में आपत्ति का आधार सीमित है. इसलिए नोटिस को किसी भी व्यक्ति को केवल निजी नापसंदगी के आधार पर विवाह रोकने का अधिकार नहीं समझना चाहिए. आपत्ति विवाह की वैधानिक शर्तों से जुड़ी होनी चाहिए. नोटिस और आपत्तियों से संबंधित नियम अधिनियम की धाराओं 5 से 8 में दिए गए हैं.

क्या दोनों को धर्म बदलना पड़ता है?

स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह करने के लिए धर्म परिवर्तन जरूरी नहीं है. दोनों अपनी धार्मिक पहचान बनाए रख सकते हैं. यही इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है. विवाह अधिकारी की प्रक्रिया पूरी होने पर विवाह को कानूनी मान्यता मिलती है. स्पेशल मैरिज एक्ट में विवाह अदालत में जज के सामने नहीं, बल्कि नियुक्त विवाह अधिकारी के सामने संपन्न होता है. आवेदन, दस्तावेजों और स्थानीय प्रक्रिया की जानकारी संबंधित जिले के विवाह अधिकारी से लेना उचित है. आवश्यक कागजात और कार्यालय की कार्यप्रणाली जगह के अनुसार अलग हो सकती है.

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