
हिंदू धर्म में भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। उनकी विशेषता यह मानी जाती है कि वे केवल मनुष्यों ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और संसार के प्रत्येक जीव के प्रति करुणा रखते हैं। शिव परिवार और उनसे जुड़ी धार्मिक परंपराओं में कई पशुओं को विशेष स्थान दिया गया है। इन्हीं में कुत्ता भी शामिल है, जिसे भगवान भैरव का वाहन माना जाता है।
देश के कई हिस्सों में भैरव मंदिरों के बाहर कुत्ते की मूर्तियां देखने को मिलती हैं। खासतौर पर काले कुत्ते को भैरव से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि कुत्ते को भोजन कराने से भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं। लेकिन आखिर कुत्ते को भैरव का वाहन क्यों माना गया और इसका धर्म से क्या संबंध है? आइए जानते हैं।
भगवान भैरव और कुत्ते का क्या है संबंध?
भगवान भैरव को भगवान शिव का उग्र स्वरूप माना जाता है। उन्हें क्षेत्रपाल और रक्षक देवता के रूप में भी पूजा जाता है। भैरव की प्रतिमाओं में अक्सर उनके साथ कुत्ता दिखाई देता है। इसी वजह से कुत्ता उनका प्रमुख प्रतीक और वाहन माना जाता है।
धार्मिक परंपराओं में कुत्ते को निष्ठा, सतर्कता और सुरक्षा का प्रतीक भी माना गया है। भैरव की पूजा में उसे भोजन कराना श्रद्धा और सेवा का एक माध्यम है।
महाभारत में भी कुत्ते का मिलता है विशेष उल्लेख
कुत्ते का धार्मिक महत्व केवल भैरव पूजा तक सीमित नहीं है। महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व में युधिष्ठिर की स्वर्ग यात्रा का एक प्रसंग मिलता है।
कथा के अनुसार, जब पांडव और द्रौपदी हिमालय की ओर अंतिम यात्रा पर निकले, तब रास्ते में एक-एक करके सभी साथी गिरते चले गए। अंत में युधिष्ठिर के साथ केवल एक कुत्ता रह गया।
जब इंद्र उन्हें स्वर्ग ले जाने के लिए अपना रथ लेकर पहुंचे, तो उन्होंने कुत्ते को साथ ले जाने से मना कर दिया। लेकिन युधिष्ठिर ने अपने साथ चलने वाले उस जीव को छोड़ने से इनकार कर दिया। उनकी इस करुणा और धर्मनिष्ठा की परीक्षा लेने के बाद पता चला कि वह कुत्ता वास्तव में धर्मदेव थे।
इस कथा के माध्यम से महाभारत में निष्ठा, दया और सभी जीवों के प्रति करुणा का संदेश दिया गया है।
भगवान शिव के गणों में सभी प्रकार के जीवों को स्थान
शिव परंपरा में भगवान महादेव के गणों का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं में उनके गणों में मनुष्य, पशु, भूत-प्रेत और अलग-अलग स्वरूप वाले प्राणियों का वर्णन मिलता है।
इसी कारण शिव को ऐसे देवता के रूप में देखा जाता है, जो समाज के हर वर्ग और हर जीव को अपने संरक्षण में स्थान देते हैं। कुत्ते को भैरव से जोड़कर देखने के पीछे भी यही व्यापक धार्मिक भावना मानी जाती है।
काले कुत्ते को भोजन कराने की क्यों है परंपरा?
भारत में कई स्थानों पर काल भैरव की पूजा के दौरान कुत्तों को भोजन कराया जाता है। विशेष रूप से काले कुत्ते को रोटी या अन्य उपयुक्त भोजन देने की परंपरा प्रचलित है।
कुछ धार्मिक मान्यताओं में शनिवार को काले कुत्ते को भोजन कराने का संबंध शनि और भैरव की कृपा से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इससे जीवन की परेशानियां कम होती हैं और नकारात्मक प्रभावों से रक्षा मिलती है।
हालांकि, ग्रहों की दशा बदलने या किसी समस्या के निश्चित रूप से दूर होने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसे धार्मिक आस्था और परंपरा के रूप में ही देखना चाहिए।
कुत्ते की पूजा के पीछे छिपा है सेवा का संदेश
भैरव के वाहन के रूप में कुत्ते को दिया गया स्थान केवल धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि इससे जीवों के प्रति दया और सेवा का भाव भी जुड़ा है। किसी भूखे पशु को भोजन देना, उसकी देखभाल करना और उसके प्रति क्रूरता न करना भी इसी भावना का हिस्सा है।
भगवान भैरव के साथ कुत्ते का संबंध हमें याद दिलाता है कि आस्था केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जरूरतमंद और बेजुबान जीवों की सहायता करना भी धर्म का महत्वपूर्ण अंग है।
डिस्क्लेमर: भगवान भैरव और कुत्ते से जुड़ी बातें हिंदू धार्मिक मान्यताओं एवं परंपराओं पर आधारित हैं। पूजा और ग्रहों से संबंधित फल धार्मिक विश्वास का विषय हैं, उनकी वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है।
— Satya Report



