दिवाली की तैयारियां जोरों पर हैं. इस त्योहार पर उल्लू की भी पूजा किए जाने की परंपरा है, लेकिन हमारी रोजमर्रा की बोलचाल में ‘उल्लू’ शब्द मूर्खता का पर्याय बन चुका है. किसी को बेवकूफ बनाना हो तो ‘उल्लू बनाना’ कहते हैं, अपना काम निकालना हो तो ‘उल्लू सीधा करना’, लेकिन दिवाली पर यही उल्लू देवी लक्ष्मी के वाहन के रूप में पूजा जाता है. सवाल यह है कि जिस पक्षी को हम मूर्ख कहते हैं, क्या वह सच में मूर्ख है? विज्ञान इसका जवाब कुछ और ही देता है.

एक सवाल यह भी है कि उल्लू को मूर्ख क्यों माना गया? इसकी एक बड़ी वजह उल्लू की जीवनशैली है. ज्यादातर उल्लू निशाचर होते हैं, यानी रात में सक्रिय रहते हैं. दिन में वे पेड़ों की खोह या घने पत्तों में चुपचाप बैठे रहते हैं. तेज रोशनी में उन्हें आंखें मिचमिचाते और सुस्त देखकर लोगों ने मान लिया कि उन्हें दिन में दिखता नहीं और वे नासमझ हैं. इसके अलावा उनकी गोलगोल बड़ी आंखें, स्थिर टकटकी और अजीब आवाजें भी रहस्यमय छवि बनाती हैं. यहीं से कहावतें और मुहावरे चल पड़े.
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया की कई संस्कृतियों में उल्लू को बुद्धिमानी का प्रतीक माना गया है. यूनानी मान्यता में उल्लू ज्ञान की देवी एथेना का साथी है. यानी मूर्खता की छवि हर जगह की नहीं, हमारी अपनी बनाई हुई है.
गोलगोल बड़ी आंखें, स्थिर टकटकी और अजीब आवाजें इसकी छवि रहस्यमय बनाती हैं. फोटो: Pexels
विज्ञान क्या कहता है?
पक्षी विज्ञानियों के मुताबिक उल्लू मूर्ख नहीं, बल्कि शिकार के मामले में प्रकृति के सबसे कुशल शिकारियों में से एक है. उसकी खूबियां चौंकाने वाली हैं.
- गजब की नजर: उल्लू की आंखें नली जैसी बनावट की होती हैं और अपनी जगह पर टिकी रहती हैं, इसलिए वे आंखें घुमा नहीं सकते, लेकिन इनकी बनावट कम रोशनी में देखने के लिए बेहद उपयुक्त है. अंधेरे में वे इंसान से कहीं बेहतर देख पाते हैं. दिन में भी उनकी पुतलियां सिकुड़कर उन्हें देखने लायक बना देती हैं, यानी दिन में अंधा होने की बात गलत है_
- सिर घुमाने की कला: आंखें न घुमा पाने की भरपाई उनकी गर्दन करती है. उल्लू अपना सिर करीब 270 डिग्री तक घुमा सकता है. इसके लिए उसकी गर्दन में इंसान से दोगुनी, यानी 14 हड्डियां होती हैं. अमेरिका की जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के शोध में पाया गया कि उसकी रक्त नलिकाओं की खास बनावट सिर घुमाने पर भी दिमाग में खून का प्रवाह बनाए रखती है, जिससे स्ट्रोक जैसा खतरा नहीं होता.
उल्लू अपना सिर करीब 270 डिग्री तक घुमा सकता है. फोटो: Pixabay
- कमाल की सुनने की ताकत: कई उल्लू प्रजातियों के कानों की स्थिति थोड़ी ऊपरनीचे होती है. इससे वे आवाज की दिशा और दूरी को बेहद सटीकता से पकड़ लेते हैं. चेहरे की गोल, तश्तरीनुमा बनावट आवाज को कानों की ओर समेटने का काम करती है. इसी वजह से बार्न आउल जैसे उल्लू घुप अंधेरे में सिर्फ आवाज के सहारे चूहे को पकड़ लेते हैं.
- बिना आवाज की उड़ान: उल्लू के पंखों के किनारे आरी जैसे कटावदार और सतह मखमली होती है. इससे उड़ते वक्त हवा की आवाज बहुत कम होती है और शिकार को भनक तक नहीं लगती.
उल्लू को मूर्ख कहना वैज्ञानिक तौर पर बिल्कुल भी सही नहीं है. फोटो: Pexels
तो क्या उल्लू बहुत समझदार है?
यहां संतुलन जरूरी है. वैज्ञानिक मानते हैं कि उल्लू का दिमाग देखने, सुनने और शिकार करने जैसे कामों के लिए बेहद विशेषज्ञ है, पर कौवे या तोते की तरह पहेलियां सुलझाने और औजार इस्तेमाल करने जैसी क्षमता उनमें आमतौर पर नहीं दिखती. सटीक बात यह है कि उसकी बुद्धि अलग तरह की है, जो उसके जीवन और शिकार की जरूरतों के हिसाब से विकसित हुई है. उसे मूर्ख कहना वैज्ञानिक तौर पर बिल्कुल भी सही नहीं है.
यह भी ध्यान रखें
दिवाली के आसपास अंधविश्वास के चलते उल्लुओं की तस्करी और अवैध शिकार की खबरें अक्सर सामने आती हैं. वन्यजीव संरक्षण से जुड़े संगठन हर साल इस पर चेतावनी जारी करते हैं. भारत में उल्लू वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित हैं और इन्हें पकड़ना, बेचना या मारना कानूनन अपराध है. चूहों और कीटों की आबादी काबू में रखकर उल्लू किसानों के सच्चे मित्र का काम भी करते हैं.



