धनंजय सिंह पर टकसाल सिनेमा के पास ताबड़तोड़ चलाई गईं थीं गोलियां, कई लोग हुए थे घायल.

वाराणसी: पूर्वांचल के सबसे चर्चित मामले टकसाल सिनेमा कांड में बुधवार को 24 साल बाद फैसला आया है. इसके मुख्य आरोपी विधायक अभय सिंह समेत सभी 6 लोगों को वाराणसी एमपी-एमएलए कोर्ट ने पर्याप्त सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है. न्यायाधीश यजुवेंद्र विक्रम सिंह ने यह फैसला दिया. इस फैसले के बाद अभय सिंह और उनके समर्थकों में खुशी की लहर है. अभय ने इसे बड़ी जीत बताया है तो वहीं समर्थक भी एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर खुशियों को इजहार करते दिखे.
मामले के मुख्य आरोपी रहे अभय सिंह ने कहा कि, यह 24 साल के इंतजार का फल है. न्याय के लिए 24 साल तक झेला है. मुझे न्यायालय पर भरोसा था कि न्याय मिलेगा. इसके लिए धन्यवाद देता हूं, यह हमारी बड़ी जीत हुई है. वहीं दूसरे आरोपी रहे विनीत सिंह ने भी अपनी खुशी जाहिर की. उन्होंने ने कहा कि अब कोर्ट-कचहरी और आरोप के झंझट से मुक्ति मिल गई है. इसके लिए न्यायालय को धन्यवाद देता हूं. हमारी किसी से कोई अदावत नहीं है. सबको शांति के साथ रहना चाहिए.
इस फैसले के बाद अभय सिंह और विनीत सिंह के समर्थकों ने अपनी खुशियों का इजहार किया. एक दूसरे को मिठाई खिलाई. समर्थकों ने कहा कि, यह हम सभी के लिए खुशी का मौका है. ऐसा लग रहा है कि लंबे वक्त का इंतजार बीत गया है. कहा कि बचपन से ही इस मामले को देख रहे थे और आज हम बड़े हो गए. लंबा इंतजार था मगर इंतजार का फल मीठा रहा और न्यायालय ने न्याय किया.
क्या था टकसाल सिनेमा कांड
आज से लगभग 24 साल पहले 4 अक्टूबर और साल 2002 को वाराणसी में टकसाल सिनेमा के पास पूर्व सांसद धंनजय सिंह पर यह जानलेवा हमला हुआ था. शाम के करीब 3.30 बज रहे थे. कुछ लोग सिनेमा घर में जा चुके थे तो कुछ जा रहे थे. इस दौरान अचानक से एक बोलोरो आई, जिसमें से AK-47 से सौ राउंड से ज्यादा गोलियां चलीं. इस घटना ने पूरे बनारस को दहला कर रख दिया. यह घटना टकसाल सिनेमा कांड बन गई. इस घटना में पूर्व सांसद धनंजय सिंह और उनके पांच साथी गंभीर रूप से घायल हो गए. इस हमले में धनंजय सिंह समेत कई लोग घायल हो गए थे. यहीं से दो नेताओं की आपसी दुश्मनी की कहानी की शुरुआत हो गई थी. इस हमले में AK-47 से कई राउंड फायरिंग की गई थी. दिनदहाड़े चलीं गोलियों ने हर किसी को डरा दिया था.
जौनपुर लौट रहे थे धनंजय
यह हमला तब हुआ जब धनंजय सिंह 4 अक्टूबर, 2022 के दिन अपने साथियों के साथ सफारी वाहन में वाराणसी से जौनपुर लौट रहे थे. उस समय धनंजय जौनपुर की रारी सीट से निर्दलीय विधायक थे. आरोप है कि, जब वे जौनपुर के लिए जा रहे थे तो कैंट थाना क्षेत्र के नदेसर में टकसाल सिनेमा के पास एक बोलेरो में सवार अभय सिंह और और उनके 4-5 साथियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी थी. जैसे ही गोलियां चलनी शुरू हुईं, आसपास के लोगों में हड़कंप मच गया. इस हमले में धनंजय सिंह के साथ ही उनके गनर, चालक समेत कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे.
धनंजय ने दर्ज कराया था मुकदमा
इस हमले के बाद पूरा वाराणसी शहर दहल गया था. घायलों को मलदहिया के सिंह मेडिकल में भर्ती कराया गया था, जबकि हमलावर मौके से फरार हो गए थे. धनंजय सिंह ने अभय सिंह, विनीत सिंह (वर्तमान एमएलसी), संदीप सिंह, सतेंद्र सिंह बबलू, संजय रघुवंशी, विनोद सिंह समेत अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था.
छात्र नेता रहते हुए अभय सिंह से हुआ था परिचय
टकसाल सिनेमा शूटआउट केस बनारस के पहले ‘ओपन शूटआउट’ के तौर पर भी जाना जाता है. यह मामला लगभग 24 वर्षों तक वाराणसी की MP-MLA कोर्ट में लंबित रहा. वर्तमान में शहर और राजनीतिक गलियारों में इस केस के अंतिम फैसले का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा था. क्योंकि यह दो बड़े बाहुबली चेहरों के बीच की रंजिश का मामला है. जौनपुर के टीडी कॉलेज और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में शामिल होने वाले धनंजय ने मंडल कमीशन का विरोध करने से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की. लखनऊ विश्वविद्यालय में ही उसका परिचय बाहुबली छात्र नेता अभय सिंह से हुआ था.
जानिए कैसा रहा धनंजय सिंह और अभय सिंह का राजनीतिक सफर
धनंजय सिंह और अभय सिंह की कहानी पूर्वांचल की राजनीति में एक बार फिर से सभी की जुबान पर है. उनकी दोस्ती एक जमाने में काफी प्रगाढ़ थी थी, लेकिन यही दोस्ती बाद में कट्टर दुश्मनी में बदल गई. 1990 के दशक में लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति के दिनों में इन दोनों में दोस्ती बढ़ी थी. इसके बाद इन दोनों का नाम लोगों के बीच बढ़ता चला गया. हालांकि एक मौका ऐसा भी आ गया कि वर्चस्व की जंग इन दोनों के बीच दरार डाल गई.
धनंजय सिंह के राजनीतिक सफर की बात करें तो उन्होंने 27 साल की उम्र में पहला चुनाव जौनपुर की रारी विधानसभा सीट से निर्दलीय लड़ा और जीते दर्ज की थी. साल 2007 में जदयू (JDU) के टिकट पर फिर से रारी से विधायक बने. वहीं, साल 2009 में लोकसभा चुनाव में जौनपुर से बसपा (BSP) के टिकट पर जीत दर्ज की थी. इसी दौरान, साल 2011 में बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाकर धनंजय सिंह को बसपा से बाहर कर दिया था.
धनंजय को करना पड़ा हार का सामना
धनंजय सिंह राजनीति में लगातार सक्रिय रहे. साल 2014 में उन्होंने लोकसभा चुनाव में बतौर निर्दलीय उम्मीदवार दावेदारी पेश की, लेकिन हार का सामना करना पड़ा. फिर, 2014 और 2017 के विधानसभा चुनाव में धनंजय चुनावी मैदान में उतरे, लेकिन फिर से उन्हें हार का ही सामना करना पड़ा था. इसके बाद, साल 2022 के विधानसभा चुनाव हुए, जिसमें भी धनंजय सिंह ने चुनाव लड़ा और हार का सामना करना पड़ा. वाराणसी में धनंजय सिंह के काफिले पर एके-47 से हमला हुआ था, जिसमें धनंजय सिंह ने अभय सिंह को मुख्य आरोपी बनाया था.
अभय सिंह सपा के टिकट पर लड़े चुनाव
वहीं बात अभय सिंह की करें तो, अभय सिंह ने 37 साल की उम्र में साल 2012 में गोसाईगंज विधानसभा सीट (अयोध्या) से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और पहली बार जीते थे. साल 2007 में सपा के टिकट पर फिर चुनाव लड़े, लेकिन हार का सामना करना पड़ा था. फिर साल 2022 में सपा के टिकट पर गोसाईगंज से विधायक चुने गए. यह वह दौर था, जब योगी आदित्यनाथ के नाम पर भाजपा के पक्ष में बंपर वोट पड़ रहे थे. इसके बाद, राज्यसभा चुनाव 2024 में उनपर पार्टी लाइन से हटकर क्रॉस वोटिंग करने का आरोप लगा, जिसके बाद समाजवादी पार्टी के नेतृत्व से उनके मतभेद खुलकर सामने आए.
समाजवादी पार्टी ने अभय सिंह को किया निष्कासित
साल, 2025 में अनुशासनहीनता और पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में समाजवादी पार्टी ने अभय सिंह को निष्कासित कर दिया था. अभय सिंह वर्तमान में गोसाईगंज से विधायक हैं. सपा से निकलने के बाद किसी पार्टी से औपचारिक रूप से सदस्य नहीं बने हैं. फिर भी भाजपा से नजदीकियों को लेकर लगातार चर्चाओं में रहते हैं. धनंजय सिंह से उनके पुरानी दोस्ती के संबंध थे. अभय सिंह का सफर पूर्वांचल की राजनीति में बाहुबल से विधानसभा तक का है.
अभय सिंह ने कहा कि, सत्य क्या है, इसे जज ही बता सकता है. आरोप लगाने वाला, अपराध करने वाला अपराध कर जाता है, लेकिन उसका परीक्षण भी तो होता है. कितने अपराधी अपराध करते हैं, पुलिस उनको ढूंढ निकालती है, लेकिन उस समय किसी ने पुलिस से मिलकर और सरकार के संरक्षण में अपराध किया था