कुदरत का नायाब करिश्मा
Satya Report: ये नदियां या तो अरब सागर में मिल जाती हैं या फिर कच्छ के रण में समा जाती हैं. इससे एक हैरतअंगेज प्राकृतिक जल-निकास प्रणाली बन जाती है.
रेगिस्तान की कठोर परिस्थितियों के बावजूद, कच्छ यह दिखाता है कि प्रकृति आज भी किस तरह नदियों के कई ऐसे रास्ते बनाती है, जो बारिश के मौसम में जिंदा हो उठते हैं. .
कच्छ अपने नमक के रेगिस्तान, ‘रण ऑफ कच्छ’ के लिए जाना जाता है, लेकिन इस ड्राई इमेज के नीचे मौसमी नदियों और नालों का एक जटिल जाल छिपा है. रिपोर्टों से पता चलता है कि गुजरात में बहने वाली लगभग 185 नदियों में से, लगभग 97 नदियां अकेले कच्छ जिले से जुड़ी हैं.
परमानेंट नहीं हैं ये नदियां
इनमें से ज्यादातर नदियां परमानेंट नहीं हैं. यानी वे मॉनसून के मौसम में जिंदा हो उठती हैं और फिर साल के बाकी समय में सूखकर केवल सूखे नालों के रूप में रह जाती हैं.
इस इलाके की कुछ जानी-मानी नदियों में रुक्मावती, सुवी, मालन, सारन, साकर, मीठी, घुरुद, वेखड़ी, चांग, खारी, नारा, पंजोरा, खरोद, कोट्री, काली, कनकवती और रुद्रमाता शामिल हैं. इसके अलावा, यहां कई छोटी-छोटी जलधाराएं भी हैं, जो बारिश के मौसम में दिखाई देती हैं और मौसम खत्म होने के बाद धीरे-धीरे लुप्त हो जाती हैं.
खारा तक हो जाता है पानी
कच्छ की नदियों की सबसे बड़ी खासियतों में से एक उनका मौसमी व्यवहार है. इनमें से कई नदियां केवल मॉनसून के महीनों में ही बहती हैं और सूखने से पहले, थोड़े समय के लिए ही उनमें पानी रहता है. कई क्षेत्रों में, पानी खारा भी हो जाता है, जिससे रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इसका इस्तेमाल सीमित हो जाता है.
शुष्क जलवायु और रेगिस्तानी परिस्थितियों के बावजूद, रण ऑफ कच्छ दिखाता है कि प्रकृति किस प्रकार चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में भी जल प्रवाह के लिए कई रास्ते बना लेती है. यह जिला न सिर्फ अपनी भौगोलिक बनावट के लिए, बल्कि अपनी उस अनोखी नदी प्रणाली के लिए भी खास है, जो लगातार लोगों की दिलचस्पी बनाए रखती है.



