Satya Report: पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का असर अब पूरी दुनिया की ऊर्जा सप्लाई पर साफ दिखने लगा है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इस संकट के कारण वैश्विक बाजार से रोजाना 1.3 करोड़ (13 मिलियन) बैरल कच्चे तेल की सप्लाई बाहर हो गई है. यह इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा सप्लाई झटका माना जा रहा है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि इस संकट की मुख्य वजह होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल जहाजों की आवाजाही में आई भारी रुकावट है. यह दुनिया के सबसे अहम जल मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचती है. यहां किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर ग्लोबल सप्लाई चेन पर पड़ता है.
IEA के मुताबिक, मार्च महीने में वैश्विक तेल उत्पादन में बड़ी गिरावट दर्ज की गई. कुल सप्लाई 10.1 मिलियन बैरल प्रति दिन घटकर 97 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गई. इस गिरावट की वजह मिडिल ईस्ट में एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले और होर्मुज से टैंकर मूवमेंट पर लगी पाबंदियां हैं.
इतना घट गया उत्पादन
रिपोर्ट के अनुसार, OPEC प्लस देशों का उत्पादन महीने-दर-महीने 9.4 मिलियन बैरल घटकर 42.4 मिलियन बैरल प्रति दिन रह गया. वहीं, गैर-OPEC देशों की सप्लाई भी 7.7 लाख बैरल प्रति दिन कम होकर 54.7 मिलियन बैरल रह गई. इससे साफ है कि संकट का असर लगभग हर बड़े तेल उत्पादक देश पर पड़ा है. मार्च महीने में कुल मिलाकर 360 मिलियन बैरल से ज्यादा तेल की सप्लाई कम हुई और अप्रैल में यह आंकड़ा 440 मिलियन बैरल तक पहुंचने का अनुमान है. यानी आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है.
तेल के भंडार पर भी असर
इस संकट का असर केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि तेल के भंडार पर भी पड़ा है. वैश्विक स्तर पर मार्च में 85 मिलियन बैरल तेल स्टॉक घटा, लेकिन यह गिरावट खासतौर पर खाड़ी क्षेत्र के बाहर ज्यादा देखने को मिली. खाड़ी के बाहर तेल भंडार 205 मिलियन बैरल तक घट गए, जो कि रोजाना 6.6 मिलियन बैरल की कमी के बराबर है.
भारत के लिए क्यों चिंता की बात?
भारत के लिए यह स्थिति बेहद अहम है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है. कच्चा तेल, LNG, उर्वरक और पेट्रोकेमिकल्स जैसी जरूरी चीजें ज्यादातर होर्मुज के रास्ते ही आती हैं. अगर यह रास्ता लंबे समय तक रुका रहता है, तो भारत में तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसके अलावा, शिपिंग लागत, बीमा प्रीमियम और डिलीवरी का समय भी बढ़ जाएगा. इसका सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा. .
तेल से आगे भी असर
यह संकट केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी इसका बड़ा असर पड़ रहा है. UNCTAD के आंकड़ों के अनुसार, कई जरूरी सामानों की सप्लाई इस रूट पर निर्भर करती है. करीब 77% सल्फर की शिपमेंट, 57% हाइड्रोकार्बन से जुड़े उत्पाद और 29.2% नाइट्रोजन उर्वरक का व्यापार होर्मुज से होता है. अगर यह रास्ता रुका रहा, तो इन उत्पादों की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है. इसके अलावा, विमान इंजन के पार्ट्स, स्टील स्ट्रक्चर, केमिकल्स और प्लास्टिक जैसे औद्योगिक उत्पादों का भी बड़ा हिस्सा इसी रूट से गुजरता है. दुनिया की लगभग एक-तिहाई एल्युमिनियम शीट्स और प्लेट्स इसी क्षेत्र से भेजी जाती हैं, जबकि सिंथेटिक रबर का करीब 25% उत्पादन भी ऐसे देशों में होता है जो इस मार्ग पर निर्भर हैं.



