Satya Report: गर्मी का महीना है. तपन स्वाभाविक है लेकिन जब तापमान कम हो और महसूस ज्यादा हो तो इसके कारण पर चर्चा शुरू होना आम है. इस साल भी यही हो रहा है. अप्रैल में उत्तर भारत में 4042 डिग्री सेल्सियस का औसत तापमान रिकार्ड किया गया है लेकिन महसूस होता है कि तापमान इससे कहीं ज्यादा है. लोग चर्चा करने लगे हैं कि जब अप्रैल में यह हाल है तो मईजून कैसा होगा?

आइए, इसके कारणों, असलियत को समझने का प्रयास करते हैं. विज्ञान इसे लेकर क्या सोचता है? असल में तथ्य क्या हैं?40 डिग्री तापमान में 46 डिग्री जैसी गर्मी महसूस होना आज आम बात है. कई लोग कहते हैं कि तापमान 4042 डिग्री सेल्सियस है, लेकिन शरीर को इससे कहीं अधिक गर्मी लगती है. यह केवल महसूस करने की बात नहीं है. इसके पीछे ठोस वैज्ञानिक कारण हैं. यूं भी जिस तरीके से वन कट रहे हैं, शहर से लेकर गाँव तक में हरियाली कम होती जा रही है. जिस अनुपात में पेड़ काटे जा रहे हैं, उस अनुपात में लगाए नहीं जा रहे हैं. अगर कहीं लगाए भी जा रहे हैं तो पेड़ एक दिन, एक महीने या एक साल में हमें राहत नहीं देते. पेड़ जैसेजैसे पुराने होते हैं, हमें राहत देते हैं. कहा जा सकता है कि विकास की कीमत चुका रहे हैं हम.
हीट इंडेक्स क्या है?
इसका सबसे बड़ा कारण हीट इंडेक्स है. यह तापमान और नमी का संयुक्त प्रभाव होता है. जब हवा में नमी ज्यादा होती है, तो पसीना जल्दी नहीं सूखता. पसीना शरीर को ठंडा करता है, लेकिन जब वह सूख नहीं पाता, तो शरीर गर्म बना रहता है. इसी वजह से 4042 डिग्री सेल्सियस में 4546 जैसी गर्मी महसूस होती है.
ह्यूमिडिटी का भी है असर
हवा में नमी बढ़ने से शरीर की ठंडा होने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है. पसीना त्वचा पर जमा रहता है. इससे शरीर को राहत नहीं मिलती. यही कारण है कि समुद्र किनारे या बारिश के मौसम में भी गर्मी ज्यादा लगती है.
अगर हवा चलती रहे, तो गर्मी कम महसूस होती है. हवा पसीने को सुखाती है. इससे शरीर ठंडा होता है. लेकिन जब हवा बंद हो जाती है, तो गर्मी बढ़ जाती है. शहरों में ऊंची इमारतें हवा के रास्ते को रोकती हैं. इससे गर्मी ज्यादा लगती है.
अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट
शहरों में कंक्रीट और डामर ज्यादा होता है. ये सतहें सूरज की गर्मी को सीधे सोख लेती हैं. फिर धीरेधीरे इसे छोड़ती हैं. इसी वजह से रात में भी गर्मी बनी रहती है. पेड़ कम होने से छाया भी नहीं मिलती. इस कारण शहर गांवों से ज्यादा गर्म महसूस होते हैं.
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव और तेज धूप
पिछले कुछ वर्षों में पृथ्वी का तापमान भी बढ़ा है. हीट वेव की घटनाएं बढ़ी हैं. गर्म हवाएं ज्यादा समय तक चलती हैं. इससे शरीर को ठंडा होने का मौका नहीं मिलता. यही कारण है कि सामान्य तापमान भी ज्यादा गर्म लगता है. दोपहर के समय सूरज की किरणें सीधी पड़ती हैं. इस समय यूवी किरणें भी ज्यादा होती हैं. ये शरीर को तेजी से गर्म करती हैं. अगर आप खुले में हों, तो आपको वास्तविक तापमान से ज्यादा गर्मी लगना तय है.
पानी की कमी, कपड़ों का असर
हर व्यक्ति की सहनशक्ति अलग होती है. अगर शरीर में पानी की कमी हो जाए, तो गर्मी ज्यादा लगती है. डिहाइड्रेशन से शरीर का तापमान नियंत्रण बिगड़ जाता है. इससे थकान और चक्कर भी आ सकते हैं.
गहरे रंग के कपड़े ज्यादा गर्मी सोखते हैं. टाइट कपड़े हवा को अंदर नहीं आने देते. इससे शरीर जल्दी गर्म होता है. हल्के रंग और ढीले कपड़े पहनने से गर्मी कम महसूस होती है.
सतह का तापमान, प्रदूषण का असर और मशीनोंवाहनों की गर्मी
मौसम विभाग हवा का तापमान बताता है. लेकिन जमीन, सड़क और दीवार का तापमान इससे ज्यादा हो सकता है. काली सड़कें जल्दी गर्म होती हैं. इनके पास रहने से गर्मी ज्यादा महसूस होती है. हवा में मौजूद धूल और प्रदूषण गर्मी को फंसा लेते हैं. इससे तापमान का असर बढ़ जाता है. प्रदूषित हवा शरीर को जल्दी थका देती है. इससे गर्मी ज्यादा महसूस होती है.
शहरों में एसी, वाहन और फैक्ट्रियां लगातार गर्मी छोड़ती हैं. इससे आसपास का तापमान बढ़ता है. यह भी महसूस होने वाली गर्मी को बढ़ाता है.
बचाव के उपाय
गर्मी से बचने के लिए कुछ आसान उपाय अपनाए जा सकते हैं. पर्याप्त पानी पिएं. धूप में जाने से बचें, खासकर दोपहर में. हल्के और ढीले कपड़े पहनें. घर को ठंडा रखने की कोशिश करें. हल्का और पौष्टिक भोजन लें. आराम करें और शरीर को ज्यादा थकाएं नहीं.
मौसम विज्ञानी डॉ आनंद शर्मा कहते हैं कि केवल तापमान ही गर्मी का सही माप नहीं होता. नमी, हवा, वातावरण और शरीर की स्थिति मिलकर तय करते हैं कि हमें कितनी गर्मी महसूस होगी. इसलिए 40 डिग्री सेल्सियस तापमान भी 46 डिग्री सेल्सियस जैसा लग सकता है. अगर हम इन कारणों को समझें और सावधानी बरतें, तो तेज गर्मी से खुद को सुरक्षित रख सकते हैं.



