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पूर्णिया की ‘अर्चना मां’, बच्चों के एजुकेशन के लिए समर्पित किया जीवन, शादी तक नहीं की… रिटायमेंट के पैसे से दलित बस्ती में चला रहीं पाठशाला

मां… यह शब्द अपने आप में भावनाओं का समंदर समेटे हुए है. मां ममता की मूर्ति है. वह शक्ति का प्रतीक है और जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा भी. मां का रिश्ता केवल जन्म देने तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह हर उस शख्स में झलकता है, जो किसी बच्चे का हाथ थामकर उसे सही राह दिखाए, उसके सपनों को संवार दे और उसके जीवन में उम्मीद की रोशनी भर दे. 10 मई को मदर्स डे है. टीवी 9 भारतवर्ष ऐसी ही प्रेरणादायी मांओं की कहानियां लेकर आ रहा है, जो अपने समर्पण, त्याग और प्रेम से न सिर्फ बच्चों का भविष्य गढ़ रही हैं, बल्कि समाज को भी एक नई दिशा दे रही हैं. आज इसी कड़ी में पूर्णिया के अर्चना की कहानी…

पूर्णिया की ‘अर्चना मां’, बच्चों के एजुकेशन के लिए समर्पित किया जीवन, शादी तक नहीं की… रिटायमेंट के पैसे से दलित बस्ती में चला रहीं पाठशाला
पूर्णिया की ‘अर्चना मां’, बच्चों के एजुकेशन के लिए समर्पित किया जीवन, शादी तक नहीं की… रिटायमेंट के पैसे से दलित बस्ती में चला रहीं पाठशाला

पूर्णिया के रानीपतरा गांव की रहने वाली अर्चना देव, जिन्हें इलाके के बच्चे प्यार से ‘अर्चना मां’ कहकर पुकारते हैं. अर्चना इस बात का जीताजागता उदाहरण हैं कि ममता केवल खून के रिश्तों तक सीमित नहीं होती. उन्होंने जीवन भर शादी नहीं की और एक सरकारी शिक्षिका के रूप में सेवा देते हुए बच्चों को ही अपना परिवार मान लिया. करीब 40 वर्षों तक स्कूल में पढ़ाने के बाद 31 अक्टूबर 2015 को जब वे रिटायर हुईं, तब उनके जीवन का असली मिशन शुरू हुआ.

दलित बस्ती में बच्चों को पढ़ाती हैं अर्चना

रिटायरमेंट के बाद मिले पैसों और अपनी पेंशन से उन्होंने दलित बस्ती में एक छोटा सा चबूतरा और टिन शेड बनवाया. यही स्थान आज एक निःशुल्क विद्यालय के रूप में सैकड़ों बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बन चुका है. चांदी पंचायत के रानीपतरा गुमटी स्थित अनुसूचित जाति टोला में चल रहे इस स्कूल में वर्तमान में करीब 100 से अधिक बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं.

अर्चना मां इन बच्चों के लिए सिर्फ एक शिक्षिका नहीं, बल्कि पैरेंट्स की भूमिका भी निभाती हैं. यहां पढ़ने वाले कई बच्चे ऐसे हैं, जिनके सिर से पिता का साया उठ चुका है या जिनके परिवार बेहद गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं. अर्चना मां न केवल उन्हें मुफ्त शिक्षा देती हैं, बल्कि कॉपीकिताब, कपड़े और जरूरत पड़ने पर आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराती हैं. बच्चों के चेहरे पर मुस्कान देखना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बन चुका है.

‘सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा’

अर्चना कहती हैं कि समाज में बदलाव लाने का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा है, खासकर लड़कियों की शिक्षा. वे बच्चियों को आत्मनिर्भर और आत्मसम्मानी बनाने पर विशेष जोर देती हैं. उनका विश्वास है कि यदि एक लड़की शिक्षित होती है, तो पूरा परिवार शिक्षित होता है और समाज में सकारात्मक बदलाव आता है.

उनकी मेहनत का असर अब साफ नजर आने लगा है. इस बस्ती के कई बच्चे आज उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं, कुछ ने जिला स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई है, तो कई बच्चे धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलकर लोगों को चौंका रहे हैं. अर्चना मां खुद बच्चों के घरघर जाकर अभिभावकों को समझाती हैं और उन्हें अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित करती हैं.

उनका स्कूल सरकारी स्कूलों के समय के अनुसार चलता है. जब सरकारी स्कूल दिन में लगते हैं, तो वे सुबह 6 बजे से पढ़ाती हैं, और जब स्कूल सुबह होते हैं, तो वे शाम 4 बजे से कक्षाएं शुरू करती हैं. उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका उत्साह और समर्पण किसी युवा शिक्षक से कम नहीं है.

शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई सम्मान भी मिल चुके हैं, जिनमें शिक्षक गौरव रत्न अवार्ड, आयरन लेडी अवार्ड और शिक्षक रत्न अवार्ड शामिल हैं. लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार बच्चों का उज्ज्वल भविष्य है.

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