कोलकाता में चाय के ठीहों पर तमाम ऐसे युवकों का जमावड़ा देखने को मिल जाएगा, जो वहां खड़े हो कर कैरम खेल रहे होते हैं. सुबह 10 बजे से इनका जमावड़ा शुरू होता है और देर रात तक उनकी बैठकी जमी रहती है. श्याम बाज़ार, शोभा बाज़ार, बीके पॉल एवेन्यू, कुम्हार टोली, हाथी बाग़ान, बहू बाज़ार स्ट्रीट, कॉलेज स्ट्रीट आदि स्थानों पर ये युवक कैरम खेलते मिल जाएंगे. उनके जमावड़े को बैठकी भले कहा जाए पर वे किसी स्थान पर बैठ कर कैरम नहीं खेलते बल्कि एक चार फिट ऊंची टेबल पर कैरम बोर्ड रखेंगे और उसके चारों तरफ़ लोग घिर आयेंगे. बीचबीच में कट चाय आती रहेगी, सिगरेट भी.

ये युवक निहत्थे नहीं रहते, सबके पास कोई छुरी, तमंचा अथवा और कोई हथियार तो होगा ही. इन्हें मस्तान या चेंगड़ा कहा जाता है. कम्युनिस्ट शासन रहा हो अथवा तृणमूल का, यहां के युवाओं की ज़िंदगी के ये अहम हिस्से हैं.
नक्सल आंदोलन से उपजे युवा मस्तान बने
मस्तान अर्थात् उत्तर भारत में गुंडा या दादा. कहीं कोई झगड़ा हो जाए ये फ़ौरन पहुंच जाएंगे. ऊपर से शांत किंतु अंदर से आग का लावा बने ये युवक कोई भाड़े के गुंडे नहीं हैं बल्कि इन्हें बना दिया गया है. पश्चिम बंगाल की हर सरकार ने इन्हें पालापोसा है. 1977 के बाद जब यहां वाम मोर्चा की सरकार आई तब एक बड़ा संकट था, उन नौजवानों पर कैसे क़ाबू पाया जाए, जिन्हें पूर्व की कांग्रेस सरकार ने खूब मारा था और उन्हें एक लावारिस ज़िंदगी जीने पर विवश कर दिया था.
दरअसल 1966 में पश्चिम बंगाल में एक भीषण आंदोलन शुरू हुआ था, इसे सिलीगुड़ी समूह कहा गया. यह आंदोलन था, आदिवासियों और भूमिहीनों द्वारा ज़मीन के लिए संघर्ष करना. दार्जिलिंग ज़िले की सिलीगुड़ी तहसील के गांव नक्सलबाड़ी से उपजे इस आंदोलन के पीछे चीन समर्थक मार्क्सवादीलेनिनवादी युवा थे. शुरू में यह आंदोलन सिर्फ़ असंगठित था पर 1967 में इसने एक राजनीतिक स्वरूप ले लिया.
कैसे बनाएंगे भयोशून्य बंगाल!
पश्चिम बंगाल में अब बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बन चुके हैं. अब उन्हें अपने उन वायदों पर खरा उतरना होगा, जो उन्होंने राज्य की जनता से किए हैं. अपने शपथ ग्रहण की पूर्व संध्या पर उन्होंने भयमुक्त पश्चिम बंगाल बनाने का वायदा किया था. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सोनार बांग्ला के सपने को साकार करने का वादा किया. पर बंगाल सोनार बांग्ला तब ही बन सकता है जब पश्चिम बंगाल अपराध मुक्त हो जाए. चेंगड़ा और मस्तान तत्त्वों की सत्ता ख़त्म हो जाए तथा पुलिस निष्पक्ष हो कर काम करे.
पिछले 60 वर्षों से पश्चिम बंगाल में कभी भी कहीं भी बम फट सकते हैं, परशुरामी हो सकती है परंतु पुलिस निस्पृह बनी रहती है. क्योंकि राज्य की विगत सरकारों ने बेरोजगारों की फ़ौज को और कोई काम करने नहीं दिया. ऐसे में उनके पास एक ही रास्ता बचता है और वह पूजा के बहाने वे चंदा इकट्ठा करें और उस कमाई से ज़िंदगी गुज़ारें.
रॉय बाबू की सरकार द्वारा कुचले गए नौजवान
1972 से 1977 के बीच कांग्रेस की सिद्धार्थ शंकर रॉय सरकार की पुलिस ने नक्सलबाड़ी आंदोलन से निकले युवाओं को कुचलने की फुर्ती में यह भी नहीं देखा कि कौन आरोपी है या कौन सामान्य घर से आया नौजवान. 13 से 25 वर्ष की उम्र का कोई भी नौजवान या कुम्हार टोली, बीके पॉल एवेन्यू, श्याम बाज़ार अथवा शोभा बाज़ार में घूमता दिखा तो बस सीधे उसे गोली का निशाना बनाया गया.
इस पुलिस गोलीबारी में वे नौजवान अधिक मारे गये, जिनकी मसें फुट रही थीं, जो अपने घर के चिराग़ थे. पुलिस इस आंदोलन में घुसे अराजक तत्त्वों को तो पकड़ नहीं पाई, पकड़ा उन्हें जो राजनीति का क ख ग तक नहीं जानते थे. उन्हें इसलिए मारा गया क्योंकि वे जवान हो रहे थे. जबकि इस आंदोलन के अगुआ साफ़ बचा लिये गये क्योंकि वे अधिकतर उच्च मध्यम वर्ग से आए थे. किसी का बाप आईजी था तो किसी का बाप होम सेक्रेटरी.
माले ने अंधेरे में तीर चलाया
इस हिंसा और नक्सलबाड़ी आंदोलन पर सीपीएम के नेता विप्लब दासगुप्ता ने 1975 में The Naxalite Movement नाम से एक पुस्तक लिखी थी, जिस्म इन तथ्यों का विस्तार से वर्णन है. यह आंदोलन को चलाने वाले नेता चीन के उकसावे में आ कर यह भूल कर बैठे और एक ऐसा हिंसक आंदोलन शुरू कर दिया, जिसके पीछे कोई ठोस रणनीति नहीं थी. चूंकि 1967 से 1972 के बीच पश्चिम बंगाल में सरकारें बहुत कमजोर रहीं. इस अवधि में तीन बार राष्ट्रपति शासन रहा और चार बार सरकारें बनीं.
हर सरकार बस कुछ ही समय तक चल सकी. तीन बार अजय कुमार मुखर्जी और एक बार प्रफुल्ल चंद्र घोष की सरकार रही. इस अस्थिरता का फ़ायदा उठा कर नक्सल आंदोलन के नेता सर्वहारा क्रांति के सपने देखने लगे. यूं भी नक्सलबाड़ी गांव जंगली क्षेत्रों में स्थित था. यहां आदिवासी आबादी काफ़ी थी. इस आंदोलन के नेता हथेली पर सरसों उगा रहे थे.
विरासत में छोड़ गए भटके हुए नौजवान
1972 में जब इंदिरा कांग्रेस के सिद्धार्थ शंकर रॉय ने सरकार बनाई तब उनके निशाने पर नक्सलबाड़ी से जुड़े नेताओं का सफ़ाया था. क़ानू सान्याल को गिरफ़्तार कर लिया गया और चारू मजूमदार की मृत्यु हो गई. इसके बाद आंदोलन बिखरने लगा किंतु इस आंदोलन के नेतृत्व ने जिन युवाओं को भर्ती किया था, वे अनुशासनहीन हो गये. हिरावल दस्ते के नाम पर निम्न मध्यवर्ग के किशोर भरे गये थे या लुंपेन तत्त्व जिनका काम बटमारी या जेबकतरी था. ये लुंपेन तत्त्व तो पुलिस से आंखमिचौली करने में माहिर थे लेकिन निम्न मध्यवर्गीय परिवारों से आए छात्र पकड़पकड़ कर मारे गये.
इनकी हत्याओं के ख़िलाफ कोई आवाज़ तक उठाने वाला नहीं था. मशहूर बांग्ला कथाकार महाश्वेता देवी ने अपने उपन्यास हज़ार चौरासी की मां में इस वर्ग के किशोरों की हत्या का मार्मिक वर्णन किया है. रॉय बाबू की सरकार ने नक्सल आंदोलन का सफ़ाया तो किया किन्तु मस्तान लोगों की फ़ौज खड़ी कर दी.
संसदीय राजनीति में तब नहीं थी माले
1977 में जब वाम मोर्चे की सरकार बनी तब उनके समक्ष नक्सल आंदोलन से जुड़े रहे युवाओं से निपटना एक बड़ी समस्या थी. वाम मोर्चा सरकार रॉय बाबू की तरह सफ़ाया आंदोलन तो चला नहीं सकती थी. हालांकि इस आंदोलन को राजनीतिक स्वरूप देने वाले भी कम्युनिस्ट पार्टियों से जुड़े रहे थे. किंतु 1967 में उन्होंने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादीलेनिनवादी बना कर वाम मोर्चे से अलग रास्ता बना लिया था.
यूं भी यह CPIML सर्वहारा क्रांति को ही सत्ता का अकेला रास्ता मानती थी. उसे संसदीय राजनीति में रुचि नहीं थी. इसलिए उनके साथ कोई वार्ता संभव नहीं थी. दूसरी तरफ़ केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार के पतन के बाद जनता पार्टी की सरकार आ गई थी. इमरजेंसी के दौरान हुए अत्याचारों की फेहरिस्त सामने आ रही थी. मेरी टाइलर नाम की एक अमेरिकी महिला की पुस्तक भारतीय जेलों में मेरे पांच साल छप कर आ गई थी. इसमें बंगाल पुलिस की क्रूरता के क़िस्से थे.
ऑपरेशन बर्गा के फ़ायदे और नुकसान
वाम मोर्चा की ज्योति वसु सरकार ने एक तरफ़ तो भूमिहीनों को ज़मीन का हक़ दिया. उनकी सरकार में भूमि सुधार मंत्री रहे विनय कृष्ण चौधरी ने ऑपरेशन बर्गा चला कर प्रदेश के 17 लाख बटाईदार किसानों को ज़मीन के पट्टे दिये और एक झटके में बंगाल के जमींदारों की सत्ता ख़त्म कर दी. भूमि सुधार का सेंस बड़ा लाभ मुसलमान किसानों को मिला. लेकिन भूमिसुधार आंदोलन के चलते वे किसान भी बेरोज़गार हो गये जो अपनी लंबीचौड़ी ज़मीनों के बूते पल रहे थे.
ऐसे किसानों को एब्सेंट्री लैंडलॉर्ड कहा जाता था. एक तरफ़ तो नक्सल आंदोलन के ध्वस्त हो जाने से उससे जुड़े युवा सड़कों पर आ गये, दूसरी तरफ़ ये एब्सेंट्री लैंडलॉर्ड. ये सब सीपीएम के साथ जुड़ गये और सरकार से कुछ पाने की उम्मीद करने लगे. वाम मोर्चा सरकार ने इन लोगों को अपने प्रचार में लगा दिया. ये लोग वाम मोर्चा के पालतू गुंडे बन गये.
वसूली और गुंडई के लिए बनाई गई फौज
कोलकाता में ये बंद होती फ़ैक्ट्री वर्कर्स के नये मसीहा बन गये जो कारख़ाना मालिकों से पैसा मज़दूरों को दिलवाते और लंबी रकम ख़ुद भी लेते. दुर्गा पूजा के दौरान पंडालों को सजाने के लिए लोगों से पैसा वसूलते. चूंकि बंगाल में हर महीने किसी न किसी देवीदेवता की पूजा होती ही रहती है इसलिए इनके खानेपीने का जुगाड़ हो गया. जब ममता बनर्जी ने वाम मोर्चा के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला तब यही मस्तान उनके कार्यकर्ताओं से मारपीट करते.
ममता ने वाम दलों की इस वाहिनी को समझा और अपने पैरेलल मस्तान खड़े किए, इन्हें चेंगड़ा कहा गया. वाम दलों ने तो फिर भी इन पर क़ाबू बनाये रखा था लेकिन ममता बनर्जी के समय ये छुट्टा सांड़ हो गये. फिरौती, वसूली, रेप आदि में भी इनका नाम आने लगा. जबकि ममता के पहले छेड़खानी के मामलों में किसी मस्तान का नाम नहीं जुड़ा था.
शुभेंदु के सामने चुनौतियां
अब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को इन मस्तान और चेंगड़ा तत्त्वों से निपटना होगा. गुंडा तत्त्वों के लिए निज का लाभ ही एकमात्र उद्देश्य होता है. जैसे वाम मोर्चे के वक़्त के कैरम क्लब, पूजा क्लब से जुड़े मस्तान सरकार पलटते ही ममता के ख़ेमे में चले गये थे. वैसे ही ये तत्त्व अब बीजेपी में आयेंगे. यहां तो वैसे भी जय श्रीराम का नारा उनको और जोड़ देगा. अगर इन तत्त्वों पर क़ाबू न पाया गया तो बंगाल को मस्तान तत्त्वों के हाथों जाने से कौन बचाएगा. लेकिन बचाने का अकेला तरीक़ा है पुलिसिंग का इस्तेमाल अपराध रोकने के लिए किया जाए. ताकि पश्चिम बंगाल क्राइम फ्री हो जाए. इससे व्यापार और उद्योग पनपेंगे. तब रोजगार के अवसर मिलेंगे. रोजगार ही अकेला ज़रिया है अपराधियों पर क़ाबू पाने का.



