अभी यह दूर की कौड़ी लगती है किंतु तमिलनाडु के नये मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने शपथ लेते समय तमिल स्वाभिमान पर जोर दिया. द्रविड़ एकता पर उन्होंने कोई बात नहीं कही. पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने सनातन, ब्राह्मण, हिन्दी और उत्तर के प्रति जैसी विरक्ति दिखाई थी, वैसी कोई विरक्ति नहीं दिखी. विजय ने अपने साथ जिन नौ मंत्रियों को शपथ दिलवाई उनमें से एक ब्राह्मण हैं. कई दशकों बाद कोई ब्राह्मण मंत्री बना. चुनाव में DMK और ADMK ने किसी ब्राह्मण को टिकट तक नहीं दिया था. कोई भी मुस्लिम मंत्री नहीं है और न ही द्रविड़ परंपरा के वाहक. उलटे एक मंत्री तो हाल तक तमिलनाडु में बीजेपी का आईटी सेल देख रहा था. जोसफ विजय को कांग्रेस के अलावा सीपीआई, सीपीएम और IUML समेत VCK ने भी सपोर्ट किया. इस तरह 13 और विधायकों का समर्थन मिलने से उनके साथियों की संख्या 120 हो गई, जो बहुमत से दो अधिक हैं. तमिलनाडु में यह चमत्कार 59 वर्षों बाद हुआ है जब कोई द्रविड़ राजनीति का नेता सरकार में नहीं आ पाया है.

विजय थलापति का करुणामयी चेहरा
यद्यपि तमिलनाडु की जनता में जोसेफ विजय, जिन्हें विजय थलापति भी कहा जाता है, से कोई खास उम्मीद नहीं है. वे नहीं मानते कि विजय पूर्व की द्रमुक पार्टियों से भिन्न कोई सरकार दे पायेंगे फिर भी वे अभी जोसफ विजय का विरोध नहीं कर रहे हैं. क्योंकि विजय उन्हें स्टालिन की तुलना में सॉफ्ट और करुणामयी दिखता है. खासतौर पर सितंबर 2025 की रैली में मरने वाले सभी 41 लोगों के परिवार को उन्होंने 2020 लाख का मुआवजा दिया था और घायलों के उपचार के लिए 22 लाख की आर्थिक मदद. इससे विजय थलापति की एक जनप्रिय छवि बनी थी. यूं भी विजय थलापति का बैकग्राउंड किसी राजनेता का नहीं बल्कि तमिल फिल्मों के सुपर स्टार हीरो का है. इसीलिए जनता को भरोसा है कि थलापति विजय पूर्व के नेताओं की तरह आम लोगों की पीड़ा की अनदेखी नहीं करेंगे. स्टालिन ने अपने बयानों से तमिल जनता में असंतोष भर दिया था.
वायदों पर खरे उतर पायेंगे विजय थलापति
विजय थलापति की जीत को जेनजी की जीत बताया गया है. ठीक वैसी ही जैसी जीत नेपाल में बालेन शाह की हुई थी. दो वर्ष पहले फरवरी 2024में उन्होंने TVK पार्टी बनाई और 2026 में उनकी पार्टी भारी जीत से आ गई. जीत भी कोई ऐसीवैसी नहीं बल्कि 59 वर्ष पुरानी द्रविड़ राजनीतिक पार्टियों को परास्त कर. 2013 के विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने जैसी धमाल मचाई थी, कुछ वैसी ही विजय थलापति ने तमिलनाडु में मचा दी. उन्होंने भी अरविंद केजरीवाल की तरह 200यूनिट बिजली फ्री देने का वायदा किया है और बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा. यह दिलचस्प है कि दिल्ली में बस में चलने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम है. परंतु तमिलनाडु एक सादगी पसंद राज्य है. वहां खूब खातेपीते घरों की महिलाएं भी अपनी कार से चलने की बजाय सार्वजनिक वाहनों पर चलना पसंद करती हैं. यहां तक कि टैक्सियों में भी नहीं.
सहयोगियों पर कितना भरोसा
अपने वायदों को पूरा करना विजय थलापति को भी आसान नहीं होगा. यह ठीक है कि उनकी निज की संपत्ति 624 करोड़ से ऊपर है और उनके अंदर लोगों के प्रति करुणा है. उन्होंने नामांकन के समय अपने शपथ पत्र में 404 करोड़ की चल संपत्ति बताई और 220 करोड़ की अचल संपत्ति. मगर कुछ लोगों की तो निजी कोष से मदद की जा सकती है, पूरे प्रदेश की नहीं. अगर तमिलनाडु में व्यापार और उद्योग के अनुकूल माहौल नहीं बनाया गया तो पांच वर्ष तक शासन चलाना बहुत आसान नहीं होगा. वह भी तब जब उन्हें बहुमत जुगाड़ने के लिए पांच पार्टियों का सहयोग लेना पड़ा है. ये सभी पार्टियां DMK की सहयोगी रही हैं. कांग्रेस तो DMK से अलग हुई पर CPI, CPM, IUML और VCK ने विजय थलापति की पार्टी TVK का सपोर्ट तो किया है पर ये दल DMK गठबंधन से अलग नहीं हुए हैं. इसलिए विजय थलापति के समक्ष अल्पमत में आने का संकट सदैव बना रहेगा.
महिला टास्क फोर्स की पहल
हालांकि तमिलनाडु में महिला सशक्तीकरण उत्तर के राज्यों से बेहतर है. छेड़खानी या उनके साथ भेदभाव की घटनाएं कम सुनने को मिलती हैं. वहां टैक्सी, ऑटो चलाती या मछलियां बेचती महिलाएं खूब दीखती हैं. मगर दारू पी कर पतियों द्वारा पत्नियों की पिटाई वहां भी आम है. लोकलाज वश वे कुछ बोल नहीं पातीं. विधवा विवाह वहां भी आम नहीं है. कई तो कम उम्र की बच्चियों को जिंदगी विधवा के तौर पर काटनी पड़ती है. छेड़छाड़ भले न हो किंतु तमिलनाडु समेत दक्षिण की युवतियां भी सेक्स वर्कर के पेशे में हैं. विजय थलापति किस तरह महिलाओं को सुरक्षा दे पायेंगे, यह देखना है. महिला टास्क फोर्स में क्या महिलाओं को ही नौकरियां दी जायेंगी? यदि वे यह पहल करते हैं तो महिलाओं के लिए रोजगार के दरवाजे भी खुलेंगे. उन्होंने अल्पसंख्यकों के प्रति भी अपनी पूरी मदद का आश्वासन दिया है.
तमिलनाडु फर्स्ट
विजय थलापति खुद ईसाई समुदाय से आते हैं परंतु हिंदू बहुल तमिलनाडु में उनकी जीत और उनकी सरकार उनके निजी प्रयासों से बनी है. वे तमिल फिल्मों के लोकप्रिय हीरो रहे हैं. पर उन्होंने 59 वर्ष पुरानी द्रविड़ सरकार को उखाड़ फेका क्योंकि उन्होंने निशाने पर DMK की सरकार के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को रखा. वे अपनी पार्टी का नाम तमिलगा वेट्री कज़गम रखा. प्रतीक रूप से यह द्रविड़ दलों से भिन्न है. इसमें द्रविड़ स्वाभिमान नहीं बल्कि तमिल अस्मिता का आभास होता है. उन्होंने शपथ ग्रहण के बाद तमिल फर्स्ट की बात भी कही. अभी तक तमिल अस्मिता को द्रविड़ अस्मिता कहा जाता था. इस शब्द में तमिल की बजाय द्रविड़ फर्स्ट की गूंज आती थी. द्रविड़ सभ्यता अर्थात् जो देश की मुख्यधारा से अलग की कोई सभ्यता है. मगर जब हम तमिल अस्मिता की बात करते हैं तो वह संपूर्ण भारत की अस्मिता का एक स्वाभाविक अंग बन जाता है.
राष्ट्रीय पार्टियों से गठबंधन मजबूरी
शब्दों का यह हेरफेर विजय थलापति और उनकी पार्टी TVK को भारत की मुख्य धारा से जोड़ती है. यह एक स्वागतयोग्य पहल है. केंद्र की सरकारों की दिक्कत यह रही है कि उनको तमिलनाडु में अपना वजूद बनाये रखने के लिए DMK अथवा AIADMK के साथ जुड़ा रहना पड़ता था. कांग्रेस तो जुड़ी ही 1999के बाद बीजेपी की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार भी करुणानिधि की सहायता ली थी. तमिलनाडु में 39 सांसद हैं. उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती. आजादी मिलने के पूर्व जब अंग्रेजों ने मद्रास प्रेसीडेंसी कायम की थी तब इसमें आंध्र और केरल के भी इलाके थे. तमिलनाडु बनने पर मद्रास तमिलनाडु के हिस्से में आया तो तिरूपति आंध्र के हिस्से में. इस वजह से द्रविड़ राजनीति तमिलनाडु या सुदूर दक्षिण तक सिमट गई. पुराने त्रावणकोर रियासत से कन्या कुमारी और नागरकॉइल इलाके तमिलनाडु में ले लिए गए.
DMK की हार्डकोर हिन्दी विरोधी छवि
इस तरह द्रविड़ अस्मिता से सिर्फ तमिलनाडु जुड़ा. बाकी के दक्षिणी राज्यों आंध्र, कर्नाटक, केरल आदि इससे अलग रहे. दरअसल तमिलनाडु के अलावा शेष तीनों राज्य कहीं न कहीं इंडोआर्यन भाषाओं से जुड़े हुए थे. जैसे आंध्र छत्तीसगढ़ से, कर्नाटक महाराष्ट्र से और केरल गोवा से. परंतु तमिलनाडु सुदूर दक्षिण का इकलौता ऐसा राज्य था जो उस भाषा क्षेत्र से एकदम अलग था जो कहीं न कहीं इंडोआर्यन भाषा क्षेत्र से जुड़ा था. इसलिए यहीं से द्रविड़स्तान की मांग भी उठी. उत्तर, संस्कृत, ब्राह्मण के विरुद्ध माहौल बना. यही कारण था कि त्रिभाषा फार्मूला भी यहां नहीं लागू हो सका. 1967 में यहां कांग्रेस सरकार का खात्मा हो गया. सीएम अन्नादुरई के नेतृत्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम सरकार बनी. उनके बाद उनके दो खास शिष्यों के करुणानिधि और एमजी रामचन्द्रन ने यह पार्टी संभाली. इसमें भी करुणानिधि हार्डकोर द्रविड़ राजनेता थे.
MGR की उदार छवि
एमजी रामचन्द्रन अपेक्षाकृत उदार थे और उन्होंने उत्तर के प्रति लड़ाकू रवैया नहीं रखा. फिर भी 1971से 1977 तक कांग्रेस करुणानिधि की DMK के साथ गठबंधन करती रही. किंतु 1977 में एमजी रामचन्द्रन की AIADMK के साथ गठबंधन किया और 1980 में फिर DMK से. लेकिन बाद में राजीव गांधी ने AIADMK के साथ गठबंधन किया. एमजी रामचन्द्रन के बाद काफी उठापटक उनकी पार्टी और उनकी विरासत में चली. पर अंततः जय ललिता काफी संघर्ष के बाद तमिलनाडु की मुख्यमंत्री हुईं. उनके समय तमिलनाडु में उदारवाद की लहर चली और उत्तर तथा हिन्दी के विरुद्ध तल्खी कम हुई. 2016 में उनकी मृत्यु के बाद AIADMK कमजोर पड़ती गई. हालांकि उनकी पार्टी की सरकार 2021 तक रही. इसके बाद करुणानिधि के बेटे स्टालिन मुख्यमंत्री हुए.
स्टालिन विविधता को समझ नहीं सके
स्टालिन ने आते ही पुनः द्रविड़ राजनीति को उत्तर का विरोधी बनाने की कोशिश की. ब्राह्मण विरोधी और उत्तर विरोधी तथा इसीलिए हिन्दी विरोधी राजनीति शुरू की. लेकिन वे भूल गए कि 1967 से 2021 के बीच बड़ा गैप आ गया था. तमिलनाडु में हिन्दी विरोधी राजनीति संभव नहीं थी. उद्योगव्यापार पर उत्तर भारतीय पॉवरफुल हो गये थे और आम जनता के रूप में तमाम सारे कॉर्पोरेट दफ़्तरों और प्राइवेट इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में ऊंची फीस दे कर उत्तर के छात्र भर गये थे. इनके लिए टिफिन तैयार करने वाले आम लोग भी उत्तर से आ गए थे. ये सब हिन्दी भाषी थे. इसलिए स्टालिन का भीषण विरोध हुआ और विजय थलापति ने उम्मीदें जगाईं. हालांकि द्रविड़ राजनीति को खत्म नहीं कहा जा सकता परंतु उसकी धार कम हुई है. GENZ यही भीड़ थी, जो विजय थलापति को ले कर आई. अब वे कैसे तमिलनाडु को शेष भारत के अनुरूप बनायेंगे, यह देखना है.



