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हजारों वर्षों की आस्था और स्वाभिमान का प्रतीक सोमनाथ मंदिर, जानें पूरा इतिहास

आज गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं. यह मंदिर 11 मई 1951 को बन कर तैयार हुआ. इसका लोकार्पण प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था और सरदार वल्लभ भाई पटेल के संकल्प और साहस से इस मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ. इस मंदिर को 1026 में विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी ने लूटा और तोड़ा. इसके बाद 1299 में सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी ने इसे तुड़वाया और फिर कहा जाता है कि मुगल शासक औरंगज़ेब के आदेश पर इसे तोड़ा गया.

हजारों वर्षों की आस्था और स्वाभिमान का प्रतीक सोमनाथ मंदिर, जानें पूरा इतिहास
हजारों वर्षों की आस्था और स्वाभिमान का प्रतीक सोमनाथ मंदिर, जानें पूरा इतिहास

परंतु औरंगज़ेब द्वारा ऐसे किसी आदेश के प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं. सन् 1783 में मराठा रानी अहिल्या बाई होलकर ने सोमनाथ मंदिर को बनवाया और पूजा शुरू करवाई. किंतु आज का सोमनाथ मंदिर आज़ादी के बाद बना है. इसे भारत सरकार में गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल के प्रयासों से बनवाया गया.

गांधी जी की सहमति से बना मंदिर

हालांकि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सरकार द्वारा मंदिर बनवाए जाने के विरोधी थे. लेकिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी पटेल के संकल्प के प्रति विश्वास जता रहे थे और कांग्रेस में केएम मुंशी समेत कई और नेता इसके पक्ष में थे. आज़ादी के फ़ौरन बाद 1947 में ही सोमनाथ मंदिर का प्रस्ताव लाया गया था. कहते हैं गांधी जी भी सोमनाथ मंदिर बनाये जाने के प्रयासों से सहमत थे. पर वे चाहते थे कि सोमनाथ मंदिर के लिए धन जनता के मार्फ़त से एकत्र किया जाए, सरकार इस मद में पैसा न लगाये.

इसके बाद सोमनाथ ट्रस्ट बनाया गया, जिसने धन एकत्र करने की ज़िम्मेदारी ली. केएम मुंशी इस ट्रस्ट के अध्यक्ष बने. वे तब सरकार में नागरिक आपूर्ति मंत्री थे. वे चाहते थे कि सरकार इस पुनर्निर्माण में आर्थिक मदद करे. मगर नेहरू जी अड़ गये इसलिए इसके लिए धन चीनी सिंडिकेट के मार्फ़त लिया गया.

चीनी खरीद से आया धन

दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार और भारतीय चीनी सिंडिकेट के बीच एक करार हुआ, जिसके अनुसार प्रति मन चीनी की ख़रीद में छह आने सोमनाथ ट्रस्ट को मिलेंगे. अक्टूबर 1950 में यहां के मस्जिदों को कुछ दूरी पर ले जाने को कहा गया और प्रभाष पाटन तीर्थ पर भव्य सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण शुरू हुआ. यह मंदिर गुजरात के परंपरागत सोमपुरा शैली में बनाया गया.

जल्दी ही 11 मई 1951 को राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा मूर्ति स्थापना समारोह संपन्न हुआ. सोमनाथ मंदिर भारत के अति प्राचीन मंदिरों में से रहा है. कहा जाता है कि चन्द्र देव ने अपने ऊपर लगे शाप की मुक्ति के लिए शिव जी से प्रार्थना की थी. बाद में उन्होंने ही यह मंदिर बनवाया. चन्द्र देव द्वारा यह मंदिर बनवाए जाने के कारण इसे सोमनाथ मंदिर कहा जाता है. शिव पुराण में भी इस मंदिर का उल्लेख है.

शिव पूजा पूरे देश में व्याप्त रही

शैव मत भारतीय धर्मग्रंथों में कितना प्राचीन है, इसका पता नहीं चलता. इसीलिए शिव को आदि देव, देवाधिदेव कहा गया है. वेदों में ये रुद्र हैं और इन्हें सृष्टि के विनाशक, रक्षक और अति कल्याणकारी बताया गया है. शिव आर्यों के इतर द्रविड़ सभ्यता में भी विद्यमान है. द्रविड़ सभ्यता में विष्णु को स्वीकार्यता बाद में मिली परन्तु शिव वहां सर्व स्वीकार्य थे. लंका के अधिपति दशानन रावण भी शिव भक्त था और उसे नष्ट करने की इच्छा से राम ने सबसे पहले शिव पूजा की.

रामेश्वरम में श्रीरामनाथ मंदिर में शिव का ही विग्रह है. वहां से रामसेतु की तरफ़ चलने पर विभीषण मंदिर मिलता है, वहां भी आराध्य शिव का विग्रह है. अर्थात् शिव कैलाश के शिखर से सुदूर हिन्द महासागर के तट तक विराजमान हैं. परवर्ती काल में शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग को स्वीकार्यता मिली और शैव भक्तों को इनका दर्शन अनिवार्य बता दिया गया.

ज्योतिर्लिंगों में सबसे ऊपर सोमनाथ

इन ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान सोमनाथ को कहा गया. शिव स्रोत में कहा गया है, सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥ परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्। सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥ वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥ एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः। सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥ एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति। कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वराः॥ अर्थात् सौराष्ट्र में सोमनाथ, आंध्र के श्री शैलम में मल्लिकार्जुन, उज्जैन में महाकाल और खंडवा में ओंकारेश्वर, उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग में केदारनाथ, पुणे में भीमाशंकर, वाराणसी में विश्वनाथ, नासिक में त्र्यंबकेश्वर, झारखंड के देवघर में वैद्यनाथ, तमिलनाडु में रामेश्वरम, द्वारिका में नागेश्वर और महाराष्ट्र के औरंगाबाद में घृष्णेश्वर.

अरब और ईरान तक फैली थी सोमनाथ की ख्याति

महाशिवरात्रि को इन ज्योतिर्लिंगों की विशेष पूजा का विधान है. इन सभी ज्योतिर्लिंगों की स्थिति से यह भी स्पष्ट होता है कि पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण आदि सभी दिशाओं में शिव प्रतिष्ठित हैं. इनमें सबसे पहला स्थान सोमनाथ को मिला है, जो गुजरात राज्य के सौराष्ट्र आंचल में हैं. पूरे देश भर के शैवों की आस्था सोमनाथ में रही है. सदियों से देश के हर कोने से यहां भक्त आते रहे हैं और मंदिर को समृद्ध तथा भव्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई. राजाओं, महाराजाओं और श्रेष्ठियों ने दिल खोल कर दान दिये.

देश के पश्चिमी कोने में अरब सागर के तट पर स्थित इस मंदिर की ख्याति अरब और ईरान तक थी. सोमनाथ को प्रभाष पट्टन कहा जाता था. यहां अरबी और ईरानी सौदागर आते तथा भारतीय माल को अपने देश में ले जाते. यह एक ऐसा तट है, जहां पर समुद्र की सीमाएं सीधे अंटार्कटिका तक चली गई हैं.

महमूद गजनवी की नज़र

इस मंदिर की समृद्धि और भव्यता को सुनसुन कर महमूद गजनवी की नज़र इस मंदिर पर थी. उसने भारत पर पहला हमला सन् 999ईस्वी में किया था. कुल 17 बार वह लगातार भारत में लूटपाट करता रहा. कई बार वह पराजित भी हुआ किंतु काइयां महमूद माफी मांग कर बच जाता. उसको किसी ने कह रखा था कि कभी भारत में युद्ध में परास्त होने लगो तो गोंगों की आवाज़ गले से निकालना. अर्थात् गाय की तरह रंभाना. हिंदुस्तान में गाय पर हमला नहीं हो सकता. इसलिए एक बार मथुरा में जब वसुदेव नाम के राजा ने उसे दबोच लिया तो महमूद ने गले से गोंगों की आवाज़ निकाली. वसुदेव ने उसे छोड़ दिया.

परंतु कुटिल महमूद कहां मानने वाला था. सन् 1025में वह गजनी से एक बड़ी सेना को ले कर निकला और सीधे सोमनाथ पर हमला किया. भारतीय राजा जब तक एकत्र हो कर प्रतिरोध करते वह मंदिर लूट ले गया.

सोमनाथ के ध्वस्त होने से सन्न रह गये हिंदू

सोमनाथ मंदिर को भी कोई दुरात्मा लूट सकता है, ऐसा हिंदुओं ने कभी सोचा तक नहीं था. सोमनाथ शैव मत की सभी शाखाओं का आराध्य स्थल तो था ही, वे हिंदू भी आते जो वैष्णव या शाक्त होते. क्योंकि तब तक शैव, वैष्णव, शाक्त, उत्तर और दक्षिण सब का संगम हो चुका था. आख़िरी तमिल संगम के बाद उत्तर और दक्षिण के बीच के मतभेद भी ख़त्म हो गए थे. मगर तुर्क महमूद गजनवी को हिंदुओं की भावना से उसे क्या लेना.

छह जनवरी 1026 को उसने छह टन सोने का शिवलिंग तोड़ दिया और करोड़ों की दौलत समेत कर ले गया. जिस समय यह लूट हुई मंदिर परिसर में 50 हज़ार श्रद्धालु मौजूद थे, उन सभी को लुटेरे महमूद के सिपाहियों ने क़त्ल कर दिया. चूंकि गुजरात के चालुक्य राजाओं ने गजनवी के हर आक्रमण को विफल किया इसलिए अपने 15 वें आक्रमण में उसने सीधे गुजरात को निशाना बनाया.

मंदिर के खर्चापानी के लिए लगे थे 10 हजार गांव

सोमनाथ मंदिर की स्वायत्ता बनाये रखने के लिए मंदिर के साथ 10 हज़ार गांव जोड़ दिये गये थे ताकि मंदिर किसी राजा या सेठ की अनुकंपा पर न रहे. इन गांवों से मंदिर की इतनी अधिक आय होती कि मंदिर के पास सदियों से संचित सोना, चांदी व हीरेजवाहरात के भंडार भरे थे. यही सब ख्याति सुन कर महमूद ने 18 अक्टूबर 1025 को गजनी से 30 हज़ार घुड़सवार सैनिकों को ले कर प्रस्थान किया. उसका मक़सद सोमनाथ को लूटना था. हिंदुओं में मान्यता था कि भगवान शिव अपनी रक्षा स्वयं कर लेंगे इसलिए वे महमूद के इरादों से अनजान रहे.

इतिहास में सोमनाथ की लूट सबसे बड़ी बताई जाती है. महमूद के साथ पहले आक्रमण के वक़्त आया आल बरूनी भारत में ही रह गया था. उसने भी अपनी पुस्तक में इस लूट को बहुत बड़ी बताया है. मंदिर में तैनात रक्षकों और पुजारियों ने महमूद की सेना का मुक़ाबला किया लेकिन वे सब मारे गये.

सोमनाथ लूट की कचोट

महमूद गजनवी ने सोमनाथ को लूट तो लिया लेकिन हिंदुओं के हृदय में सोमनाथ की मूर्ति तोड़े जाने से इतना क्षोभ हुआ कि उन्हें तुर्कों से घृणा हो गई. बाद में चालुक्य, चंदेल आदि सब राजा जुड़े और उन्होंने सोमनाथ को फिर से बनवाया गया. 1230 ई. में इब्न असीर की कामिलुत्तवारीख में भी सोमनाथ मंदिर तोड़ने और छह टन सोने की लूट का वर्णन मिलता है. इस वर्णन को ही पुख़्ता सबूत माना जाता है.

प्रसिद्ध इतिहासकार केएम मुंशी ने एक अन्य इतिहासकार फ़रिश्ता का हवाला देते हुए अपना उपन्यास सोमनाथ गुजराती में लिखा था. इसके अनुसार महमूद गजनवी लूट का माल गजनी ले नहीं जा पाया था. चूंकि भीमदेव गजनवी का रास्ता रोके खड़ा था इसलिए वह सिंध के सफ़ेद रन से मुलतान की तरफ़ भागा. पर रास्ते की गर्मी और दुर्गम रास्ते की वजह से उसने 1700 ऊंटों पर लदे सोने और असंख्य सैनिकों को खो दिया. अकेले वही गजनी पहुंचा.

किंवदंतियों में भटक गई लूट

हिंदुओं में सोमनाथ मंदिर तोड़े जाने से इतनी हताशा हुई कि उन्होंने गजनवी को कभी माफ़ नहीं किया. इसलिए बाद में कई अन्य साहित्यकारों ने इसमें जाती के एंगल तलाशे. आचार्य चतुरसेन ने इन किंवदंतियों के सहारे हिन्दी में जय सोमनाथ लिखा है. अपने उपन्यास में उन्होंने यह आक्रमण महमूद का आख़िरी 17 वां आक्रमण बताया है. मंदिर की भव्यता और देवदासियों का वर्णन करते हुए आचार्य चतुरसेन इसे मंदिर के अंदर के सत्ता संघर्ष और जातिवाद को जोड़ा है.

उनके अनुसार मंदिर में ब्राह्मण बाक़ी जातियों से बुरी तरह पेश आते थे. इसलिए दुर्जन नाम के एक नाई ने मुखबिरी की. लेकिन इतिहास उपन्यासों के भरोसे नहीं चलता है. सोमनाथ को गजनवी द्वारा तोड़े जाने की कसक पूरे देश के हिंदुओं में रही. इसीलिए आज़ादी के बाद तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री ने वल्लभ भाई पटेल ने मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प किया.

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