कोलेस्ट्रॉल का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में हार्ट अटैक और बीमारियों का डर बैठ जाता है। हम इसे अपनी सेहत का सबसे बड़ा ‘विलेन’ मानते हैं। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? देश के जानेमाने कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. आलोक चोपड़ा का मानना इसके बिल्कुल उलट है। उनके अनुसार, कोलेस्ट्रॉल शरीर का दुश्मन नहीं, बल्कि संक्रमणों से लड़ने वाला एक ‘रक्षक’ भी है। अक्सर लोग अंडे की जर्दी या मक्खन को खाने से सिर्फ इसलिए डरते हैं क्योंकि उसका फैट कोलेस्ट्रॉल को बढ़ा सकता है। लेकिन डॉक्टर चोपड़ा की बात सुनकर हमें अपनी जानकारी को अपडेट करने की जरूरत है।

अशोक अस्पताल के सह संस्थापक कार्डियोलॉजिस्ट Dr Chopra का कहना है कि दिल से जुड़ी बीमारियों में कोलेस्ट्रॉल को सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है, लेकिन ये सच्चाई नहीं है। एक्सपर्ट ने बताया कि कोलेस्ट्रॉल को वर्षों से गलत तरीके से बदनाम किया गया है। उन्होंने Eisha Chopra के पॉडकास्ट में कहा कोलेस्ट्रॉल एक गाली जैसा शब्द बन चुका है। जैसे ही किसी का कोलेस्ट्रॉल 200 के आसपास पहुंचता है, लोग तुरंत दवा लेने लगते हैं। लेकिन यह समझना जरूरी है कि कोलेस्ट्रॉल जीवन के लिए बेहद जरूरी है। अक्सर ‘विलेन’ समझा जाने वाला कोलेस्ट्रॉल असल में आपकी बॉडी के इम्यून सिस्टम का हिस्सा है। आइए डॉ. आलोक चोपड़ा से जानते हैं कि कैसे यह आपको कई बीमारियों और इन्फेक्शन से बचाता है।
कैसे कोलेस्ट्रॉल को विलेन मानते हैं लोग?
डॉ. चोपड़ा ने बताया कि ज्यादातर लोग सोचते हैं कि कोलेस्ट्रॉल सिर्फ खाने से बढ़ता है, जबकि शरीर खुद लगभग 85 प्रतिशत कोलेस्ट्रॉल बनाता है। एक्सपर्ट ने बताया अगर शरीर खुद इसे बनाता है, तो यह पूरी तरह बुरा कैसे हो सकता है? कोलेस्ट्रॉल हमारी इम्यूनिटी से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह बैक्टीरिया को निष्क्रिय करने, संक्रमण को कंट्रोल करने, शरीर को नुकसान से बचाने और बीमारी से उबरने में मदद करता है।
कोलेस्ट्रॉल का स्तर कैसे बदलता है?
डॉ. चोपड़ा ने कहा मेरा कोलेस्ट्रॉल 325 है और मैं अभी भी स्वस्थ हूं। एक्सपर्ट ने बताया कोलेस्ट्रॉल का स्तर समय, मौसम और शरीर की स्थिति के अनुसार बदल सकता है। सर्दियों में इसका स्तर बढ़ सकता है, जबकि गर्मियों में कम हो सकता है। संक्रमण, सर्जरी, डेंटल ट्रीटमेंट और तनाव के बाद भी कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है। वहीं जब शरीर और दिमाग रिलैक्स रहते हैं, तो इसका स्तर कम हो सकता है।
हाई कोलेस्ट्रॉल कब बन जाता है चिंता का विषय ?
डॉ. सांगोई बताते हैं चिंता तब शुरू होती है जब कोलेस्ट्रॉल का स्तर लगातार हाई बना रहता है, विशेषकर LDL और ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर, क्योंकि ये धमनियों में प्लाक बनने की प्रक्रिया को तेज कर सकते हैं।
क्या कोलेस्ट्रॉल को लेकर लोगों में गलतफहमी है?
विशेषज्ञ Dr Parin Sangoi का कहना है कि लोग कोलेस्ट्रॉल को केवल अच्छा और बुरा मानकर देखते हैं, जबकि सच्चाई इससे कहीं ज्यादा जटिल है। उन्होंने कहा कोलेस्ट्रॉल उतना खतरनाक नहीं है जितना लोग समझते हैं। शरीर को हार्मोन बनाने, विटामिन D तैयार करने और स्वस्थ कोशिकाओं के निर्माण के लिए इसकी जरूरत होती है। एक्सपर्ट ने बताया कोलेस्ट्रॉल का प्रकार और मात्रा बेहद महत्वपूर्ण है। LDL को बैड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है क्योंकि इसकी अधिक मात्रा धमनियों की दीवारों में जमा होकर ब्लॉकेज का कारण बन सकती है। वहीं HDL शरीर से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल हटाने में मदद करता है।
सिर्फ एक फूड या रिपोर्ट से तय नहीं होती हार्ट हेल्थ
डॉ. संगोई के अनुसार कई लोग यह मान लेते हैं कि सिर्फ कुछ खास चीजें खाने से ही हार्ट डिजीज होते है, जबकि असल खतरा लंबे समय तक खराब लाइफस्टाइल से पैदा होता है। उन्होंने कहा कि खराब डाइट, धूम्रपान, एक्सरसाइज की कमी, डायबिटीज, तनाव, खराब नींद और मोटापा मिलकर दिल की बीमारी का जोखिम बढ़ाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि केवल अंडे या घी जैसे खाद्य पदार्थों को दोष देना सही नहीं है। हार्ट हेल्थ का संबंध पूरे लाइफस्टाइल और मेटाबॉलिक हेल्थ से होता है, न कि किसी एक पोषक तत्व से डरने से।
कब चिंता का कारण बनता है हाई कोलेस्ट्रॉल?
डॉ. संगोई ने बताया कि अगर किसी युवा और स्वस्थ व्यक्ति का कोलेस्ट्रॉल थोड़ा बढ़ा हुआ है, तो उसका जोखिम उतना नहीं हो सकता जितना किसी ऐसे व्यक्ति का, जिसे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, धूम्रपान की आदत या हार्ट डिजीज की फैमिली हिस्ट्री हो। उन्होंने कहा कि जेनेटिक्स कारण भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। कुछ लोगों में आनुवंशिक कारणों से कोलेस्ट्रॉल हमेशा ज्यादा रहता है और ऐसे मामलों में कम उम्र में भी दवा की जरूरत पड़ सकती है।
तनाव, बीमारी और सर्जरी भी बदल सकते हैं रिपोर्ट
विशेषज्ञों का कहना है कि तनाव, संक्रमण, सर्जरी, नींद की कमी, डिहाइड्रेशन और कुछ दवाइयां भी अस्थायी रूप से कोलेस्ट्रॉल बढ़ा सकती हैं। भावनात्मक तनाव हार्मोनल बदलावों और खराब लाइफस्टाइल के जरिए भी इसका असर डाल सकता है। इसी वजह से डॉक्टर किसी एक रिपोर्ट के आधार पर तुरंत घबराने की सलाह नहीं देते। अगर व्यक्ति हाल ही में बीमार हुआ हो या सर्जरी हुई हो, तो कुछ हफ्तों बाद दोबारा जांच कराने को कहा जा सकता है।
अब सिर्फ टोटल कोलेस्ट्रॉल देखना काफी नहीं
आधुनिक कार्डियोलॉजी अब सिर्फ टोटल कोलेस्ट्रॉल पर निर्भर नहीं रहते। डॉक्टर अब LDL, HDL, ट्राइग्लिसराइड्स, कमर का साइज, ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर, सूजन से जुड़े मार्कर्स और लाइफस्टाइल फैक्टर्स को भी ध्यान में रखते हैं। डॉ. संगोई ने बताया कि दो लोगों का कोलेस्ट्रॉल समान होने के बावजूद उनके हार्ट डिजीज का खतरा अलगअलग हो सकता है। जो व्यक्ति शारीरिक रूप से एक्टिव है और जिसकी मेटाबॉलिक हेल्थ बेहतर है, उसका जोखिम कम हो सकता है, भले ही उसका कोलेस्ट्रॉल थोड़ा ज्यादा हो।
कोलेस्ट्रॉल की जांच के लिए कौन से टेस्ट कराएं
कोलेस्ट्रॉल की जांच के लिए डॉक्टर hsCRP, Serum Homocysteine, Lipoprotein , ApoA और ApoB जैसे एडवांस टेस्ट भी कराने की सलाह दे सकते हैं। ये टेस्ट शरीर में छिपी सूजन, जेनेटिक रिस्क और दिल की बीमारी के खतरे को बेहतर तरीके से समझने में मदद करते हैं।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी विशेषज्ञों की राय और सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या या जांच रिपोर्ट को लेकर डॉक्टर से सलाह जरूर लें।



