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अकेलापन, अजीब आवाजें सुनाई देना और बेवजह डर… क्या यह सिज़ोफ्रेनिया है? जानिए इस रहस्यमयी बीमारी की साइकोलॉजी

अर्षी की उम्र 40 साल है, कुछ समय पहले तक वो एक दम नॉर्मल रहती थी। लोगों से मिलना, बातचीत करना, अपने काम अच्छे से निबटाना उस का हुनर था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से वो एकदम खामोश हो गई है। अकेले घर में अकेली रहती है, दूसरों से बातचीत करना उसे बिल्कुल पसंद नहीं। घर में कोई आ जाए तो उसे पूरी तवज्जो से बात नहीं करती सिर्फ घड़ी देखती हैं कि ये कब जाएं। उसे बेवजह का डर लगता है, डर ऐसा कि आसपास कुछ अजीब आवाजें सुनाई देती है जबकि उसके पास कोई मौजूद नहीं होता। उसे बेवजह डर लगता है और वो इस डर के साथ दिनरात अकेले खुद को एक सीमित दायरे में सिकुड़े हुए है। अर्षी में दिखने वाले ये लक्षण कुछ और नहीं बल्कि Schizophrenia नाम की गंभीर मानसिक बीमारी की ओर इशारा कर सकते हैं। स्किजोफ्रेनिया एक ऐसा मानसिक विकार है जिसमें व्यक्ति की सोचनेसमझने की क्षमता, भावनाएं, व्यवहार और वास्तविकता को पहचानने की क्षमता प्रभावित होने लगती है। इस बीमारी में मरीज को भ्रम , ऐसी आवाजें सुनाई देना जो असल में मौजूद नहीं होतीं , जरूरत से ज्यादा शक करना, डर महसूस होना और सामाजिक दूरी बनाना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

अकेलापन, अजीब आवाजें सुनाई देना और बेवजह डर… क्या यह सिज़ोफ्रेनिया है? जानिए इस रहस्यमयी बीमारी की साइकोलॉजी
अकेलापन, अजीब आवाजें सुनाई देना और बेवजह डर… क्या यह सिज़ोफ्रेनिया है? जानिए इस रहस्यमयी बीमारी की साइकोलॉजी

सिज़ोफ्रेनिया क्या है?

फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया स्किज़ोफ्रेनिया एक गंभीर मानसिक बीमारी है, जिसमें व्यक्ति का वास्तविकता से संपर्क कमजोर होने लगता है। मरीज की सोच, व्यवहार और भावनाओं पर असर पड़ता है। कई बार उसे यह एहसास भी नहीं होता कि वह किसी मानसिक बीमारी से गुजर रहा है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, स्किजोफ्रेनिया सिर्फ पागलपन नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर मेडिकल कंडीशन है जिसे सही समय पर पहचानना और इलाज शुरू करना बेहद जरूरी होता है। कई बार लोग मरीज के व्यवहार को जिद, गुस्सा या अजीब आदत समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह बीमारी धीरेधीरे मरीज की रोजमर्रा की जिंदगी, रिश्तों और कामकाज पर गहरा असर डाल सकती है। अगर आपके आसपास कोई व्यक्ति अचानक बहुत चुप रहने लगे, खुद से बातें करे, बेवजह डरे, लोगों से दूरी बनाने लगे या ऐसी चीजें महसूस करे जो वास्तव में मौजूद नहीं हैं, तो उसे डांटने या मजाक उड़ाने के बजाय तुरंत मनोचिकित्सक से सलाह लेने के लिए प्रेरित करें। सही इलाज, दवाइयों, थेरेपी और परिवार के सहयोग से स्किजोफ्रेनिया से जूझ रहे लोग बेहतर और सामान्य जीवन जी सकते हैं।

सिज़ोफ्रेनिया में कौनकौन से लक्षण दिखाई देते हैं?

  • आस पास कोई नहीं लेकिन अजीब आवाजें सुनाई देना
  • शक या वहम होना
  • लोगों पर बेवजह संदेह करना
  • अकेले रहना पसंद करना
  • खुद से बातें करना
  • नहानाधोना या सेल्फ केयर बंद कर देना
  • नींद खराब होना
  • व्यवहार में अचानक बदलाव आना
  • बारबार गुस्सा या डर महसूस करना

सिज़ोफ्रेनिया में हैलुसिनेशन क्या होता है?

हैलुसिनेशन का मतलब है ऐसी चीजें महसूस करना जो वास्तव में मौजूद नहीं होतीं जैसे आवाजें सुनाई देना। कोई आसपास नहीं है लेकिन किसी की मौजूदगी महसूस होना और अजीब गंध महसूस होना शामिल है। स्किज़ोफ्रेनिया में सबसे ज्यादा ऑडिटरी हेलुसिनेशन यानी आवाजें सुनाई देने की समस्या देखी जाती है।

सिज़ोफ्रेनिया पर प्रमुख वैज्ञानिक रिसर्च

The Lancet Psychiatry में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक सिज़ोफ्रेनिया की शुरुआत अक्सर ‘प्रोड्रोमल फेज’ से होती है। इसमें व्यक्ति अचानक सामाजिक गतिविधियों से कट जाता है। अर्षी का अचानक खामोश हो जाना और मेहमानों के आने पर घड़ी देखना इसी चरण का हिस्सा है। रिसर्च बताती हैं कि मरीज को सामाजिक संपर्क एक ‘खतरे’ या ‘बोझ’ की तरह लगने लगता है, जिसे ‘सोशल एंग्जायटी’ का चरम रूप माना जा सकता है। आधुनिक ‘ब्रेन इमेजिंग’ अध्ययनों से पता चला है कि जब सिज़ोफ्रेनिया के मरीज को आवाजें सुनाई देती हैं, तो उनके मस्तिष्क का ‘ब्रोका एरिया’ सक्रिय हो जाता है। यह दिमाग का वही हिस्सा है जो बोलने और भाषा के लिए जिम्मेदार है।

वैज्ञानिक रूप से, मरीज के मस्तिष्क में ‘न्यूरोट्रांसमीटर खासतौर पर Dopamine का संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे उसका दिमाग अपने ही विचारों को ‘बाहरी आवाज’ समझने की गलती करने लगता है। यानी वे आवाजें अर्षी के लिए उतनी ही ‘सच’ हैं जितनी हमारी बातें। WHO की एक रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं में सिजोफ्रेनिया के लक्षण पुरुषों की तुलना में थोड़े बाद में दिखते हैं। रिसर्च बताती हैं कि सिजोफ्रेनिया के मरीजों में ‘अहेडोनिया’ विकसित हो जाता है, जहां वे उन कामों में खुशी महसूस करना बंद कर देते हैं जिन्हें वे पहले पसंद करते थे। अर्षी का दूसरों से बात न करना और घड़ी देखना यह दर्शाता है कि उसका मस्तिष्क अब ‘इमोशनल रिवॉर्ड’ प्रोसेस नहीं कर पा रहा है।

सिजोफ्रेनिया को लेकर कुछ मिथक हैं जिन्हें समझना है जरूरी

भारत में मानसिक बीमारी को अक्सर ऊपरी हवा और जादूटोना समझा जाता है। कुछ लोग जो ज्यादा तालीम हासिल नहीं करते या मानसिक रोगों की जानकारी नहीं रखते वो इस बीमारी को भूत प्रेत से जोड़ देते हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि सिजोफ्रेनिया के मरीज हिंसक या पागल होते हैं, लेकिन सच्चाई ये हैं कि वो डरे हुए होते हैं उन्हें सुरक्षा की दरकार होती है। साइंस के अनुसार यह एक मानसिक बीमारी है, लेकिन कई बार मरीज का व्यवहार इतना असामान्य हो जाता है कि लोग इसे जादूटोना या आत्मा का असर समझ लेते हैं। लोग अक्सर ऐसे मानसिक रोगो को लाइलाज समझकर छोड़ देते हैं जो पूरी तरह गलत है। जबकि दवाइयों और रिहैबिलिटेशन से मरीज सम्मानजनक जिंदगी जी सकता है। सिज़ोफ्रेनिया का इलाज केवल दवा नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता है। जब तक हम इसे ‘दिमाग का बुखार’ मानकर इलाज नहीं करेंगे, तब तक अर्षी जैसे मरीज समाज की मुख्यधारा से कटे रहेंगे।

यह बीमारी किस उम्र में ज्यादा होती है?

एक्सपर्ट के मुताबिक स्किज़ोफ्रेनिया ज्यादातर किशोरावस्था या युवा उम्र में शुरू होती है। हालांकि, यह किसी भी उम्र में हो सकती है। बच्चों में भी स्किज़ोफ्रेनिया हो सकता है, लेकिन टीनएज में शुरुआती लक्षण दिखाई दे सकते हैं जैसे अकेले रहना, डरना, लोगों से बात कम करना और व्यवहार में बदलाव होना शामिल है।

क्या स्किज़ोफ्रेनिया के मरीज हिंसक हो सकते हैं?

डॉक्टर नेहा के मुताबिक कुछ मामलों में इस बीमारी से पीड़ित मरीज हिंसक भी हो सकते हैं। अगर मरीज को बहुत ज्यादा डर, शक या आवाजें सुनाई दे रही हों, तो वह सेल्फ डिफेंस में हिंसक व्यवहार कर सकता है। लेकिन हर मरीज हिंसक हो, ऐसा जरूरी नहीं है।

क्या अकेलापन और सोशल मीडिया इसका कारण बन सकते हैं?

अकेलापन, सोशल आइसोलेशन और जरूरत से ज्यादा डिजिटल लाइफ मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक अकेला रहे, लोगों से कट जाए, सोशल मीडिया का आदी हो जाए तो इससे मानसिक समस्याएं बढ़ सकती हैं और कुछ मामलों में स्किज़ोफ्रेनिया के लक्षण ट्रिगर हो सकते हैं।

क्या तनाव या ट्रॉमा स्किज़ोफ्रेनिया को ट्रिगर कर सकता है?

बहुत ज्यादा तनाव, सदमा या किसी अपने का दूर हो जाना मानसिक समस्याओं को बढ़ा सकता है। हालांकि ट्रॉमा से पहले एंग्जायटी और पैनिक ज्यादा ट्रिगर होते हैं। स्किज़ोफ्रेनिया ट्रिगर होना कम आम है, लेकिन संभव है।

क्या स्किज़ोफ्रेनिया का इलाज संभव है?

इस बीमारी का पूरी तरह स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन इसे दवाइयों और थेरेपी से काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। इस बीमारी का इलाज करने से आवाजें सुनाई देना कम हो सकता है। शक और डर कम हो सकता हैं और मरीज सामान्य जिंदगी जी सकता है।

क्या स्किज़ोफ्रेनिया के मरीज नौकरी, शादी और सोशल लाइफ जी सकते हैं?

एक्सपर्ट के मुताबिक अगर मरीज सही इलाज और दवाइयां ले रहा हो और बीमारी कंट्रोल में हो तो वह नौकरी कर सकता है। ऐसे मरीज शादीशुदा जीवन जी सकते हैं और उनकी नॉर्मल सोशल लाइफ भी हो सकती है।

परिवार का क्या रोल होना चाहिए?

स्किज़ोफ्रेनिया के मरीजों के लिए परिवार का सपोर्ट बहुत जरूरी है। फैमिली को चाहिए कि मरीज को अकेला न छोड़ें और उन्हें समय पर दवाइयां खिलाएं। मरीज से प्यार और धैर्य से बात करें। इलाज जारी रखने के लिए मोटिवेट करें। फैमिली थेरेपी इस बीमारी का इलाज करने में काफी मददगार मानी जाती है।

डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए?

अगर किसी व्यक्ति में बेवजह शक, आवाजें सुनाई देना, व्यवहार में बड़ा बदलाव, रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत साइकैट्रिस्ट से संपर्क करना चाहिए।

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी किसी विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं है। यदि आप या आपके आसपास कोई इन लक्षणों को महसूस कर रहा है, तो तुरंत प्रमाणित मनोचिकित्सक से संपर्क करें।

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