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राहुल गांधी के करीबी, 50 विधायकों का समर्थन… फिर भी क्यों CM नहीं बन पाए वेणुगोपाल? 5 प्वाइंट में समझिए

वीडी सतीशन केरलम के नए मुख्यमंत्री होंगे. कांग्रेस ने गुरुवार को उनके नाम का ऐलान किया. सतीशन कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल पर भारी पड़े. वेणुगोपाल का नाम सीएम की रेस में सबसे आगे चल रहा था. दावा किया गया कि उन्हें 50 विधायकों का समर्थन हासिल है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या हुआ कि वेणुगोपाल मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए? कैसे सतीशन ने कम विधायकों के समर्थन के बावजूद बाजी पलट दी? और क्यों राहुल गांधी ने अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगी को पीछे हटने के लिए मना लिया? आइए समझते हैं वो पांच बड़े कारण, जिन्होंने पूरा खेल बदल दिया…

राहुल गांधी के करीबी, 50 विधायकों का समर्थन… फिर भी क्यों CM नहीं बन पाए वेणुगोपाल? 5 प्वाइंट में समझिए
राहुल गांधी के करीबी, 50 विधायकों का समर्थन… फिर भी क्यों CM नहीं बन पाए वेणुगोपाल? 5 प्वाइंट में समझिए

1 जनता और कार्यकर्ताओं में सतीशन की पकड़ वीडी सतीशन की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी ज़मीनी छवि. पार्टी के भीतर हुए फीडबैक और सर्वे में साफ संकेत मिले कि कार्यकर्ताओं और आम समर्थकों के बीच सतीशन की लोकप्रियता कहीं ज्यादा है.

हालांकि विधायक संख्या वेणुगोपाल के पक्ष में दिख रही थी, लेकिन सतीशन ने हाईकमान को समझाया कि वेणुगोपाल संगठन महासचिव रहते हुए अपने करीबी नेताओं को टिकट दिलाने और चुनावी मदद पहुंचाने में सफल रहे थे. इसलिए स्वाभाविक था कि जीतकर आए विधायक उन्हीं के साथ खड़े दिखे. आलाकमान को यह तर्क काफी हद तक सही लगा और यहीं से समीकरण बदलने लगे.

2 पार्टी में बगावत का डर

सतीशन ने शुरुआत से ही साफ कर दिया था कि वे किसी भी हालत में वेणुगोपाल के नेतृत्व में काम नहीं करेंगे. वे सिर्फ मुख्यमंत्री पद चाहते थे और उससे कम पर समझौते को तैयार नहीं थे. यहां तक कि उन्होंने यह संकेत भी दे दिया था कि अगर वेणुगोपाल का नाम आगे बढ़ाया गया तो वे उनका प्रस्ताव तक नहीं रखेंगे.

कांग्रेस नेतृत्व को डर था कि अगर सतीशन नाराज़ हुए तो पार्टी के भीतर गंभीर टूट पैदा हो सकती है. काफी कोशिशों के बावजूद जब सतीशन नहीं माने, तब राहुल गांधी को महसूस हुआ कि मामला सिर्फ नेतृत्व का नहीं बल्कि संगठन बचाने का भी है.

3 राहुल गांधी से करीबी ही कमजोरी बन गई

जब कोई रास्ता निकलता नहीं दिखा तो राहुल गांधी ने बुधवार शाम मल्लिकार्जुन खरगे से लंबी चर्चा की. फैसला लेने से पहले सबसे जरूरी था वेणुगोपाल को मनाना. इसके बाद गुरुवार सुबह राहुल गांधी ने वेणुगोपाल को अपने आवास बुलाया और करीब दो घंटे बातचीत की. यहीं उनकी सबसे बड़ी ताकत उलटी पड़ गई.
राहुल गांधी ने उनसे कहा कि संगठन महासचिव के तौर पर उनकी भूमिका पार्टी के लिए ज्यादा अहम है. आगे चलकर पार्टी अध्यक्ष पद जैसी बड़ी जिम्मेदारी भी उनके सामने हो सकती है. लेकिन फिलहाल पार्टी को एकजुट रखने के लिए उन्हें त्याग करना होगा.

राहुल गांधी की बात टालना वेणुगोपाल के लिए आसान नहीं था. आखिरकार उन्होंने भारी मन से सतीशन के नाम पर सहमति दे दी.

4 एंटनी फैक्टर

इस पूरे घटनाक्रम में ए के एंटनी की राय भी बेहद अहम मानी गई. राहुल गांधी ने सतीशन, रमेश चेन्निथला और वेणुगोपाल के बीच फंसे समीकरण को समझने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ए के एंटनी से सलाह ली. एंटनी ने साफ संकेत दिया कि फैसला उस नेता के पक्ष में होना चाहिए जिसकी पकड़ जनता और कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत हो. उनका मानना था कि पिछले पांच वर्षों में लेफ्ट सरकार के खिलाफ सबसे आक्रामक चेहरा सतीशन ही रहे हैं और कार्यकर्ता उन्हें एक लड़ाकू नेता के तौर पर देखते हैं. इस सलाह ने भी हाईकमान का झुकाव सतीशन की ओर बढ़ा दिया.

5 IUML और वायनाड का समीकरण

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग यानी IUML अंदरखाने सतीशन के पक्ष में खड़ी दिखाई दी. कांग्रेस के लिए IUML का समर्थन बेहद जरूरी था क्योंकि उसके बिना सरकार बनाना आसान नहीं था. वेणुगोपाल के रिश्ते IUML नेतृत्व से उतने मजबूत नहीं माने जाते थे, जबकि सतीशन को वहां बेहतर स्वीकार्यता हासिल थी.इसके अलावा वायनाड का राजनीतिक समीकरण भी अहम बन गया. IUML ने पहले राहुल गांधी और फिर प्रियंका गांधी के लिए वायनाड सीट खाली की थी.
उस इलाके में IUML का मजबूत प्रभाव माना जाता है. बताया जाता है कि IUML ऐसे नेता के पक्ष में थी जो विधानसभा की राजनीति से सीधे जुड़ा हो.
इसका फायदा भी आखिरकार सतीशन को मिला.

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