भारतीय थल सेना और भारतीय नौसेना के बीच बुधवार को एक बड़ा समझौता हुआ है. दोनों सेनाओं ने मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन ऑन एफिलिएशन पर साइन किए हैं. इसका मकसद दोनों सेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाना और मिलकर काम करने की ताकत को और मजबूत करना है.

थल सेना की तरफ से एडजुटेंट जनरल लेफ्टिनेंट जनरल वीपीएस कौशिक और नौसेना की तरफ से चीफ ऑफ पर्सनल वाइस एडमिरल गुरचरण सिंह ने इस समझौते पर दस्तखत किए. इस मौके पर थल सेना के उप प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल धीरज सेठ और नौसेना के उप प्रमुख वाइस एडमिरल संजय वत्सायन भी मौजूद रहे.
क्यों जरूरी है यह समझौता?
आज के समय में देश की सुरक्षा सिर्फ जमीन की हिफाजत तक सीमित नहीं है. समुद्री रास्तों और देश के आर्थिक हितों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है. नौसेना समुद्र में देश की रक्षा करती है और व्यापारिक रास्तों को सुरक्षित रखती है. वहीं थल सेना देश की सीमाओं में स्थिरता और सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाती है.
भविष्य की लड़ाइयां अब जमीन, समुद्र, हवा और साइबर जैसे कई मोर्चों पर एक साथ लड़ी जाएंगी. ऐसे में तीनों सेनाओं का मिलकर काम करना बहुत जरूरी हो गया है. यह समझौता इसी दिशा में एक बड़ा कदम है.
ऑपरेशन सिंदूर में दिखी ताकत
इस तालमेल की अहमियत हाल ही में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी दिखी थी. उस ऑपरेशन में तीनों सेनाओं ने मिलकर काम किया और बड़ी कामयाबी हासिल की. इस समझौते के बाद थल सेना और नौसेना की यूनिट्स, रेजिमेंट्स और जहाजों के बीच औपचारिक जुड़ाव शुरू होगा. दोनों सेनाओं के अफसर और जवान एकदूसरे के काम करने के तरीके को समझेंगे.
इसके साथ जॉइंट ट्रेनिंग, एक्सचेंज प्रोग्राम और साथ मिलकर अभ्यास करने के मौके बढ़ेंगे. इससे एकदूसरे की ताकत और भूमिका को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा.
भविष्य के लिए तैयारी
सेना के अधिकारियों ने कहा कि यह समझौता आने वाले समय में और भी यूनिट्स के बीच जुड़ाव का रास्ता खोलेगा. यह तीनों सेनाओं को इंटीग्रेटेड और मल्टीडोमेन ऑपरेशन्स के लिए तैयार करेगा. यानी ऐसी लड़ाई के लिए जहां जमीन, समुद्र, हवा और साइबर स्पेस में एक साथ और तालमेल से काम करना पड़े. यह कदम सरकार की जॉइंटनेस और इंटीग्रेशन की नीति को और मजबूत करेगा और भारत की सेनाओं को भविष्य की चुनौतियों के लिए पूरी तरह तैयार बनाएगा.



