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लखनऊ जंक्शन पर बिल्डिंग गिरने से रेलवे सिस्टम पर सवालिया निशान, करोड़ों के खर्च पर उठे सवाल

Lucknow : पूर्वोत्तर रेलवे के लखनऊ जंक्शन पर गुरुवार दोपहर एक बड़ी अनहोनी होतेहोते बची। स्टेशन परिसर में स्थित एक पुरानी और जर्जर बिल्डिंग की छत अचानक भरभरा कर गिर गई। दोपहर 3 से 4 बजे के बीच हुई इस घटना में गनीमत रही कि कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन इस मलबे ने रेलवे इंजीनियरिंग विभाग के कथित भ्रष्टाचार और लापरवाही की परतों को जरूर बेनकाब कर दिया है।

लखनऊ जंक्शन पर बिल्डिंग गिरने से रेलवे सिस्टम पर सवालिया निशान, करोड़ों के खर्च पर उठे सवाल
लखनऊ जंक्शन पर बिल्डिंग गिरने से रेलवे सिस्टम पर सवालिया निशान, करोड़ों के खर्च पर उठे सवाल

10 साल से ‘अनसेफ’, फिर मरम्मत पर क्यों बहे करोड़ों?
जानकारों के मुताबिक, जिस बिल्डिंग की छत गिरी है, वह पिछले एक दशक से जर्जर थी और उसे बहुत पहले ही ‘अनसेफ’ घोषित कर गिराने का प्रस्ताव दिया गया था। लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर बिल्डिंग गिराने लायक थी, तो सालों तक इसकी ‘मरम्मत’ के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये क्यों पानी की तरह बहाए गए? आरोप है कि यह महज मरम्मत नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘बजट खपाऊ’ खेल था।

जांच के घेरे में ‘गतिशक्ति’ के चीफ इंजीनियर
विभागीय सूत्रों की मानें तो इस पूरे खेल के पीछे पूर्व सीनियर डीईएन की कार्यशैली पर उंगलियां उठ रही हैं, जो करीब पांच साल तक लखनऊ मंडल में तैनात रहे। वर्तमान में वे प्रमोट होकर गोरखपुर में चीफ इंजीनियर/कंस्ट्रक्शन5 के पद पर आसीन हैं। आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान बिल्डिंग को डिस्मेंटल करने के बजाय मरम्मत का दिखावा कर भारी बजट ठिकाने लगाया गया, जिसका नतीजा आज सबके सामने है।

सुरक्षा में चूक या ‘लीपापोती’ की कोशिश?
घटना के बाद रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी ने इसे ‘प्लैन्ड कंस्ट्रक्शन’ का हिस्सा बताया है। लेकिन गिरती छत की तस्वीरें, नंगे तार और मलबे का ढेर कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। अगर यह काम सुनियोजित था, तो मजदूरों और यात्रियों की सुरक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं थे? क्या रेलवे अब ‘जॉइंट नोट’ के जरिए इस गंभीर लापरवाही पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है?

रोटेशन का अभाव और सिस्टम की विफलता
इस घटना ने रेलवे की पुरानी ‘रोटेशन’ नीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एक ही अधिकारी का लंबे समय तक एक ही जगह जमे रहना सिस्टम में भ्रष्टाचार के कैंसर की तरह फैल रहा है। लखनऊ जंक्शन की यह गिरी हुई छत चीखचीख कर कह रही है कि फाइलों में दर्ज ‘करोड़ों की मरम्मत’ केवल कागजी थी। यदि इस ‘इंजीनियरिंग घोटाले’ की उच्च स्तरीय जांच नहीं हुई, तो भविष्य में किसी बड़े जानमाल के नुकसान की जिम्मेदारी किसकी होगी?

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