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एक नहीं, तीन बार बूढ़ा होता है शख्स, पहली उम्र पर नहीं कर पाएंगे यकीन..

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आमतौर पर लोग मानते हैं कि इंसान पचास की उम्र पार करने के बाद बुढ़ापे की दहलीज पर पहुंचता है. बाल पकने लगते हैं, स्किन पर झुर्रियां पड़ती हैं और शरीर धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है. लेकिन अब विज्ञान ने एक बेहद चौंकाने वाला तथ्य पेश किया है. नए शोध के मुताबिक इंसान अपनी पूरी जिंदगी में तीन बार बूढ़ा होता है. ये उम्र हैं 34, 60 और 78 साल.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने यह चौंकाने वाली खोज की है. उन्होंने हजारों लोगों के खून के प्लाज्मा का विश्लेषण किया. अलग-अलग उम्र के प्रतिभागियों के सैंपल लेकर उन्होंने पाया कि शरीर एक समान गति से नहीं बुढ़ाता बल्कि तीन अलग-अलग जैविक चरणों में अचानक बड़े बदलाव होते हैं. इन चरणों में प्रोटीन के बड़े समूह बहुत कम समय में नाटकीय रूप से बदल जाते हैं.

तीन बार छाता है बुढ़ापा
शोध के अनुसार 34 साल की उम्र में पहला बड़ा बदलाव आता है. इस उम्र में मेटाबॉलिज्म और मांसपेशियों की कार्यप्रणाली प्रभावित होती है. शरीर की ऊर्जा बनाने और इस्तेमाल करने की क्षमता में बदलाव आने लगता है. मांसपेशियों की ताकत और रिकवरी पर भी असर पड़ता है. कई लोग इस उम्र में महसूस करते हैं कि पहले जैसी एनर्जी नहीं रही या व्यायाम के बाद थकान ज्यादा होने लगी है. दूसरा बड़ा बदलाव 60 साल की उम्र में होता है. इस चरण में हृदय संबंधी मार्कर्स यानी कार्डियोवैस्कुलर संकेतक अचानक बदल जाते हैं. दिल और रक्त वाहिकाओं की सेहत में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलते हैं. रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल और अन्य हृदय संबंधी पैरामीटर्स में शिफ्ट आता है. यही वजह है कि कई लोग साठ के दशक में अचानक दिल की समस्याओं या थकान का अनुभव करने लगते हैं. तीसरा और अंतिम बड़ा बदलाव 78 साल की उम्र में होता है. इस चरण में इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता और संज्ञानात्मक यानी दिमागी कार्यों में तेजी से बदलाव आता है. इम्यूनिटी कमजोर पड़ने लगती है और याददाश्त या सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.

निकले चौंकाने वाले नतीजे
शोध बताता है कि इन तीन बिंदुओं पर शरीर में प्रोटीन के स्तर अचानक और व्यापक रूप से बदलते हैं. यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे समझ में आता है कि क्यों कई लोग कहते हैं कि वे ठीक-ठाक महसूस कर रहे थे और फिर अचानक खुद को बूढ़ा महसूस करने लगे. बुढ़ापा धीरे-धीरे रिसने वाली प्रक्रिया नहीं बल्कि कुछ खास उम्रों में लहरों की तरह आता है. स्टैनफोर्ड के शोधकर्ताओं ने खून के प्लाज्मा में मौजूद प्रोटीन के पैटर्न का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है. प्लाज्मा रक्त का वह हिस्सा है जिसमें कोशिकाएं नहीं होतीं लेकिन सैकड़ों तरह के प्रोटीन होते हैं. ये प्रोटीन शरीर के विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करते हैं. जब इन प्रोटीन के बड़े समूह एक साथ बदलते हैं तो शरीर की कार्यप्रणाली में व्यापक असर पड़ता है. शोध में यही देखा गया कि 34, 60 और 78 के आसपास ऐसे बड़े क्लस्टर परिवर्तन होते हैं.

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