Allahabad High Court Order: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में खुली जेल की व्यवस्था में महिलाओं को केवल लिंग के आधार पर शामिल न किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि महिलाओं को इस सुविधा से वंचित रखना पूरी तरह अस्वीकार्य है और राज्य सरकार को अपनी नीति में सुधार कर इस कमी को दूर करना चाहिए। कोर्ट ने सरकार से विस्तृत जवाब भी तलब किया है।

विस्तृत हलफनामा दाखिल कर पूरी स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश
यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के 26 फरवरी के फैसले के अनुपालन से जुड़ी जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से दाखिल अनुपालन हलफनामा अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं है और उसमें कई महत्वपूर्ण जानकारियों का अभाव है। इसलिए महानिदेशक को विस्तृत हलफनामा दाखिल कर पूरी स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया गया है।
रिक्त स्थान पर अदालत ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश में केवल लखनऊ मॉडल जेल में ही खुली जेल संचालित है। इसकी क्षमता 800 कैदियों की है, लेकिन वहां केवल 316 कैदी ही रह रहे हैं। इस पर अदालत ने सवाल उठाया कि शेष रिक्त स्थान कब और किस आधार पर भरे जाएंगे।
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि महिला कैदियों को खुली जेल की सुविधा से बाहर रखा गया है। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के विपरीत है। कोर्ट ने महाराष्ट्र, राजस्थान और केरल जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां खुली जेलों में कैदियों को परिवार के साथ रहने, खेती करने, बेहतर मजदूरी कमाने, शिक्षा और जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
अदालत ने के ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट की रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसके अनुसार प्रदेश में खुली जेलों की क्षमता का केवल 27 प्रतिशत उपयोग हो रहा है, जबकि राज्य की अन्य जेलों में 80 हजार से अधिक कैदी सजा काट रहे हैं। हाईकोर्ट ने सरकार से अगली सुनवाई तक नई खुली जेलों की स्थापना, महिला कैदियों को शामिल करने और सुधारात्मक जेल व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए ठोस कार्ययोजना प्रस्तुत करने को कहा है।



