समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम खान से जुड़े मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट से एक बड़ा अपडेट सामने आया है. फर्जी पैन कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र के जरिए चुनाव लड़ने और धोखाधड़ी से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगाते हुए उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया है. हालांकि, अदालत ने उनकी दोषसिद्धि पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है, जिसका असर उनके राजनीतिक भविष्य पर पड़ सकता है. आजम अभी जेल से बाहर आएंगे या नहीं, आइए जानते हैं…

आजम पर कुल कितने केस?
इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया फैसले और रिकॉर्ड के मुताबिक, आजम खान और उनके परिवार पर मुकदमों की लंबी लिस्ट रही है. आजम खान के खिलाफ कुल 93 आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं, जिनमें से कई मामलों में वे बरी भी हुए हैं या जमानत पर हैं.
कितने मामलों में सजा मिली है
अदालती ब्यौरे के मुताबिक, आजम खान को पहले भी कई मामलों में सजा मिल चुकी है. वे कुल 8 मामलों में दोषी ठहराए जा चुके हैं . मजिस्ट्रेट कोर्ट की दो सजाओं के खिलाफ उनकी अपीलें अपर अदालत से खारिज भी हो चुकी हैं. इसके अलावा, मौजूदा फर्जी जन्म प्रमाण पत्र/पैन कार्ड मामले में रामपुर की MP/MLA कोर्ट ने उन्हें 10 साल तक की कठोर सजा सुनाई थी.
कितने केस अभी पेंडिंग हैं?
कानूनी मोर्चे पर आजम की मुश्किलें अभी कम नहीं हुई हैं. अदालती आंकड़ों के मुताबिक, आजम खान के खिलाफ विभिन्न अदालतों में अभी भी 81 से अधिक मामले पेंडिंग हैं. अब्दुल्ला आजम के खिलाफ अलगअलग अदालतों में 44 मामले अभी भी विचाराधीन हैं.
क्या जेल से बाहर आ पाएंगे?
हां, आजम जेल से बाहर तभी आ पाएंगे, जब पुलिस नए मामलों में उन्हें हिरासत में न ले. इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस समित गोपाल की पीठ ने क्रिमिनल रिवीजन संख्या 3893/2026 और 3685/2026 पर सुनवाई करते हुए उनकी सजा को सस्पेंड कर दिया है. अदालत ने यह देखते हुए कि आजम खान ने इस मामले में लगभग 4 साल 1 माह और 9 दिन की सजा काट ली है. उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है. पुलिस के पास लखनऊ और रामपुर में पीसी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में बीवारंट हासिल करने का ऑप्शन है. अगर पुलिस वारंट नहीं ले पाती, तभी आजम जेल से बाहर आ सकेंगे.
क्या वे चुनाव लड़ पाएंगे?
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8 के तहत, अगर किसी जन प्रतिनिधि को किसी मामले में 2 साल या उससे अधिक की सजा होती है, तो वह चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाता है और यह अयोग्यता सजा की अवधि पूरी होने के बाद भी 6 साल तक बनी रहती है. ताजा मामले में हाईकोर्ट ने सजा को तो निलंबित कर दिया है, लेकिन दोषसिद्धि पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है.
अदालत ने विक्रम सिंह सैनी और नवजोत सिंह सिद्धू मामलों के सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि दोषसिद्धि पर रोक केवल ‘असाधारण मामलों’ में ही दी जाती है. चूंकि कोर्ट ने कनविक्शन पर रोक नहीं लगाई है, इसलिए जनप्रतिनिधि कानून के तहत उनकी अयोग्यता बनी रहेगी और वे फिलहाल चुनाव लड़ने के लिए पात्र नहीं होंगे, जब तक कि उच्च अदालतों से उनकी दोषसिद्धि पूरी तरह रद्द नहीं हो जाती. इस मामले की अंतिम सुनवाई जनवरी 2027 के तीसरे हफ्ते में तय की गई है.



