नई दिल्ली :हर साल सर्दियों की शुरुआत के साथ दिल्लीएनसीआर जहरीली हवा की चपेट में आ जाता है। अब तक इस गंभीर समस्या के लिए पराली जलाने, वाहनों से निकलने वाले धुएं, निर्माण कार्यों की धूल और पड़ोसी देशों से आने वाली धूलभरी हवाओं को प्रमुख कारण माना जाता रहा है। लेकिन अब एक नई रिपोर्ट ने प्रदूषण की तस्वीर का एक और बड़ा पहलू सामने रखा है।

फिनलैंड स्थित गैरलाभकारी संस्था Centre for Research on Energy and Clean Air की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, दिल्लीएनसीआर के आसपास 300 किलोमीटर के दायरे में संचालित कई कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र राजधानी की हवा को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहे हैं। रिपोर्ट का दावा है कि इन संयंत्रों से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड गैस दिल्ली की वायु गुणवत्ता को खराब करने वाले सबसे बड़े कारणों में से एक बन चुकी है।
इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, जिन बिजली संयंत्रों को केंद्र सरकार ने फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन सिस्टम लगाने से छूट दी है, वे बड़ी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कर रहे हैं। यही गैस आगे चलकर हवा में सूक्ष्म कण बनाती है, जो लोगों की सेहत के लिए बेहद खतरनाक साबित होती है।
300 किलोमीटर के दायरे में 37 प्लांट, 20 तय सीमा से ज्यादा कर रहे उत्सर्जन
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्लीएनसीआर के आसपास करीब 37 कोयला आधारित बिजली संयंत्र मौजूद हैं। इनमें से 20 यूनिट्स पर्यावरण मंत्रालय द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से अधिक सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कर रहे हैं। इन संयंत्रों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए जरूरी FGD तकनीक नहीं लगाई गई है, जिसके कारण बड़ी मात्रा में जहरीली गैस सीधे वातावरण में पहुंच रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली में प्रदूषण को केवल स्थानीय स्रोतों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। आसपास के राज्यों में मौजूद बड़े औद्योगिक संयंत्रों और थर्मल पावर प्लांट्स का उत्सर्जन भी राजधानी की हवा पर गहरा असर डालता है।
CategoryC प्लांट्स को मिली छूट बनी चिंता का कारण
CREA की रिपोर्ट बताती है कि भारत के लगभग 78 प्रतिशत कोयला आधारित बिजली संयंत्र CategoryC में आते हैं। केंद्र सरकार ने इन संयंत्रों को FGD सिस्टम लगाने से छूट प्रदान की हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इसी वजह से इन संयंत्रों से भारी मात्रा में सल्फर डाइऑक्साइड गैस वातावरण में पहुंच रही है। अनुमान है कि दिल्लीएनसीआर के आसपास मौजूद प्लांट्स से हर वर्ष लगभग 1.54 लाख टन SO₂ का उत्सर्जन होता है।
चौंकाने वाली बात यह है कि इस कुल उत्सर्जन का करीब 90 प्रतिशत उन संयंत्रों से आता है जहां FGD सिस्टम नहीं लगाया गया है, जबकि लगभग 81 प्रतिशत उत्सर्जन CategoryC प्लांट्स से हो रहा है, जिन्हें नियमों से छूट मिली हुई है।
इन बिजली संयंत्रों का नाम आया सामने
रिपोर्ट में दिल्लीएनसीआर की हवा को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले कई बड़े थर्मल पावर प्लांट्स का भी उल्लेख किया गया है। इनमें—
- राजपुरा थर्मल पावर प्लांट
- तलवंडी साबो पावर प्लांट
- राजीव गांधी थर्मल पावर स्टेशन
- गुरु हरगोबिंद थर्मल पावर स्टेशन
- हरदुआगंज थर्मल पावर स्टेशन
- रोपड़ थर्मल पावर प्लांट
शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इन संयंत्रों में FGD सिस्टम स्थापित नहीं किया गया है, जिसके कारण सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन अपेक्षाकृत अधिक हो रहा है।
क्या है FGD सिस्टम और क्यों है जरूरी?
FGD यानी Flue Gas Desulphurisation एक प्रदूषण नियंत्रण तकनीक है, जिसका इस्तेमाल कोयला जलाने के बाद निकलने वाली फ्ल्यू गैस से सल्फर डाइऑक्साइड को हटाने के लिए किया जाता है।
यह तकनीक चूना पत्थर या अन्य रासायनिक पदार्थों की मदद से SO₂ गैस को अवशोषित कर लेती है, जिससे वातावरण में जहरीली गैस का उत्सर्जन काफी कम हो जाता है।
यदि किसी थर्मल पावर प्लांट में FGD सिस्टम नहीं लगाया जाता, तो उससे निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड सीधे हवा में मिल जाती है और वायु प्रदूषण को कई गुना बढ़ा देती है।
2015 में मिला था आदेश, फिर भी नहीं हुआ पूरा पालन
वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने देश के सभी कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों को FGD सिस्टम लगाने का निर्देश दिया था। हालांकि, बाद के वर्षों में इसकी समयसीमा कई बार बढ़ाई गई।
अंततः CategoryC श्रेणी के कई संयंत्रों को इस व्यवस्था से छूट दे दी गई। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इसी फैसले का असर अब दिल्लीएनसीआर सहित कई क्षेत्रों की वायु गुणवत्ता पर साफ दिखाई दे रहा है।
जहां लगा FGD, वहां कम मिला प्रदूषण
रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक उदाहरण भी सामने आए हैं।
दादरी थर्मल पावर प्लांट और महात्मा गांधी थर्मल पावर प्लांट में FGD सिस्टम स्थापित किया गया है। सर्वेक्षण में पाया गया कि इन संयंत्रों से सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन अन्य प्लांट्स की तुलना में काफी कम था।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सभी बड़े ताप विद्युत संयंत्रों में FGD तकनीक लागू कर दी जाए, तो वायु प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
सल्फर डाइऑक्साइड क्यों है इतना खतरनाक?
सल्फर डाइऑक्साइड एक जहरीली गैस है, जो वातावरण में मौजूद अन्य रासायनिक तत्वों के साथ मिलकर PM2.5 और सल्फेट कणों का निर्माण करती है। ये बेहद सूक्ष्म कण सांस के जरिए सीधे फेफड़ों और रक्त प्रवाह तक पहुंच सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक SO₂ और PM2.5 के संपर्क में रहने से—
- अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी सांस संबंधी बीमारियां बढ़ सकती हैं।
- फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
- हृदय रोग और स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है।
- बच्चों और बुजुर्गों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।
- लंबे समय तक संपर्क रहने पर समय से पहले मृत्यु का जोखिम भी बढ़ सकता है।
दुनिया में सबसे अधिक SO₂ उत्सर्जित करने वाले देशों में भारत
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन के मामले में भारत दुनिया के प्रमुख देशों में शामिल है। ऊर्जा उत्पादन में कोयले पर अत्यधिक निर्भरता और प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों के अधूरे क्रियान्वयन को इसकी बड़ी वजह माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में वायु प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण करना है, तो केवल वाहनों और पराली पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में आधुनिक प्रदूषण नियंत्रण तकनीकों को अनिवार्य रूप से लागू करना भी उतना ही जरूरी होगा।
प्रदूषण पर नई बहस की शुरुआत
दिल्ली में हर साल बढ़ते प्रदूषण को लेकर यह रिपोर्ट नई बहस को जन्म दे सकती है। अब सवाल केवल वाहनों, पराली या धूल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उन थर्मल पावर प्लांट्स पर भी उठने लगा है जो राजधानी से सैकड़ों किलोमीटर दूर होने के बावजूद यहां की हवा को लगातार जहरीला बना रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दिल्ली की हवा को वास्तव में साफ बनाना है, तो क्षेत्रीय स्तर पर प्रदूषण नियंत्रण की व्यापक रणनीति अपनानी होगी और सभी बड़े उत्सर्जन स्रोतों पर समान रूप से सख्ती करनी होगी।


