
डायबिटीज के मरीज अक्सर शिकायत करते हैं कि मीठा खाना बंद करने और नियमित दवाएं लेने के बावजूद उनका ब्लड शुगर सामान्य नहीं हो रहा है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि डायबिटीज का संबंध केवल चीनी खाने से नहीं होता। शरीर में इंसुलिन का सही तरीके से काम करना, खान-पान, शारीरिक गतिविधि, तनाव और नींद जैसे कई कारक ब्लड शुगर को प्रभावित करते हैं।
डायबिटीज में शरीर या तो पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या इंसुलिन का प्रभाव कम हो जाता है। ऐसे में खून में ग्लूकोज का स्तर बढ़ने लगता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर चीनी छोड़ने के बाद भी शुगर नियंत्रित नहीं हो रही है तो जीवनशैली और स्वास्थ्य से जुड़े दूसरे कारणों पर भी ध्यान देना जरूरी है। आइए जानते हैं ऐसे आठ संभावित कारणों के बारे में।
1. खान-पान में छिपी हुई शुगर और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट
कई लोग चाय या कॉफी में चीनी डालना बंद कर देते हैं, लेकिन रोजाना के भोजन में मौजूद दूसरे कार्बोहाइड्रेट पर ध्यान नहीं देते। सफेद ब्रेड, मैदा, मिठाई, मीठे पेय पदार्थ, बिस्कुट और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर बढ़ा सकते हैं।
इसलिए केवल चीनी छोड़ना पर्याप्त नहीं है। भोजन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा, उसकी गुणवत्ता और खाने के समय पर भी ध्यान देना चाहिए। साबुत अनाज, सब्जियां और फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ संतुलित डाइट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं।
2. विटामिन और मिनरल्स की कमी
शरीर में कुछ विटामिन और मिनरल्स की कमी होने से थकान, कमजोरी और दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। डायबिटीज के मरीजों में भी पोषक तत्वों की स्थिति पर ध्यान देना जरूरी है।
उदाहरण के लिए, विटामिन B12 की कमी से हाथ-पैरों में झुनझुनी और कमजोरी हो सकती है। विटामिन D की कमी मांसपेशियों और हड्डियों को प्रभावित कर सकती है। आयरन की कमी से एनीमिया और मैग्नीशियम की कमी से मांसपेशियों में ऐंठन हो सकती है।
हालांकि, इन कमियों को सीधे तौर पर हाई ब्लड शुगर का कारण मानना सही नहीं है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से जांच करवाएं और कमी होने पर ही उचित उपचार लें।
3. डेयरी उत्पादों को लेकर गलतफहमी
कुछ लोगों का मानना है कि दूध और दूसरे डेयरी उत्पाद इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाते हैं। हालांकि, सभी डेयरी उत्पादों को डायबिटीज के लिए नुकसानदायक मानने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।
दूध और दही में प्राकृतिक रूप से कार्बोहाइड्रेट मौजूद होते हैं, इसलिए इनकी मात्रा ब्लड शुगर पर असर डाल सकती है। बिना चीनी वाला दही और संतुलित मात्रा में दूध कई लोगों की डाइट में शामिल हो सकते हैं। अपनी जरूरत और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार इनका चुनाव करना बेहतर है।
4. लंबे समय तक हाई ब्लड शुगर रहना
जब ब्लड शुगर लंबे समय तक बढ़ा रहता है तो शरीर में इंसुलिन का प्रभाव कम होने और इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसी समस्याएं बनी रह सकती हैं। ऐसी स्थिति में ग्लूकोज को कोशिकाओं तक पहुंचाने के लिए शरीर को अधिक इंसुलिन की जरूरत पड़ सकती है।
इसी वजह से केवल मीठा खाना बंद करने से हर मरीज का ब्लड शुगर तुरंत सामान्य नहीं होता। नियमित जांच, सही दवा और डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार जारी रखना जरूरी है।
5. शारीरिक गतिविधि की कमी
शरीर में ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मांसपेशियों की अहम भूमिका होती है। नियमित शारीरिक गतिविधि और व्यायाम से मांसपेशियां ग्लूकोज का इस्तेमाल बेहतर तरीके से कर पाती हैं।
इसके उलट, लंबे समय तक बैठे रहना और बहुत कम चलना-फिरना इंसुलिन सेंसिटिविटी को प्रभावित कर सकता है। रोजाना टहलना, हल्का व्यायाम और अपनी क्षमता के अनुसार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग फायदेमंद हो सकती है। व्यायाम शुरू करने से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डॉक्टर से सलाह लेना उचित है।
6. मांसपेशियों का कमजोर होना
उम्र बढ़ने के साथ शरीर की मांसपेशियों का कम होना एक सामान्य समस्या है। इस स्थिति को सार्कोपीनिया कहा जाता है। मांसपेशियां शरीर में ग्लूकोज के इस्तेमाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
अगर मांसपेशियों की ताकत और मात्रा कम होती है तो शरीर की ग्लूकोज इस्तेमाल करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। पर्याप्त प्रोटीन, संतुलित भोजन और नियमित शारीरिक गतिविधि मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में मदद कर सकती है।
7. लगातार तनाव में रहना
तनाव का असर केवल मानसिक स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि ब्लड शुगर पर भी पड़ सकता है। तनाव के दौरान शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे हार्मोन का स्तर बढ़ सकता है। इससे लिवर अधिक ग्लूकोज रक्त में छोड़ सकता है।
अगर कोई व्यक्ति लगातार तनाव में रहता है तो उसके ब्लड शुगर को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। इसके अलावा तनाव के कारण खान-पान, व्यायाम और नींद की आदतें भी बिगड़ सकती हैं।
इसलिए रोजाना कुछ समय आराम, ध्यान, हल्की शारीरिक गतिविधि और पर्याप्त सामाजिक सहयोग के लिए निकालना उपयोगी हो सकता है।
8. नींद की खराब गुणवत्ता
पर्याप्त और अच्छी नींद शरीर के हार्मोनल संतुलन के लिए जरूरी है। लगातार कम सोना या बार-बार नींद टूटना इंसुलिन सेंसिटिविटी को प्रभावित कर सकता है। इसका असर ब्लड शुगर के स्तर पर भी पड़ सकता है।
डायबिटीज के मरीजों को नियमित समय पर सोने-जागने की आदत बनानी चाहिए। सोने से पहले कैफीन का सेवन कम करना और शांत वातावरण में सोना बेहतर नींद पाने में मदद कर सकता है। अगर तेज खर्राटे आते हैं या नींद के दौरान सांस रुकने जैसी समस्या होती है तो डॉक्टर से जांच करवाएं।
ब्लड शुगर कंट्रोल नहीं हो रहा तो क्या करें?
अगर चीनी छोड़ने और दवा लेने के बाद भी ब्लड शुगर लगातार बढ़ा हुआ है तो खुद से दवा बंद या कम न करें। डॉक्टर से मिलकर HbA1c, फास्टिंग और भोजन के बाद की ब्लड शुगर रिपोर्ट की समीक्षा करवाएं। जरूरत पड़ने पर दवाओं, खान-पान और व्यायाम की योजना में बदलाव किया जा सकता है।
यह समझना जरूरी है कि डायबिटीज केवल मीठा खाने से होने वाली बीमारी नहीं है। इसे नियंत्रित रखने के लिए संतुलित भोजन, नियमित गतिविधि, पर्याप्त नींद, तनाव प्रबंधन और सही चिकित्सकीय उपचार सभी महत्वपूर्ण हैं।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह किसी भी तरह से डॉक्टर की सलाह, जांच या उपचार का विकल्प नहीं है। डायबिटीज की दवाओं या इंसुलिन में बदलाव स्वयं न करें। अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार डॉक्टर या योग्य डायटीशियन से सलाह लें।
— Satya Report



