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मां छिन्नमस्ता की महिमा
मां छिन्नमस्ता की पूजा मुख्य रूप से तांत्रिकों द्वारा सिद्धियां प्राप्त करने के लिए की जाती है। हालांकि, गृहस्थ जीवन व्यतीत करने वाले लोगों के लिए भी यह दिन अत्यंत फलदायी है, लेकिन उन्हें सलाह दी जाती है कि वे मां की पूजा बहुत ही सावधानी पूर्वक और सामान्य विधि से करें। आज के दिन की गई साधना से न केवल तंत्रमंत्र की बाधाएं शांत होती हैं, बल्कि सुखशांति और भी होती है।
धर्म शास्त्रों में छिन्नमस्ता को प्रचंड चंडिका के रूप में भी जाना जाता है। मान्यता है कि के विशेष दिन मां की आराधना करने से भक्तों के जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और उन्हें हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है।
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कब है? छिन्नमस्ता जयंती
पंचांग के अनुसार, इस साल यह पावन तिथि 29 अप्रैल 2026, बुधवार की शाम को 07:51 प्रारंभ होकर अगले दिन 30 अप्रैल 2026, गुरुवार को रात्रि 09:12 बजे तक रहेगी। ऐसे में उदया तिथि को आधार मानते हुए मां छिन्नमस्ता की जयंती 30 अप्रैल 2026, गुरुवार को मनाई जाएगी।
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मां छिन्नमस्ता का अद्भुत स्वरूप
धर्म शास्त्रों मां छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत विलक्षण है। वे स्वयं अपना कटा हुआ सिर हाथ में धारण करती हैं और दूसरे हाथ में तलवार रखती है। उनकी गर्दन से निकलती रक्त की तीन धाराओं में से एक को देवी स्वयं ग्रहण करती हैं, जबकि अन्य दो धाराएं उनकी सहचरियां पीती है। यह रूप आत्मबलिदान, जीवन ऊर्जा और ब्रह्मांडीय शक्ति के प्रवाह का प्रतीक माना जाता है।
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साधना और उपासना का महत्व
मां छिन्नमस्ता को दस महाविद्याओं में छठा स्थान प्राप्त है। उनका स्वरूप उग्र और भयानक होने के कारण उनकी पूजा मुख्यतः तांत्रिक, अघोरी, योगी और नाथ संप्रदाय के साधक करते हैं. यह साधना सामान्य पूजा से भिन्न होती है और विशेष विधिविधान के साथ की जाती है।
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मां छिन्नमस्ता पूजा से मिलने वाले लाभ
शास्त्रों के अनुसार मां छिन्नमस्ता की उपासना से व्यक्ति के मन से भय समाप्त होता है। मां छिन्नमस्ता यह साधना आत्मबल को बढ़ाती है और जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति देती है. इसके अलावा उनकी कृपा से शारीरिक कष्टों से राहत मिलती है और साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती है।




