आजकल खबरों में कच्चे तेल की कीमतें काफी सुर्ख़ियों में हैं. ऐसा बताया जा रहा है कि तेल की कीमतें काबू में हैं, लेकिन भारत की तेल रिफाइनरियों की हकीकत इन सबसे बिल्कुल अलग है. रिफाइनरी कंपनियों के अधिकारियों का कहना है कि कच्चे तेल के ‘फ्यूचर प्राइस’ के मुकाबले, उन्हें असल तेल खरीदने के लिए काफी ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं. सोमवार को फ्यूचर मार्केट में कच्चे तेल की कीमत करीब 108 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी. हालांकि, जब कंपनियां वास्तव में अपनी रिफाइनरी के लिए तेल खरीदने बाजार में जा रही हैं, तो उन्हें भारी प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह खाड़ी देशों से आने वाली तेल की सप्लाई में आई कमी को माना जा रहा है.

फ्यूचर प्राइस के मुकाबले स्पॉट प्राइस में भारी अंतर
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के ताजा आंकड़ों ने इस पूरी तस्वीर को साफ कर दिया है. 1 से 22 सितंबर के बीच के डेटा को देखें, तो ब्रेंट स्पॉट प्राइस नवंबर के ब्रेंट फ्यूचर प्राइस से औसतन 12 डॉलर प्रति बैरल ज्यादा रहा है. 15 सितंबर को तो इन दोनों कीमतों के बीच का ये अंतर बढ़कर 22 डॉलर तक पहुंच गया था. इसी अवधि के दूसरे पखवाड़े में कई दिनों तक स्पॉट प्राइस, फ्यूचर रेट से 15 डॉलर से ज्यादा ऊपर रहा. दरअसल, EIA का स्पॉट प्राइस फिजिकल ब्रेंट मार्केट के लिए एक बेंचमार्क की तरह काम करता है. ये वो बाजार है जहां असल में कच्चे तेल के कार्गो खरीदे बेचे जाते हैं.
सप्लायर मांग रहे हैं तगड़ा प्रीमियम
इंडस्ट्री से जुड़े शीर्ष अधिकारियों ने साफ किया है कि फिलहाल जो फ्यूचर प्राइस हमें स्क्रीन पर दिख रहे हैं, वो फिजिकल मार्केट की असली हालत को नहीं दर्शाते. स्थिति ये है कि तेल सप्लायर फ्यूचर प्राइस के ऊपर 20 डॉलर प्रति बैरल तक का प्रीमियम मांग रहे हैं. फिजिकल मार्केट में इस समय तेल की भारी किल्लत है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, खाड़ी देशों की तरफ से तेल की सप्लाई लगातार सीमित बनी हुई है, जिसके कारण सप्लायर्स अपनी मनमानी कर रहे हैं. इसी वजह से भारतीय रिफाइनरियों को मजबूरी में ऊंचे दाम पर तेल खरीदना पड़ रहा है.
फ्यूचर मार्केट से पूरी तरह अलग है फिजिकल मार्केट
इस अंतर को समझने के लिए हमें नवंबर ब्रेंट फ्यूचर प्राइस के गणित को समझना होगा. ये एक ऐसा तय अनुबंध है, जिसके तहत नवंबर में डिलीवरी के लिए फ्यूचर मार्केट में ट्रेडिंग होती है. शेयर बाजार में हिस्सा लेने वाले ज्यादातर लोग इन कॉन्ट्रैक्ट्स का इस्तेमाल सिर्फ कीमतों के उतारचढ़ाव का अनुमान लगाने या अपने जोखिम को कम करने के लिए करते हैं. उनका मकसद असल में कच्चे तेल की डिलीवरी लेना नहीं होता है. दूसरी तरफ, रिफाइनरियां जो कीमत चुकाती हैं, वो फिजिकलमार्केट के बेंचमार्क से जुड़ी होती है. तेल की अंतिम कीमत उस महीने के औसत आधार पर तय होती है, जिस महीने में तेल को जहाज पर लोड किया जाना है. इसके साथ ही तेल की क्वालिटी के आधार पर भी कीमतों में थोड़ा बदलाव होता है. इसका सीधा मतलब ये है कि जब फिजिकल मार्केट में कीमतें बढ़ती हैं, तो रिफाइनरियों का कच्चा माल महंगा हो जाता है, भले ही टीवी पर फ्यूचर प्राइस कम क्यों न दिख रहा हो.
क्रूड खरीद से डिलीवरी तक की पूरी प्रक्रिया
कच्चे तेल को खरीदने की प्रक्रिया भी काफी लंबी होती है. आम तौर पर तेल की डिलीवरी से करीब दो महीने पहले ही खरीद का सौदा पक्का कर लिया जाता है. उदाहरण के लिए, अगर किसी रिफाइनरी ने सितंबर में कोई कार्गो खरीदा है, तो उसे अक्टूबर में जहाज पर लोड किया जाएगा. इसके बाद वो कार्गो नवंबर में रिफाइनरी तक पहुंचेगा. इस पूरे सौदे में तेल की कीमत उस औसत बेंचमार्क से तय होगी जो अक्टूबर में चल रहा होगा. इसलिए, जिस समय रिफाइनरी तेल खरीदने का सौदा करती है, उस समय की ‘हेडलाइन कीमत’ से तेल की असली लागत का कोई सीधा संबंध नहीं होता. यही कारण है कि कागज पर तेल सस्ता होने के बावजूद, रिफाइनरियों की जेब पर भारी बोझ पड़ रहा है.



