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भारत के गांवों तक पहुंच गया डायबिटीज, इस वक्त 9 करोड़ मरीजः मधुमेह का खतरा सबसे ज्यादा किसे है?

आज डायबिटीज यानी मधुमेह सिर्फ उम्र बढ़ने के साथ होने वाली बीमारी नहीं रह गई है. बदलती जीवनशैली, शहरों में बढ़ती भागदौड़, कम शारीरिक मेहनत और खानपान में बदलाव ने इसे एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बना दिया है. हाल ही में सामने आए, इंटरनेशनल आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 20 से 79 साल की उम्र के करीब 9 करोड़ लोग डायबिटीज के साथ जी रहे हैं. इस संख्या के साथ भारत दुनिया में चीन के बाद दूसरे नंबर पर है. चीन में ऐसे लोगों की संख्या करीब 14.8 करोड़ और अमेरिका में लगभग 3.9 करोड़ है.

सबसे चिंता की बात सिर्फ मौजूदा संख्या नहीं है, बल्कि आगे का अनुमान है. 2024 में दुनिया में 20 से 79 साल की उम्र के 58.9 करोड़ वयस्क डायबिटीज से प्रभावित थे, यानी लगभग हर 9 वयस्क में से 1 को डायबिटीज थी. अगर मौजूदा रफ्तार बनी रही तो 2050 तक यह संख्या बढ़कर 85.3 करोड़ हो सकती है.

स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती

भारत जैसे देशों में बढ़ती आबादी, लोगों की औसत उम्र बढ़ना, तेजी से होता शहरीकरण और कम सक्रिय जीवनशैली इस बढ़ते बोझ की बड़ी वजहें मानी जा रही हैं. अध्ययन के मुताबिक चीन, भारत और अमेरिका में ही 2024 में करीब 27.7 करोड़ डायबिटीज मरीज थे, जो दुनिया के कुल मामलों का लगभग 47 प्रतिशत है. इसका मतलब है कि डायबिटीज अब सिर्फ व्यक्तिगत बीमारी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन चुकी है.

भारत में 9 करोड़ डायबिटीज मरीज

  1. भारत में करीब 9 करोड़ वयस्क डायबिटीज से प्रभावित हैं.
  2. भारत दुनिया में डायबिटीज मरीजों की संख्या में दूसरे स्थान पर है.
  3. चीन में करीब 14.8 करोड़ और अमेरिका में 3.9 करोड़ मामले हैं.
  4. 2024 में दुनिया में 58.9 करोड़ वयस्क डायबिटीज से प्रभावित थे.
  5. 2050 तक वैश्विक संख्या 85.3 करोड़ पहुंचने का अनुमान है.
  6. दुनिया के कुल मरीजों में चीन, भारत और अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 47% है.

भारत में डायबिटीज

भारत में संख्या कितनी तेजी से बढ़ी?

भारत में डायबिटीज का बढ़ता बोझ अचानक सामने नहीं आया है. इंडिया: हेल्थ ऑफ द नेशन्स स्टेट्स रिपोर्ट और इससे जुड़े ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज अध्ययन के मुताबिक, 1990 में भारत में डायबिटीज के करीब 2.6 करोड़ मामले थे, जो 2016 तक बढ़कर 6.5 करोड़ हो गए. यानी करीब 26 साल में मरीजों की संख्या ढाई गुना हो गई. इसी दौरान 20 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों में डायबिटीज की हिस्सेदारी 5.5% से बढ़कर 7.7% हो गई.

रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2016 में सभी राज्यों में डायबिटीज का बोझ एक जैसा नहीं था. तमिलनाडु और केरल में इसकी दर सबसे ज्यादा रही, जबकि दिल्ली, पंजाब, गोवा और कर्नाटक भी ज्यादा प्रभावित राज्यों में शामिल थे. हालांकि, सबसे अहम बात यह है कि 1990 से 2016 के बीच डायबिटीज की दर हर राज्य में बढ़ी, यानी यह अब किसी एक इलाके या राज्य की समस्या नहीं रह गई थी.

मरीजों की संख्या नहीं, मौत का बोझ भी बढ़ा

भारत के 19902016 के आंकड़ों में डायबिटीज से होने वाली मौतों की दर में भी बड़ी बढ़ोतरी दिखाई दी. अध्ययन के अनुसार, प्रति एक लाख आबादी पर डायबिटीज से होने वाली मृत्यु दर 1990 में करीब 10 थी, जो 2016 में बढ़कर 23.1 हो गई. यानी इसमें करीब 131 प्रतिशत की वृद्धि हुई. 2016 में डायबिटीज से होने वाली कुल मौतों में 42.6 प्रतिशत मौतें 70 साल से कम उम्र के लोगों में हुईं. डायबिटीज को अक्सर ऐसी बीमारी माना जाता है जिसे दवा और खानपान से नियंत्रित किया जा सकता है. लेकिन, जब इसका समय पर पता न चले या ब्लड शुगर लंबे समय तक नियंत्रित न रहे, तो इसका असर शरीर के दूसरे अंगों पर पड़ सकता है.

वजन और जीवनशैली का बड़ा कनेक्शन

पुराने भारतीय आंकड़ों में ओवरवेट यानी अधिक वजन को डायबिटीज से जुड़े बोझ का सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारक बताया गया था. 2016 में डायबिटीज से जुड़े DALYs यानी बीमारी के कारण स्वस्थ जीवन के खोए वर्षों में करीब 36 प्रतिशत हिस्से को अधिक वजन से जोड़ा गया. नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में भी बढ़ते डायबिटीज बोझ के पीछे आबादी की उम्र बढ़ने, शहरीकरण, कम शारीरिक गतिविधि और खानपान में बदलाव को महत्वपूर्ण कारण बताया गया है. खास तौर पर शहरों में लंबे समय तक बैठकर काम करना और ज्यादा प्रोसेस्ड या अल्ट्राप्रोसेस्ड भोजन लेना जोखिम बढ़ा सकता है.

गांवों तक भी पहुंचा डायबिटीज का असर

भारत में डायबिटीज अब सिर्फ बड़े शहरों की बीमारी नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर गांवों तक भी पहुंच चुका है. आईसीएमआर के INDIAB अध्ययन में ग्रामीण आबादी में भी डायबिटीज के मामले सामने आए हैं. चार क्षेत्रों के आंकड़ों में ग्रामीण इलाकों में डायबिटीज की दर शहरों से कम जरूर थी, लेकिन कई लोगों में बीमारी पहली बार जांच के दौरान सामने आई. तमिलनाडु में ग्रामीण आबादी में डायबिटीज की कुल दर करीब 7.8% और महाराष्ट्र में 6.5% थी, जबकि झारखंड के ग्रामीण क्षेत्र में यह करीब 3% दर्ज की गई.

गांवों में डायबिटीज का खतरा

इसका मतलब है कि गांवों में भी बदलती जीवनशैली, खानपान, कम शारीरिक गतिविधि और बढ़ते वजन के साथ डायबिटीज का खतरा बढ़ रहा है. सबसे बड़ी चिंता यह है कि ग्रामीण इलाकों में नियमित स्वास्थ्य जांच की सुविधा और बीमारी की शुरुआती पहचान शहरों की तुलना में कमजोर हो सकती है, इसलिए कई लोगों को डायबिटीज होने की जानकारी काफी देर से मिलती है. ICMR के अनुसार उसके INDIAB अध्ययन ने देश के 30 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 1,13,106 लोगों के आंकड़े जुटाए और डायबिटीज की राष्ट्रीय तस्वीर सामने रखी.

बुजुर्गों में सबसे ज्यादा खतरा

नए अध्ययन के मुताबिक डायबिटीज की दर 75 से 79 साल की उम्र के लोगों में करीब 25 प्रतिशत तक पहुंचती है. अध्ययन में पुरुषों में महिलाओं की तुलना में और शहरी इलाकों में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में डायबिटीज ज्यादा पाए जाने की बात भी सामने आई है. लेकिन समस्या का एक छिपा हुआ हिस्सा भी है, कई लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उन्हें डायबिटीज है. ऐसे मामलों में बीमारी का पता देर से चलता है और तब तक दिल, किडनी या आंखों से जुड़ी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. इसलिए नियमित जांच और शुरुआती पहचान को महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

जागरूकता बढ़ाने पर भी है जोर

डायबिटीज से निपटने के लिए सरकार का जोर सिर्फ इलाज पर नहीं, बल्कि समय रहते बीमारी की पहचान और लोगों में जागरूकता बढ़ाने पर भी है. सरकार के राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डायबिटीज की जांच और इलाज की सुविधाएं दी जाती हैं. इसके साथ ही जोखिम वाले लोगों की स्क्रीनिंग, शुरुआती जांच और जरूरत पड़ने पर बड़े स्वास्थ्य केंद्रों में रेफर करने की व्यवस्था है. आशा और एएनएम जैसी स्वास्थ्यकर्मियों की मदद से लोगों को डायबिटीज के जोखिम, खानपान और जीवनशैली में बदलाव के बारे में जागरूक किया जाता है. सरकार ने mDiabetes जैसी मोबाइल पहल भी शुरू की है, जिसका उद्देश्य लोगों को बीमारी की जानकारी देने, इलाज नियमित रखने और स्वस्थ आदतें अपनाने के लिए प्रेरित करना है.

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