
दक्षिण कोरिया में लंबे समय से चली आ रही कुत्ते का मांस खाने की प्रथा अब खत्म होने की ओर बढ़ रही है। सरकार इस परंपरा को कानूनी रूप से बंद करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए विशेष कानून लाने की योजना बनाई गई है। प्रस्तावित कानून पारित होने के बाद इस कारोबार से जुड़े लोगों को अपना व्यवसाय बदलने के लिए तीन साल का समय दिया जा सकता है।
सदियों पुरानी प्रथा पर क्यों उठे सवाल?
दक्षिण कोरिया में कुत्ते का मांस खाने की परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है। पहले देश के कुछ हिस्सों में इसे सामान्य भोजन के रूप में देखा जाता था। हालांकि, समय के साथ लोगों की सोच में बदलाव आया है और इस प्रथा का विरोध भी बढ़ा है।
पशु अधिकार संगठनों ने लंबे समय से कुत्तों के साथ होने वाली क्रूरता का मुद्दा उठाते हुए इस कारोबार को बंद करने की मांग की है। इसके अलावा, दक्षिण कोरिया में पालतू जानवरों के रूप में कुत्तों को अपनाने का चलन बढ़ने के साथ ही इस परंपरा को लेकर सामाजिक विरोध भी तेज हुआ है।
विशेष कानून लाने की तैयारी
दक्षिण कोरिया की सत्तारूढ़ पीपुल्स पावर पार्टी के नेता यू यूई-डोंग ने राजनेताओं और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के साथ हुई बैठक में इस प्रथा को समाप्त करने के लिए विशेष कानून बनाने की जरूरत बताई थी।
उन्होंने कहा था कि अब समय आ गया है कि कुत्ते के मांस के कारोबार को कानूनी तरीके से बंद किया जाए। साथ ही, इस उद्योग से जुड़े किसानों, कसाइयों और अन्य कारोबारियों को वैकल्पिक व्यवसाय अपनाने में मदद देने की योजना भी बनाई जाएगी।
कारोबारियों को मिलेगा तीन साल का समय
प्रस्तावित योजना के अनुसार, कानून लागू होने के बाद कुत्ते के मांस के कारोबार से जुड़े लोगों को अपना काम बदलने के लिए तीन साल का समय दिया जाना था। इसी समयसीमा के आधार पर वर्ष 2027 तक इस प्रथा को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया था।
सरकार का उद्देश्य केवल इस कारोबार पर रोक लगाना ही नहीं, बल्कि इससे जुड़े लोगों के लिए रोजगार और आय के दूसरे विकल्प तैयार करना भी था।
बदलती सोच ने बढ़ाया प्रतिबंध का समर्थन
दक्षिण कोरिया में नई पीढ़ी के बीच कुत्ते का मांस खाने का चलन पहले की तुलना में कम हुआ है। पशु कल्याण को लेकर बढ़ती जागरूकता और सामाजिक सोच में बदलाव ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया।
इस तरह कुत्ते के मांस पर प्रतिबंध की पहल दक्षिण कोरिया में परंपरा, पशु अधिकार और बदलते सामाजिक मूल्यों के बीच एक बड़े बदलाव का संकेत बनी।
Satya Report डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध रिपोर्टों और उस समय प्रस्तावित सरकारी योजना पर आधारित है। इसमें बताई गई समयसीमा और कानूनी स्थिति को वर्तमान स्थिति की पुष्टि के बिना अंतिम नहीं माना जाना चाहिए।



