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इतिहास में पहली बार ₹96 के स्तर पर पहुंचा डॉलर, रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर

Rupee At Record Low: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले आज रुपया पहली बार 96 के स्तर को पार करते हुए 96.14 के निचले स्तर पर आ गिरा है. बुधवार को ही इसमें 50 पैसे की भारी गिरावट देखी गई. इससे ठीक एक दिन पहले गुरुवार को यह 95.64 के स्तर पर बंद हुआ था. यह महज एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि महंगाई का वह अलार्म है जो सीधा आपकी जेब पर असर डालने वाला है.

इतिहास में पहली बार ₹96 के स्तर पर पहुंचा डॉलर, रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर
इतिहास में पहली बार ₹96 के स्तर पर पहुंचा डॉलर, रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर

साल 2026 की शुरुआत से ही भारतीय मुद्रा भारी दबाव झेल रही है. दिसंबर 2025 में ही रुपये ने पहली बार 90 का मनोवैज्ञानिक स्तर तोड़ा था. अब बाजार के विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर हालात नहीं सुधरे तो डॉलर की कीमत जल्द ही 100 रुपये के स्तर को भी छू सकती है.

विदेशी तनाव ने बढ़ाई भारतीय बाजार की धड़कनें

इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण मिडिल ईस्ट का जियोपॉलिटिकल संकट है. अमेरिका, इजराइल से लेकर ईरान तक के आपसी टकराव ने ग्लोबल मार्केट को डरा दिया है. होर्मुज रूट में सप्लाई बाधित होने की आशंकाओं के चलते दुनिया भर के निवेशक खौफ में हैं. युद्ध जैसे इन हालातों में निवेशक हमेशा सुरक्षित ठिकाना ढूंढते हैं, जो फिलहाल उन्हें अमेरिकी डॉलर में नजर आ रहा है. डॉलर की इसी भारी डिमांड ने डॉलर इंडेक्स को 99.07 के स्तर पर पहुंचा दिया है. ग्लोबल मार्केट में डॉलर जितना मजबूत होता है, एशियाई करेंसी उतनी ही कमजोर पड़ने लगती हैं.

कच्चा तेल बना अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती

भारत अपनी खपत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड इस समय 107 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर को पार कर चुका है. तेल महंगा होने का मतलब है कि भारत को इसे खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने होंगे. रॉयटर्स के एक ताजा सर्वे की मानें तो अप्रैल महीने में ओपेक देशों का तेल उत्पादन पिछले दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर आ गया है.

सऊदी अरामको के सीईओ अमीन नासिर ने साफ कर दिया है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल निर्यात रुकने से हर हफ्ते करीब 10 करोड़ बैरल तेल का नुकसान हो रहा है. ऐसे में बाजार को स्थिर होने में 2027 तक का वक्त लग सकता है. इन्वेस्टमेंट बैंक जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट भी यही कहती है कि अगर अगले महीने रास्ता खुल भी गया, तब भी लॉजिस्टिक समस्याओं के कारण तेल 100 डॉलर के आसपास ही टिका रहेगा.

विदेशी निवेशकों की बिकवाली से गहराया संकट

एक तरफ कच्चे तेल ने आयात बिल बढ़ा दिया है, तो दूसरी तरफ विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अपना पैसा तेजी से निकाल रहे हैं. सिर्फ बुधवार के आंकड़ों पर नजर डालें तो विदेशी निवेशकों ने 4,700 करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर बेच डाले. मुद्रा की कीमत इसी बात पर निर्भर करती है कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कितने डॉलर मौजूद हैं. जब बाजार से डॉलर बड़ी मात्रा में बाहर जाने लगता है, तो रुपये की वैल्यू अपने आप गिरने लगती है.

महंगाई का सीधा असर आम आदमी की जेब पर

रुपये की इस बदहाली का सबसे बड़ा नुकसान आम जनता को उठाना पड़ेगा. देश में थोक महंगाई दर पहले ही साढ़े तीन साल के उच्चतम स्तर पर है. डॉलर महंगा होने से ‘इंपोर्टेड इन्फ्लेशन’ का खतरा बढ़ गया है. पेट्रोलडीजल से लेकर बाहर से आने वाला हर सामान महंगा हो जाएगा. रसोई गैस , प्लास्टिक के उत्पाद से लेकर मोबाइल, लैपटॉप तक की कीमतें बढ़ सकती हैं क्योंकि इनका भुगतान डॉलर में होता है. जो छात्र विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं या जो लोग विदेश यात्रा की योजना बना रहे हैं, उन्हें अब डॉलर खरीदने के लिए पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा रुपये खर्च करने होंगे.

सरकार के कड़े कदम से राहत की उम्मीद

लगातार बिगड़ते हालातों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद मोर्चा संभाला है. पिछले हफ्ते ही उन्होंने देशवासियों से अपील की थी कि वे विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए फिजूलखर्ची रोकें. देशहित में आर्थिक अनुशासन की इस मांग के साथ ही सरकार ने मंगलवार रात कीमती धातुओं के आयात पर टैरिफ भी बढ़ा दिया है. इसका मकसद देश से डॉलर की निकासी को रोकना है. हालांकि, ट्रेडर्स अभी भी मान रहे हैं कि आने वाले दिनों में रुपये में कुछ और गिरावट देखने को मिल सकती है.

डॉलर के मुकाबले रुपये का सफर

साल एक डॉलर की रुपये में कीमत
1947 4 रुपये
1983 10 रुपये
1991 20 रुपये
1993 30 रुपये
1998 40 रुपये
2012 50 रुपये
2014 60 रुपये
2018 70 रुपये
2022 80 रुपये
2025 90 रुपये
2026 96 रुपये

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