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पेट्रोल-डीजल 3 रुपये महंगा होने से घर का इतना बिगड़ेगा बजट, ये रहा पूरा कैलकुलेशन!

15 मई से देशभर में पेट्रोल और डीजल के दामों में अचानक बढ़ोतरी कर दी गई है. दिल्ली से सटे गाजियाबाद में पेट्रोल की कीमत 94.89 रुपये प्रति लीटर से छलांग लगाकर सीधे 97.77 रुपये तक पहुंच गई है. वहीं, अर्थव्यवस्था के पहिए को घुमाने वाला डीजल 88.03 रुपये से बढ़कर 91.04 रुपये प्रति लीटर हो गया है. बाजार के जानकारों के मुताबिक, इस ताजा महंगाई की जड़ें हमारी सीमाओं से बहुत दूर, खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध में छिपी हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी ने घरेलू बाजार में ईंधन को महंगा कर दिया है.

पेट्रोल-डीजल 3 रुपये महंगा होने से घर का इतना बिगड़ेगा बजट, ये रहा पूरा कैलकुलेशन!
पेट्रोल-डीजल 3 रुपये महंगा होने से घर का इतना बिगड़ेगा बजट, ये रहा पूरा कैलकुलेशन!

उपभोक्ता के नजरिए से देखने पर यह बढ़ोतरी महज दो से तीन रुपये प्रति लीटर की लग सकती है. लेकिन, अर्थशास्त्र का नियम कहता है कि पेट्रोलडीजल के दाम कभी भी अकेले नहीं बढ़ते. यह अपने साथ ट्रांसपोर्ट, किराना, फलसब्जी और रोजमर्रा की हर जरूरी चीज की महंगाई का एक पूरा चक्र लेकर आते हैं. मिडिल क्लास परिवारों की चिंताएं बढ़ गई हैं, क्योंकि इस फैसले का सीधा प्रहार उनके तयशुदा घरेलू बजट पर होने वाला है.

माल ढुलाई से लेकर पब्लिक सफर तक की महंगी टिकट

पेट्रोल पंप की मशीनों पर बदलते आंकड़े अर्थव्यवस्था के लिए एक अलार्म की तरह होते हैं. डीजल को भारतीय अर्थव्यवस्था का ‘रक्त’ कहा जाता है. डीजल महंगा होते ही सबसे पहला और सबसे गहरा असर देश के ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर पड़ता है.

देशभर में माल की ढुलाई ट्रकों के जरिए होती है. जैसे ही ट्रकों के टैंक में जाने वाला डीजल महंगा होता है, मालभाड़ा यानी फ्रेट चार्ज तुरंत बढ़ा दिया जाता है. इसका अर्थ यह है कि कारखानों से निकलने वाला सामान जब थोक बाजार और फिर वहां से आपके मोहल्ले की दुकान तक पहुंचता है, तो उसकी ढुलाई की लागत पहले से ज्यादा हो चुकी होती है.

पब्लिक ट्रांसपोर्ट का हाल भी इससे अछूता नहीं रहता. बस, ऑटो, टैक्सी का संचालन सीधे तौर पर ईंधन की कीमतों पर निर्भर है. बसों के टिकट और ऑटो के किराये में इस बढ़ोतरी का असर दिखना तय है. ऐसे में जो व्यक्ति रोज दफ्तर जाने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सहारा लेता है, उसके सफर की लागत बढ़ने वाली है. माल ढुलाई महंगी होने का सीधा सा मतलब है कि जो भी चीज ट्रकों या मालगाड़ियों से सफर करके आ रही है, उसका महंगा होना अब महज कुछ ही दिनों की बात है.

दूधसब्जी से लेकर राशन तक का बिगड़ा बजट

जब भी ईंधन के दाम बढ़ते हैं, आम आदमी को ‘डबल झटका’ लगता है. पहला झटका तब लगता है जब वह अपनी गाड़ी में तेल भरवाता है, दूसरा और ज्यादा झटका तब लगता है जब वह बाजार में सब्जी या राशन खरीदने जाता है.

सब्जियां, फल, दूध, अनाज, खाने का तेल और पैकेज्ड फूड, ये सभी चीजें खेतों और फैक्ट्रियों से ट्रकों में लदकर शहरों तक पहुंचती हैं. खासतौर पर जल्दी खराब होने वाली चीजें जैसे हरी सब्जियां, दूध और फल सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं. इन चीजों को सुरक्षित रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज और तेज ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क की जरूरत होती है. दोनों ही चीजें बिजली और डीजल पर निर्भर हैं.

डीजल के 3 रुपये महंगे होने का मतलब है कि किसान के खेत से लेकर शहर की मंडी तक का सफर महंगा हो गया. मंडी का आढ़ती वह पैसा अपनी जेब से नहीं भरता, वह उसे खुदरा व्यापारी से वसूलता है. खुदरा व्यापारी भी नुकसान नहीं उठाता, वह उसे अंतिम उपभोक्ता यानी आपसे और हमसे वसूलता है. इस तरह, अप्रत्यक्ष रूप से पेट्रोलडीजल की महंगाई हमारी और आपकी खाने की थाली का खर्च बढ़ा देती है.

डिलीवरी ऐप्स से लेकर कैब तक सब होगा महंगा

आज का शहरी जीवन काफी हद तक ऑनलाइन डिलीवरी और ऐपबेस्ड सेवाओं पर निर्भर है. पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी का एक बड़ा असर इस डिजिटल इकोनॉमी पर भी पड़ने वाला है.

फूड डिलीवरी ऐप्स और ईकॉमर्स कंपनियों के डिलीवरी पार्टनर अपनी बाइक्स में पेट्रोल डलवाकर ही सामान आप तक पहुंचाते हैं. फ्यूल कॉस्ट बढ़ने से डिलीवरी की लागत बढ़ जाती है. इसका नतीजा यह होता है कि कंपनियों को अपना डिलीवरी चार्ज, प्लेटफॉर्म फीस या सर्ज प्राइसिंग बढ़ानी पड़ती है.

कैब और बाइक टैक्सी के किराये भी सीधे तौर पर ईंधन से जुड़े हैं. सीएनजी महंगी होने से शहर में चलने वाले ऑटो और कैब का किराया बढ़ना लगभग तय माना जा रहा है. यानी अगर आप ऑफिस जाने के लिए रोज कैब बुक करते हैं, या वीकेंड पर बाहर से खाना मंगवाते हैं, तो अब आपको इसके लिए अपनी जेब थोड़ी और ढीली करनी पड़ेगी.

अर्थव्यवस्था के हर पहिए पर महंगाई की मार

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम आने वाली भारी मशीनरी और पावर बैकअप के लिए बड़ेबड़े जनरेटर डीजल से ही चलते हैं. फैक्ट्रियों में कच्चे माल को लाने और तैयार माल को बाजार तक पहुंचाने का खर्च बढ़ जाता है. इस बढ़ी हुई लागत की भरपाई के लिए कंपनियां अपने उत्पाद के दाम बढ़ा देती हैं. यह असर रातोंरात नहीं दिखता, बल्कि धीरेधीरे बाजार में रेंगते हुए आता है.

ग्रामीण भारत में खेती आज भी डीजल पर बहुत ज्यादा निर्भर है. ट्रैक्टर चलाना हो, ट्यूबवेल या पंपसेट से खेतों की सिंचाई करनी हो, या फिर फसल कटने के बाद उसे ट्रैक्टरट्रॉली में भरकर नजदीकी अनाज मंडी तक ले जाना हो—हर कदम पर डीजल खर्च होता है. डीजल महंगा होने से खेती की कुल इनपुट कॉस्ट बढ़ जाती है. किसान की लागत बढ़ने का सीधा अर्थ है खाद्य महंगाई के ग्राफ का ऊपर जाना.

इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का असर एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी हवाई जहाज के ईंधन पर भी पड़ता है. आने वाले त्योहारी सीजन या छुट्टियों में अगर आप हवाई यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो फ्लाइट के टिकट भी आपको पहले के मुकाबले ज्यादा महंगे मिल सकते हैं.

आपके घर का बजट कितना बिगड़ेगा?

यह समझना बहुत जरूरी है कि महज 23 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी एक आम परिवार के मासिक खर्च को कैसे हिला कर रख देती है. इसे हम सीधा और परोक्ष, दोनों तरह के खर्चों के उदाहरण से समझ सकते हैं.

  1. स्कूल वैन का खर्च सीएनजी और डीजल के दाम 2 से 3 रुपये प्रति लीटर बढ़ने पर स्कूल वैन और बसों के संचालक सबसे पहले किराया बढ़ाते हैं. अनुमानित तौर पर, किराये में प्रति बच्चा 150 से 200 रुपये की बढ़ोतरी हो सकती है.अगर आपके घर में दो बच्चे स्कूल जाते हैं, तो स्कूल ट्रांसपोर्ट का खर्च हर महीने 300 से 400 रुपये अतिरिक्त बढ़ जाएगा.
  2. निजी वाहन का खर्च आप रोज ऑफिस जाने के लिए अपनी कार या बाइक का इस्तेमाल करते हैं. अगर आपकी गाड़ी महीने भर में 50 लीटर पेट्रोल की खपत करती है, तो पेट्रोल के दाम करीब 3 रुपये बढ़ने से सीधा असर यह होगा कि आपको पेट्रोल पंप पर हर महीने 150 रुपये ज्यादा चुकाने होंगे.
  3. रोजमर्रा के राशन का खर्च ट्रांसपोर्ट महंगा होने से दूध, सब्जी, फल और राशन के दामों में भी तेजी आती है.एक परिवार जो महीने का 8,000 रुपये किराने और सब्जी पर खर्च करता है, माल ढुलाई की बढ़ी लागत के कारण इस बिल में 3 से 5 प्रतिशत तक का उछाल आ सकता है. यानी राशन के बजट में लगभग 250 से 400 रुपये की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो सकती है.
  4. अन्य खर्चे महीने में 45 बार कैब का इस्तेमाल या ऑनलाइन फूड डिलीवरी में सर्ज प्राइसिंग और बढ़ा हुआ डिलीवरी चार्ज.यहां भी आराम से हर महीने 100 से 150 रुपये अतिरिक्त खर्च होने की संभावना है.

अगर इन सभी छोटीछोटी बातों को जोड़ लिया जाए, तो पेट्रोलडीजल में हुई 2 से 3 रुपये की बढ़ोतरी आपके घर के मासिक बजट में हर महीने 1000 रुपये से लेकर 1,400 रुपये तक का अतिरिक्त बोझ डाल सकती है. आपकी सैलरी वही है, लेकिन आपके बटुए की ‘खरीदारी करने की ताकत’ घट गई है.

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