प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से की गई सार्वजनिक अपील और सरकार द्वारा उठाए गए कड़े कदमों के बाद भारत में सोने की चमक फीकी पड़ती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री ने नागरिकों से आग्रह किया था कि वे अगले एक वर्ष तक सोने की खरीदारी से परहेज करें। इस अपील का सीधा असर बाजार पर देखा गया है, जहाँ मई के दौरान सोने की बिक्री और आयात में भारी कमी दर्ज की गई है। सरकार ने भी स्थिति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से 12 मई को सोने और चांदी पर आयात शुल्क को 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया था। इन नीतिगत निर्णयों के परिणामस्वरूप, भारत में सोने का आयात अप्रैल के 5.63 बिलियन डॉलर से 39.3 प्रतिशत घटकर मई में 3.42 बिलियन डॉलर रह गया है।

भारत की इस तस्वीर के विपरीत चीन का बाजार पूरी तरह से अलग रुख अपना रहा है। चीन में सोने की मांग न केवल बनी हुई है, बल्कि यह अपने चरम पर पहुंच गई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, चीन ने मई में 163 टन सोने का आयात किया, जो पिछले दो वर्षों से अधिक समय में सबसे बड़ा आंकड़ा है। यह लगातार तीसरा महीना है जब चीन में सोने का आयात 150 टन के स्तर को पार कर गया है। वर्ष की शुरुआत से ही चीन की ओर से फिजिकल बुलियन बार की मजबूत रिटेल मांग देखी जा रही है, जिसके चलते केवल पहले कुछ महीनों में ही चीन ने 692 टन सोने का आयात किया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 76 प्रतिशत अधिक है।
चीन की यह सक्रियता केवल बाजार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वहां का केंद्रीय बैंक भी सोने के भंडार को बढ़ाने में जुटा है। चीन के केंद्रीय बैंक ने मई में 10 टन सोने की खरीद की। यह लगातार 19वां महीना है जब चीनी केंद्रीय बैंक ने सोने के अपने भंडार में निरंतर वृद्धि की है। इस निरंतर खरीदारी के साथ, चीन का कुल गोल्ड रिजर्व अब 2,331 टन तक पहुंच गया है। वैश्विक परिदृश्य में अमेरिका अभी भी सबसे बड़ा स्वर्ण धारक बना हुआ है, जिसके फेड रिजर्व के पास लगभग 8,133 टन सोना सुरक्षित है। विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का सोने के प्रति यह अलगअलग रुख वैश्विक बाजार में आर्थिक गतिविधियों और निवेशकों के आत्मविश्वास को स्पष्ट रूप से दर्शा रहा है।



