नए लेबर कोड के तहत अब नौकरीपेशा लोग चाहें तो अपना पीएफ कॉन्ट्रिब्यूशन घटाकर हर महीने अपने हाथ में आने वाली सैलरी यानी ‘टेकहोम सैलरी’ बढ़ा सकते हैं. सुनने में यह बेहद लुभावना लगता है कि हर महीने बैंक खाते में ज्यादा पैसे आएंगे, लेकिन इसका सीधा असर आपके बुढ़ापे के फंड पर पड़ेगा. अगर आप बढ़ी हुई सैलरी को सही जगह निवेश नहीं करते हैं, तो रिटायरमेंट के वक्त आपको तगड़ा आर्थिक झटका लग सकता है. यह समझना बेहद जरूरी है कि आपके लिए पीएफ कटवाना बेहतर है या हर महीने ज्यादा सैलरी लेना.

नया नियम कैसे बढ़ाएगा आपकी टेकहोम सैलरी?
जैगल के सीईओ सुधीर कौशिक बताते हैं कि ईपीएफ खाते में बेसिक सैलरी का 12% हिस्सा जमा होता है. पुराने फ्रेमवर्क के तहत कई कंपनियां असल बेसिक सैलरी पर पीएफ काटती थीं, या फिर 15,000 रुपये की वैधानिक वेतन सीमा पर पीएफ काटा जाता था. इससे कम से कम 1,800 रुपये पीएफ खाते में जाते ही थे. नए लेबर कोड में भी यह 12% का अनिवार्य योगदान इसी 15,000 की सीमा तक ही लागू है. इससे ऊपर की सैलरी पर पीएफ कटवाना आमतौर पर स्वैच्छिक होता है. ऐसे में कंपनी के साथ आपसी सहमति बनाकर आप अपना पीएफ योगदान हर महीने 1,800 रुपये तक सीमित कर सकते हैं, जिससे आपकी टेकहोम सैलरी सीधे तौर पर बढ़ जाएगी.
किन कर्मचारियों को ज्यादा सैलरी का विकल्प नहीं चुनना चाहिए?
प्रोमोर फिनटेक की डायरेक्टर निशा सांघवी के मुताबिक, हर किसी के लिए सैलरी बढ़ाने का यह विकल्प फायदेमंद नहीं है. कुछ खास कर्मचारियों को यह गलती बिल्कुल नहीं करनी चाहिए:
- जो लोग अपने रिटायरमेंट के लिए पूरी तरह ईपीएफ पर निर्भर हैं.
- जिनकी कंपनी पूरी बेसिक सैलरी का 12% पीएफ में डाल रही है. योगदान घटाने पर एंप्लॉयर की तरफ से मिलने वाला पैसा भी बंद हो सकता है.
- 40 साल से ज्यादा उम्र के कर्मचारी, क्योंकि उनके पास रिटायरमेंट फंड बनाने के लिए कमाई के कम साल बचे हैं.
- वे लोग जिनकी बचत करने की आदत नहीं है या जिनके पास कोई इमरजेंसी फंड नहीं है.
- जो कर्मचारी शेयर बाजार के उतारचढ़ाव से घबराते हैं. फिलहाल ईपीएफ पर 8.2% का टैक्सफ्री सुरक्षित ब्याज मिल रहा है, जो अन्य फिक्स्ड इनकम विकल्पों में मिलना बहुत मुश्किल है.
एक छोटे से फैसले से डूबेंगे आपके लाखों रुपये
अब जरा इसे आंकड़ों की नजर से देखते हैं. मान लीजिए, किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 50,000 रुपये है. 12% के हिसाब से हर महीने उसके पीएफ खाते में 6,000 रुपये जमा होते हैं. नए नियम के तहत अगर वह केवल 1,800 रुपये कटवाने का फैसला करता है, तो हर महीने उसकी इनहैंड सैलरी 4,200 रुपये बढ़ जाएगी. लेकिन लंबी अवधि में इसका गणित डराने वाला है. अगर यही 4,200 रुपये पीएफ में ही जाते रहते, तो 8.25% ब्याज दर के हिसाब से 25 साल में करीब 41 से 42 लाख रुपये का मजबूत फंड तैयार हो जाता.
निशा सांघवी बताती हैं कि अगर कंपनी ने भी अपना स्वैच्छिक योगदान बंद कर दिया, तो रिटायरमेंट कॉर्पस को लगने वाला यह झटका दोगुना होकर करीब 80 लाख रुपये तक पहुंच सकता है. इसके अलावा टैक्स का पेंच भी है. टेकहोम सैलरी बढ़ने से आपका इनकम टैक्स भी बढ़ सकता है, जबकि पीएफ में जमा पैसा अधिकतर टैक्सफ्री होता है.
किसे पीएफ योगदान घटाने का फैसला लेना चाहिए?
वित्तीय जानकारों का मानना है कि कुछ खास परिस्थितियों में ही पीएफ में कटौती करना समझदारी है. अगर आप पर 12 से 14 फीसदी की उच्च ब्याज दर वाले किसी महंगे लोन का बोझ है, तो आप ज्यादा सैलरी लेकर उसकी किश्तें चुका सकते हैं. 14 फीसदी का लोन जल्द चुकाना 8.25 फीसदी का पीएफ ब्याज कमाने से ज्यादा बेहतर वित्तीय कदम है. इसके अलावा, यह विकल्प केवल उन अनुशासित कर्मचारियों के लिए अच्छा है जो अपनी बढ़ी हुई टेकहोम सैलरी को बेहतर जगहों पर निवेश करके पीएफ से ज्यादा रिटर्न निकाल सकते हैं. अगर आप निवेश में अनुशासन नहीं रख सकते, तो पीएफ कटने देना ही आपके भविष्य के लिए सबसे सुरक्षित रणनीति है.



