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​टकराव भी, गुजारा भी नहीं, अमेरिका के लिए चीन आखिर इतना जरूरी क्यों? जिनपिंग की यात्रा चर्चा में

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग तीन दिन के अमेरिका दौरे पर हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प खुद उनका स्वागत करने एयरपोर्ट पहुंचेंगे. इसलिए यह यात्रा सुर्खियां बटोर रही है. अमेरिकाचीन के रिश्ते जगजाहिर हैं. जानकार इस यात्रा और ट्रम्प की ओर से चल रही गर्मजोशी को अपनेअपने नजरिए से देख रहे हैं. कई ऐसे मुद्दे सामने आए हैं जब चीन ने तल्खी के साथ अमेरिका को जवाब दिया है.अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए भारी टैरिफ और धमकियों के जवाब में चीन ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी दबाव में झुकने वाला नहीं है . वह ट्रेड वॉर से डरता नहीं है. आइए, इस बहुचर्चित यात्रा और अमेरिकाचीन के रिश्तों, जरूरतों, मजबूरियों को समझते हैं.

​टकराव भी, गुजारा भी नहीं, अमेरिका के लिए चीन आखिर इतना जरूरी क्यों? जिनपिंग की यात्रा चर्चा में

सीधे और सपाट शब्दों में कहें तो अमेरिका के लिए चीन जरूरी इसलिए है क्योंकि वह बड़ा बाजार, बड़ा निर्माता और अहम सप्लायर है. रेयर अर्थ और कम लागत वाले औद्योगिक सामान इस रिश्ते को और महत्वपूर्ण बनाते हैं. दूसरी ओर, इसी निर्भरता को अमेरिका जोखिम के रूप में भी देखता है. इसलिए अमेरिकी नीति दो दिशाओं में चलती है. एक ओर चीन के साथ व्यापार और बातचीत जारी रखना. दूसरी ओर वैकल्पिक सप्लायर और घरेलू क्षमता तैयार करना. जिनपिंग के दौरे से इस संतुलन की दिशा समझने में मदद मिल सकती है. असली चुनौती यह है कि दोनों देश प्रतिस्पर्धा करते हुए भी जरूरी आर्थिक रिश्तों को अचानक टूटने से बचाएं.

रेयर अर्थ की क्या है अहमियत?

रेयर अर्थ 17 धात्विक तत्वों का समूह है. इनके नाम आम लोगों के लिए परिचित न हों, लेकिन इनका इस्तेमाल कई आधुनिक उत्पादों में होता है. इलेक्ट्रिक कारों की मोटर, स्मार्टफोन, पवन ऊर्जा के उपकरण और कुछ रक्षा प्रणालियों में इनकी जरूरत पड़ती है. इन तत्वों को जमीन से निकालना ही काफी नहीं होता. उन्हें अलग करना, शुद्ध करना और उपयोगी रूप में बदलना भी जरूरी है. यह प्रक्रिया कठिन और महंगी हो सकती है.

चीन ने इस पूरी आपूर्ति शृंखला में मजबूत जगह बनाई है. इसलिए अमेरिका के लिए केवल खदानें खोज लेना पर्याप्त नहीं है. उसे प्रसंस्करण, तकनीक और तैयार चुंबकों की आपूर्ति भी सुरक्षित करनी होती है. जब किसी एक देश के पास उत्पादन या प्रसंस्करण की बड़ी क्षमता हो, तो निर्यात में बदलाव का असर दूसरे देशों के उद्योगों पर पड़ सकता है. यही वजह है कि रेयर अर्थ का सवाल व्यापार से आगे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक योजना से जुड़ गया है.

अमेरिका चीन से पूरी तरह अलग क्यों नहीं हो सकता?

अमेरिका कई उत्पाद खुद बनाता है. लेकिन उसकी कंपनियां दुनिया भर से कच्चा माल और पुर्जे भी खरीदती हैं. चीन इन वस्तुओं का बड़ा उत्पादक और आपूर्तिकर्ता है. इलेक्ट्रॉनिक हिस्से, बैटरियां, मशीनरी और औद्योगिक सामग्री कई कंपनियों की उत्पादन प्रक्रिया में इस्तेमाल होती हैं. अगर आपूर्ति अचानक रुक जाए, तो कारखानों का काम धीमा पड़ सकता है. कंपनियों को नए सप्लायर खोजने पड़ सकते हैं. इससे लागत बढ़ सकती है और सामान बाजार तक देर से पहुंच सकता है. इसी कारण अमेरिका चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश करता है, लेकिन मौजूदा आपूर्ति संबंधों को एक झटके में खत्म नहीं कर सकता. वैकल्पिक स्रोत तैयार करने में समय लगता है. नई खदान, रिफाइनरी और कारखाने बनाने पड़ते हैं. प्रशिक्षित कामगार और तकनीक भी चाहिए. इन सबके लिए लंबे समय के निवेश की जरूरत होती है.

चीन इलेक्ट्रॉनिक्स और बैटरी समेत चीजों का बड़ा उत्पादक और आपूर्तिकर्ता है. फोटो: Pexels

सस्ते सामान का भी है सवाल

चीन बड़े पैमाने पर उत्पादन करता है. वहां कई उद्योगों में कच्चे माल से लेकर तैयार वस्तु तक की आपूर्ति शृंखला मौजूद है. इससे कुछ उत्पादों और पुर्जों को कम लागत पर बनाना संभव होता है. अमेरिकी कंपनियों के लिए ऐसे सामान खरीदना कई बार खुद उत्पादन करने से सस्ता पड़ता है. कम कीमत का लाभ उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है. इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू सामान और दूसरे उत्पादों की कीमतें कम रखने में आयात की भूमिका हो सकती है. व्यापार पर ऊंचे शुल्क लगें या आपूर्ति में बाधा आए, तो कंपनियों की लागत बढ़ सकती है. उसका असर कीमतों पर पड़ सकता है. लेकिन कम कीमत ही पूरी कहानी नहीं है. अमेरिका के नीति निर्माता यह भी देखते हैं कि जरूरी सामान के लिए एक ही देश पर ज्यादा निर्भरता जोखिम पैदा कर सकती है. इसलिए वे सस्ते आयात और सुरक्षित आपूर्ति के बीच संतुलन खोजते हैं.

अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन केवल उत्पादन का ठिकाना नहीं है. वह एक बड़ा उपभोक्ता बाजार भी है. वहां कारोबार करने से कंपनियों को ग्राहकों तक पहुंच मिलती है. कई अमेरिकी कंपनियां चीन में बिक्री, साझेदारी या निर्माण से जुड़ी हैं. वहीं चीनी कंपनियों के लिए अमेरिका बड़ा बाजार और निवेश का महत्वपूर्ण गंतव्य रहा है. दोनों देशों के कारोबारी रिश्तों में निवेश, तकनीक और रोजगार जैसे मुद्दे जुड़े हैं. तनाव बढ़ने पर कंपनियां नए निवेश टाल सकती हैं. उन्हें यह चिंता हो सकती है कि नियम, शुल्क या निर्यात नियंत्रण अचानक बदल जाएंगे. शी जिनपिंग के दौरे से जुड़ी चर्चाओं में निवेश और व्यापार को स्थिर रखने की कोशिश अहम हो सकती है. सीमित समझौते भी कंपनियों को कुछ भरोसा दे सकते हैं. पर इसका अर्थ यह नहीं कि दोनों देशों की सभी समस्याएं खत्म हो जाएंगी.

सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत तकनीक भी अहम मुद्दे हैं.

तकनीक और राष्ट्रीय सुरक्षा भी जरूरी

चीन और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा अब सिर्फ सामान की खरीदबिक्री तक सीमित नहीं है. सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत तकनीक भी अहम मुद्दे हैं. अमेरिका कुछ उच्च तकनीक और चिप निर्माण उपकरणों के निर्यात पर नियंत्रण लगाता रहा है. उसका कहना है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कदम है. चीन भी कुछ खनिजों और तकनीकी प्रक्रियाओं के निर्यात पर नियंत्रण लगा सकता है. इससे दोनों पक्षों को पता चलता है कि आपूर्ति शृंखला दबाव बनाने का साधन बन सकती है. यही कारण है कि वार्ताओं में निर्यात नियमों और भरोसेमंद आपूर्ति पर चर्चा की संभावना रहती है.

क्या चीन पर निर्भरता खत्म हो सकती है?

अमेरिका और उसके साझेदार नए स्रोत खोज रहे हैं. वे दूसरे देशों में खनन और प्रसंस्करण बढ़ाना चाहते हैं. रीसाइक्लिंग पर भी ध्यान दिया जा रहा है. इससे एक देश पर निर्भरता घट सकती है. फिर भी यह बदलाव तुरंत नहीं होगा. नई परियोजनाओं को मंजूरी, पूंजी, तकनीक और बुनियादी ढांचे की जरूरत पड़ती है. लागत भी अधिक हो सकती है. चीन की मौजूदा क्षमता और अनुभव के बराबर व्यवस्था बनाना कई साल ले सकता है. इसलिए लक्ष्य पूरी तरह अलग होना नहीं, बल्कि जोखिम घटाना हो सकता है. अमेरिका चीन से कुछ सामान खरीदता रह सकता है. साथ ही वह दूसरे देशों से भी आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश कर सकता है.

शी जिनपिंग.

जिनपिंग के दौरे पर नजर क्यों?

शी जिनपिंग का दौरा केवल एक औपचारिक मुलाकात नहीं माना जाता. इसके जरिए दोनों पक्ष व्यापारिक तनाव कम करने, निवेश का माहौल बेहतर करने और जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति पर बात कर सकते हैं. रेयर अर्थ इस चर्चा का खास हिस्सा हैं, क्योंकि उनका असर इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर रक्षा उद्योग तक पड़ता है. हालांकि, एक बैठक से पुराने मतभेद मिटना तय नहीं है. ताइवान, तकनीक, शुल्क और सुरक्षा जैसे मुद्दे संवेदनशील बने रह सकते हैं. फिर भी बातचीत से अचानक टकराव का खतरा घट सकता है. कंपनियों और बाजारों को भी कुछ स्पष्टता मिल सकती है.

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