बढ़ती महंगाई के बीच आपकी रसोई का बजट न बिगड़े, इसके लिए सरकार ने एक सख्त कदम उठाया है. भारत सरकार ने देश से चीनी के निर्यात पर तत्काल प्रभाव से पूरी तरह पाबंदी लगा दी है. यह रोक 30 सितंबर 2026 तक या अगले आदेश तक लागू रहेगी. यह फैसला एक ऐसे समय में लिया गया है जब देश में खानेपीने की चीजों के दाम एक बेहद संवेदनशील मुद्दा बने हुए हैं. इस बड़े फैसले का सीधा मतलब यह है कि आने वाले त्योहारी सीजन और महीनों में चीनी की मिठास आपकी जेब पर भारी नहीं पड़ेगी.

घरेलू बाजार में कैसे थमेगी महंगाई की आग
इस पाबंदी के पीछे सरकार की रणनीति बिल्कुल साफ है. वह किसी भी कीमत पर को बेकाबू नहीं होने देना चाहती. दरअसल, अल नीनो के कारण मॉनसून को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है. प्रमुख उत्पादक राज्यों में गन्ने की पैदावार घटने की आशंका है, जिससे लगातार दूसरे सीजन में उत्पादन खपत से कम रह सकता है. ऐसे में सरकार के लिए घरेलू बाजार में सप्लाई बनाए रखना पहली प्राथमिकता है. इसके अलावा, पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए भी चीनी का स्टॉक बचाना जरूरी है. एक्सपोर्ट रुकने से देश के पास पर्याप्त स्टॉक बचेगा, जिससे इथेनॉल का उत्पादन सुचारू रहेगा बल्कि खाद्य महंगाई पर भी मजबूत लगाम कसेगी.
शेयर बाजार में चीनी कंपनियों का बुरा हाल
जैसे ही निर्यात को ‘प्रतिबंधित’ श्रेणी में डालने की खबर बाजार में आई, शेयर बाजार में चीनी कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली देखने को मिली. गुरुवार को धामपुर शुगर मिल्स और द्वारिकेश शुगर इंडस्ट्रीज जैसी दिग्गज कंपनियों के शेयर लगभग 7 फीसदी तक लुढ़क गए. उत्तम शुगर मिल्स और बजाज हिंदुस्तान शुगर के शेयरों ने भी निवेशकों को भारी नुकसान कराया. हालांकि, एक तरफ जहां चीनी सेक्टर दबाव में दिखा, वहीं पूरे शेयर बाजार का मूड सकारात्मक रहा. इस दौरान बीएसई सेंसेक्स 522.64 अंक उछला, जबकि एनएसई निफ्टी में भी 95.65 अंकों की शानदार तेजी दर्ज की गई.
विदेशी बाजारों में गहराएगा सप्लाई का भारी संकट
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है. ऐसे में यहां से सप्लाई रुकने का सीधा असर वैश्विक बाजार पर पड़ना तय है. सूडान, लीबिया, श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे एशियाई व अफ्रीकी देश अपनी जरूरत के लिए भारतीय चीनी पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं. अब इन देशों को मजबूरी में ब्राजील या थाईलैंड का रुख करना होगा. इसके नतीजे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्ची तथा सफेद चीनी की कीमतों में तेज उछाल आने की आशंका है. मध्य पूर्व में ईरान से जुड़े संघर्ष और बढ़ती ऊर्जा लागत ने वैश्विक शिपिंग रूटों पर पहले से ही भारी दबाव बना रखा है, जिससे इन आयातक देशों के लिए मुश्किलें और भी बढ़ने वाली हैं.
अर्थव्यवस्था को संभालने की एक बड़ी कवायद
चीनी पर लिया गया यह फैसला अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है. डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के 95.75 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने के कारण वित्तीय स्थिति फिलहाल दबाव में है. विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सरकार ने चीनी एक्सपोर्ट बैन से ठीक एक दिन पहले सोनेचांदी पर आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया है. हालात की गंभीरता को देखते हुए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आम नागरिकों से देश की बाहरी वित्तीय स्थिति स्थिर होने तक एक साल के लिए सोना न खरीदने की खास अपील की है.
हालांकि, इस प्रतिबंध के बीच सरकार ने उन शिपमेंट्स को बड़ी राहत दी है जिनकी कस्टम क्लीयरेंस हो चुकी है या जो बंदरगाहों पर लोड हो चुके हैं. इसके अलावा, अमेरिका व यूरोपियन यूनियन को तय कोटे के तहत होने वाले निर्यात पर यह पाबंदी लागू नहीं होगी.



