बीते काफी दिनों से डॉलर के मुकाबले में रुपए में काफी गिरावट देखने को मिल चुकी है. खास बात तो ये है कि पिछले साल 15 अगस्त से अब तक रुपए में डॉलर के मुकाबले में 10 फीसदी की गिरावट देखी जा चुकी है. जिसकी वजह से एक डॉलर की कीमत 95.50 रुपए के आसपास है. जोकि कुछ महीने पहले 97 रुपए के करीब पहुंच गई थी. क्या आपको जानकारी है कि जिस 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ था, तब एक डॉलर की वैल्यू भारतीय रुपए में कितनी थी?

वैसे आम धारणा की बात करें तो उस समय एक रुपया और 1 डॉलर बराबर थे. लेकिन सवाल यही है कि उस दिन क्या सच में 1 डॉलर की कीमत 1 रुपया थी या फिर 4 रुपए? सोशल मीडिया पर अक्सर दावों का दौर चलता है, लेकिन इतिहास और अर्थशास्त्र का गणित कुछ और ही कहानी बयां करता है.
स्वतंत्रता दिवस के आसपास भारतीय रुपए की ऐतिहासिक चाल और उसके मूल्य को लेकर तरहतरह की चर्चाएं शुरू हो जाती हैं. एक आम मिथक यह है कि 1947 में भारत की आजादी के वक्त भारतीय रुपया और अमेरिकी डॉलर बिल्कुल एक बराबर थे. वहीं, कई वित्तीय विशेषज्ञ और ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि 15 अगस्त 1947 को 1 डॉलर की कीमत लगभग 4 रुपए के आसपास थी.
आखिर इस 4 रुपए के आंकड़े के पीछे की क्या कैलकुलेशन थी? 1947 में जब फॉरेक्स मार्केट नहीं हुआ करता था, तब डॉलर और रुपए का रेट कैसे तय होता था? आइए, आसान और सरल भाषा में समझते हैं 1947 के करेंसी वैल्यूएशन और उसका गणित…
1947 में कैसे होती थी करेंसी की कैलकुलेशन?
आज की तरह 1947 में भारतीय रुपए का एक्सचेंज रेट बाजार की मांग और सप्लाई से तय नहीं होता था. तब भारत लंबे समय तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहा था, इसलिए भारतीय करेंसी ‘पाउंड स्टर्लिंग’ के साथ जुड़ी हुई थी. ऐसे में आजादी के समय तय नियम के मुताबिक 1 पाउंड स्टर्लिंग 13.33 भारतीय रुपए था. दूसरी तरफ, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद लागू हुए ब्रेटन वुड्स समझौते के तहत इंटरनेशनल मार्केट पाउंड और डॉलर की दर 4.03 अमेरिकी डॉलर थी. इसी फॉर्मूले और कैलकुलेशन के तहत एक डॉलर की वैल्यू 4 रुपए के आसपास थी.
कहां से आया डॉलर और रुपया बराबर वाला भ्रम
सोशल मीडिया और कई बहसों में यह दावा किया जाता है कि 1947 में एक डॉलर की वैल्यू एक रुपए के बराबर थी. ये भ्रम दो कारणों से पैदा हुआ. पहला, 1947 में भारत सरकार के बहीखातों पर कोई बड़ा बाहरी कर्ज नहीं था. बल्कि ब्रिटेन पर भारत का ‘स्टर्लिंग बैलेंस’ बकाया था. वहीं दूसरा, आजादी के समय भारत का कोई स्वतंत्र विदेशी मुद्रा बाजार या डॉलर इंडेक्स से सीधा लिंक नहीं था. चूंकि कोई औपचारिक डॉलर बैलेंस शीट नहीं थी, इसलिए लोगों ने यह मान लिया कि दोनों करेंसीज बराबर थी. जबकि ऐसा नहीं था.
4 रुपए स्तर से अब तक गिरावट का सफर
- रुपए में पहली गिरावट 1949 में देखने को मिली, जब ब्रिटेन ने आर्थिक सुस्ती के कारण पाउंड का मूल्य घटाया, तो भारत को भी निर्यात प्रतिस्पर्धी बनाए रखने के लिए रुपए की दर घटाकर $1 डॉलर के मुकाबले में 4.76 रुपए करनी पड़ी.
- उसके बाद 1962 और 1965 के बीच भारत को दो युद्ध लड़ने पड़े. पहले चीन के साथ उसके बाद 1965 में पाकिरस्तान के साथ. साथ ही उसी दौरान देश को भीषण सूखे का भी सामना करना पड़ा. जिसकी वजह से देश की इकोनॉमी को काफी नुकसान उठाना पड़ा. 1966 में तत्कालीन सरकार को रुपए का 57% तक अवमूल्यन करना पड़ा. एक डॉलर के मुकाबले रुपया 7.50 रुपए पर आ गया.
- 1991 का संकट कौन भूल सकता है. जब देश के पास केवल 2 हफ्ते के आयात का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था. रिजर्व बैंक और सरकार ने रुपए का लगभग 1820 फीसदी अवमूल्यन किया और 1993 में रुपए को मार्केटड्रिवन बना दिया. तब एक डॉलर की वैल्यू 24.50 रुपए के पार चली गई थी.
- 2000 के दशक तक पहुंचते पहुंचते भारतीय करेंसी में बड़ी गिरावट देखने को मिल चुकी थी. देश में कच्चे तेल का आयात काफी होने लग गया था. जिसका भुगतान डॉलर में करना पड़ता था. जिसकी वजह से डॉलर की डिमांड लगातार बनी रही और एक डॉलर के मुकाबले रुपया 48 के लेवल पर आ गया.
- मौजूदा समय में डॉलर की वैल्यू 95 रुपए के पार पहुंच गई हैं. जिसकी सबसे बड़ी वजह ईरान और यूएस के बीच वॉर है. होर्मुज स्ट्रेट में आने वाली बाधाओं की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखने को मिला है. वहीं दूसरी ओर जब से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप टैरिफ वॉर शुरू किया है. उसके बाद डॉलर के मुकाबले में रुपया लगातर गिर रहा है.
एक साल में कितनी आ चुकी है गिरावट?
बीते एक साल में रुपए में डॉलर के मुकाबले में करीब 10 फीसदी की गिरावट देखने को मिल चुकी है. पिछले साल 15 अगस्त 2025 को एक डॉलर के मुकाबले रुपया 87 के आसपास था, जोकि 95.50 के लेवल पर दिखाई दे रहा है. वैसे 15 अगस्त 1947 को 1 डॉलर के 4 रुपए के आसपास होने की कैलकुलेशन कोई काल्पनिक आंकड़ा नहीं, बल्कि पाउंडडॉलररुपए की ‘त्रिकोणीय विनिमय दर’ का सटीक गणित थी. आजादी के वक्त भारत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषिआधारित और सीमित विदेशी व्यापार वाली थी. पिछले आठ दशकों में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था का दायरा बढ़ाया है, और आज भले ही डॉलर के मुकाबले रुपए का आंकड़ा बदला हो, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती आर्थिक ताकतों में से एक बन चुकी है.


