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14 दिन की बच्ची को पिता ने जिंदा दफना दिया, नाना ने मिट्टी हटाई तो चल रही थी सांसें… फिर ऐसे बदली पूरी जिंदगी..

करीब सात दशक पहले एक नवजात बच्ची की जिंदगी की शुरुआत ही मौत से संघर्ष के साथ हुई। जन्म के कुछ ही दिनों बाद मां की मौत हो गई। परिवार में मातम था और इसी बीच बच्ची को उसके पिता अपने साथ ले गए। लेकिन कुछ ही देर बाद बच्ची के नाना को अनहोनी की आशंका हुई। वह पीछे-पीछे निकल पड़े।

रास्ते में उन्हें बच्ची कहीं दिखाई नहीं दी। तलाश करते हुए जब वह नदी के पास पहुंचे, तो मिट्टी में एक छोटा-सा गड्ढा नजर आया। नाना ने हाथों से मिट्टी हटानी शुरू की और कुछ ही देर में कपड़े में लिपटी वही नवजात बच्ची मिल गई। हैरानी की बात थी कि बच्ची की सांसें चल रही थीं।

मां की मौत के बाद बदल गई जिंदगी

बच्ची के जन्म के करीब दो सप्ताह के भीतर उसकी मां की अचानक मौत हो गई थी। परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था। मां अपने मायके में रह रही थीं और प्रसव के कुछ समय बाद ही काम पर लौट गई थीं।

मां की मौत के बाद बच्ची की जिम्मेदारी उसके पिता को सौंप दी गई। लेकिन नाना को अपनी बेटी के साथ पहले हुए कथित अत्याचार याद थे। उन्हें डर था कि कहीं बच्ची के साथ भी कुछ अनहोनी न हो जाए।

मिट्टी के नीचे मिली जिंदगी

नाना ने जब मिट्टी हटाई तो बच्ची कपड़े में लिपटी हुई मिली। उन्होंने उसके चेहरे से मिट्टी साफ की और सांस जांची। बच्ची जिंदा थी।

नाना उसे घर ले आए। उस समय अस्पताल या इलाज की सुविधा आसानी से उपलब्ध नहीं थी। बच्ची को गर्म रखने के लिए उसे पशुओं के बाड़े में रखा गया और बकरी का दूध पिलाया गया। परिवार की महिलाओं ने भी उसे दूध पिलाकर बचाने में मदद की।

नाना ने बेटी की तरह पाला

समय के साथ बच्ची बड़ी हुई। नाना ने उसे अपनी बेटी की तरह पाला और पढ़ाई के लिए स्कूल भेजा। गरीबी और सामाजिक भेदभाव के बावजूद उन्होंने उसकी शिक्षा नहीं रुकने दी।

बच्ची ने आगे चलकर अपना जीवन खुद बनाने का फैसला किया। पढ़ाई के बाद उसे नर्सिंग का प्रशिक्षण मिला और उसने अस्पताल में काम शुरू किया। यहीं से उसके जीवन को एक नई दिशा मिली।

नौकरी से सामाजिक आंदोलन तक का सफर

अस्पताल में काम करने के दौरान वह सामाजिक मुद्दों से जुड़ने लगीं। महिलाओं, दलित समुदाय और मजदूरों से जुड़े सवालों पर उन्होंने काम किया। धीरे-धीरे सामाजिक कार्य उनके जीवन का प्रमुख हिस्सा बन गया।

बाद में उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा और स्थानीय निकाय चुनाव जीता। आपातकाल के दौर में उन्हें जेल भी जाना पड़ा, लेकिन मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने सामाजिक कार्य जारी रखा।

जिस बच्ची को मरने के लिए छोड़ दिया गया, वही बनी आवाज

अपनी जिंदगी के संघर्षों को उन्होंने बाद में आत्मकथा का रूप दिया। समय के साथ वह महिला शिशु हत्या और बेटियों के खिलाफ भेदभाव जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने लगीं।

उनकी कहानी का सबसे भावुक पहलू यही है कि जिस नवजात बच्ची को कभी मिट्टी के नीचे छोड़ दिया गया था, वही बड़ी होकर उन बेटियों की आवाज बनी जिन्हें समाज में बराबरी का हक नहीं मिल पाता।

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