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​पहले निषाद-राजभर, अब जयंत… एनडीए के सहयोगी कैसे बढ़ा रहे अपनी बार्गेनिंग पावर?

यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी करीब छह महीने का वक्त बाकी है, लेकिन चुनावी गठबंधन की असली राजनीति अभी से शुरू हो गई है. भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए में शामिल सहयोगी दल अपनेअपने प्रभाव वाले इलाकों और जातीय समीकरणों के जरिए अपनी राजनीतिक ताकत का एहसास कराने में जुट गए हैं. पश्चिमी यूपी में जयंत चौधरी की बढ़ती सक्रियता हो, या फिर पूर्वांचल में संजय निषाद और ओमप्रकाश राजभर की बयानबाजी.

​पहले निषाद-राजभर, अब जयंत… एनडीए के सहयोगी कैसे बढ़ा रहे अपनी बार्गेनिंग पावर?

2027 में बीजेपी अपने सहयोगियों को कितनी सीट देगी? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि सहयोगी दल जानते हैं कि चुनाव करीब आते ही सीट बंटवारे की बातचीत होगी. ऐसे में उससे पहले अपनी राजनीतिक कीमत बढ़ाना जरूरी है. यानी फिलहाल गठबंधन टूटने या बनने की लड़ाई नहीं है. लड़ाई है एनडीए के भीतर किसकी कितनी राजनीतिक हैसियत है. जयंत से लेकर राजभर तक.. सभी अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रहे हैं.

जयंत चौधरी ने पश्चिम से बढ़ाया दबाव

सबसे ज्यादा चर्चा इस समय राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष जयंत चौधरी की सक्रियता की है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगातार कार्यक्रमों और राजनीतिक गतिविधियों के जरिए जयंत अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहे हैं. खास बात यह है कि वह समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर भी लगातार हमला बोल रहे हैं. यानी एक तरफ बीजेपी के साथ गठबंधन को मजबूत रखने का संदेश.. दूसरी तरफ अपने पुराने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी सपा के खिलाफ आक्रामक राजनीति.

कितनी सीट चाहते हैं जयंत?

इसके पीछे 2027 का बड़ा चुनावी गणित माना जा रहा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाताओं और किसान राजनीति के बीच राष्ट्रीय लोक दल का अपना आधार है. यही जयंत चौधरी की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है और इसी आधार को वह 2027 के सीट बंटवारे में अपनी बार्गेनिंग पावर के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं. सियासी गलियारों में चर्चा है कि राष्ट्रीय लोक दल 2027 में 2022 के गठबंधन के दौरान मिली 33 सीटों के आसपास ही अपनी दावेदारी रखना चाहता है.

चारू चौधरी भी लड़ेंगी चुनाव?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि जयंत चौधरी की पत्नी चारू चौधरी भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसी विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतर सकती हैं. अगर ऐसा होता है तो परिवार की राजनीतिक सक्रियता भी राष्ट्रीय लोक दल की चुनावी रणनीति का हिस्सा बनेगी. यानी जयंत का संदेश साफ हो सकता है कि पश्चिमी यूपी में राष्ट्रीय लोक दल को जितनी जमीन मिलेगी, उतनी ही एनडीए की चुनावी ताकत बढ़ेगी.

अब पूर्वांचल में संजय निषाद

निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद पिछले कुछ समय से अपनी सरकार के सामने कई मुद्दों को लेकर मुखर रहे हैं. सबसे बड़ा उदाहरण गोंडा में विनोद निषाद की हत्या का मामला है. विनोद निषाद की हत्या के बाद संजय निषाद ने सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की. धरना दिया… मुख्यमंत्री से मुलाकात की… आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई और मुठभेड़ तक की मांग की. संजय निषाद का यह तेवर सिर्फ एक आपराधिक मामले तक सीमित नहीं माना जा रहा.

संजय निषाद की असली ताकत क्या?

संजय निषाद की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनका निषाद समाज के बीच प्रभाव है. पूर्वांचल की कई विधानसभा सीटों पर निषाद मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं. बीजेपी के लिए भी यह सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि संजय निषाद सरकार से नाराजगी के संकेत देते हुए भी एनडीए छोड़ने की बात से इनकार करते रहे हैं. संजय निषाद की रणनीति गठबंधन के अंदर अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने की है.

इसी बीच सपा नेता माता प्रसाद पांडेय से संजय निषाद की मुलाकात ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी. हालांकि इसे शिष्टाचार मुलाकात बताया गया, लेकिन चुनावी साल में सहयोगी दल के बड़े नेता की विपक्षी खेमे के वरिष्ठ नेता से मुलाकात का राजनीतिक अर्थ निकाला जाना स्वाभाविक है. इस मुलाकात के बाद संजय निषाद ने वो बीजेपी महामंत्री से भी मिले हैं और उन्होंने पहले से ज्यादा सीटें देने की मांग की है.

2022 का सीट गणित क्या बताता है?

अब 2022 के विधानसभा चुनाव का गणित देखिए. बीजेपी के सहयोगी दलों ने अलगअलग संख्या में सीटों पर चुनाव लड़ा था. राष्ट्रीय लोक दल — 33 सीट, निषाद पार्टी — 11 सीट, अपना दल — 17 सीट, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी — 19 सीट यानी सहयोगियों का अपना चुनावी विस्तार पहले से मौजूद है. 2027 में असली सवाल यह होगा कि पिछली बार के प्रदर्शन को आधार बनाकर कौन सहयोगी कितनी सीट की मांग करता है.

राजभर ने भी शुरू की तैयारी

अब बात ओमप्रकाश राजभर की. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर भी पूर्वांचल में अपनी संगठनात्मक जमीन मजबूत करने में जुटे हैं. राजभर ने करीब 40 नेताओं को विधानसभा स्तर पर जिम्मेदारियां देकर संगठन को चुनावी मोड में डाल दिया है. वह लगातार यह दावा भी करते रहे हैं कि उनकी पार्टी का प्रभाव करीब 128 विधानसभा सीटों तक है. अब राजनीतिक तौर पर इस दावे का मतलब समझिए.

अनुप्रिया पटेल का अलग तरीका

एनडीए में अपना दल सोनेलाल की अनुप्रिया पटेल भी अपनी राजनीतिक जगह बनाए हुए हैं, लेकिन अनुप्रिया पटेल की रणनीति कुछ अलग है. वह सरकार के भीतर रहते हुए सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर अपनी आवाज उठाती रही हैं. 69 हजार शिक्षक भर्ती… संविदा भर्ती… पिछड़े वर्ग और सामाजिक न्याय से जुड़े सवाल… इन मुद्दों पर अनुप्रिया पटेल कई बार अपनी बात मजबूती से रख चुकी हैं. बाकी सहयोगियों की तुलना में वो सीटों को लेकर ज्यादा मुखर न हैं.

चार सहयोगी, चार अलग ताकत

अगर पूरे एनडीए के सहयोगी समीकरण को एक तस्वीर में समझें तो जयंत चौधरी= पश्चिमी यूपी + जाट + किसान राजनीति, संजय निषाद= पूर्वांचल + निषाद समाज, ओमप्रकाश राजभर= राजभर + अति पिछड़ा सामाजिक आधार, अनुप्रिया पटेल= कुर्मी समेत पिछड़ा वर्ग + अपना दल का संगठन यानी बीजेपी के पास बड़ा संगठन और व्यापक वोट आधार है, लेकिन सहयोगी दलों के पास स्थानीय और सामाजिक प्रभाव है. यही सीट बंटवारे की बातचीत का आधार बनेगा.

आखिर सहयोगी दबाव क्यों बना रहे हैं?

हर पार्टी चाहती है कि चुनाव में उसकी पहचान और राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़े. सहयोगी दलों के लिए विधानसभा सीटें सिर्फ विधायक बनाने का माध्यम नहीं हैं. सीटों की संख्या तय करती है कि किस पार्टी का संगठन कितना मजबूत होगा, किस पार्टी के पास कितने विधायक होंगे और सरकार बनने की स्थिति में मंत्रिमंडल में उसका कितना वजन होगा… और सबसे महत्वपूर्ण कि अगले चुनाव में बीजेपी के साथ बातचीत की उसकी ताकत कितनी होगी.

बीजेपी की भी मजबूरी समझिए

बीजेपी के सामने भी बड़ा संतुलन है. बीजेपी स्वाभाविक तौर पर ज्यादा से ज्यादा सीटों पर खुद चुनाव लड़ना चाहेगी, क्योंकि अगर सरकार बनती है तो ज्यादा विधायक होने का मतलब सत्ता में ज्यादा मजबूत पकड़, लेकिन सहयोगियों को बहुत कम सीटें देने का जोखिम भी है. अगर सहयोगी असंतुष्ट हुए तो उसका असर कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच पड़ सकता है. और गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत है वोट का ट्रांसफर.

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