विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने लगातार चार महीने तक भारतीय शेयर बाजार में बिकवाली करने के बाद आखिरकार जुलाई 2026 में वापसी कर ली. NSDL के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी निवेशकों ने जुलाई में भारतीय शेयर बाजार में 20,200 करोड़ रुपये का निवेश किया. वहीं, अगर इक्विटी, डेट, हाइब्रिड फंड और म्यूचुअल फंड को मिलाकर देखा जाए, तो कुल विदेशी निवेश 40,031 करोड़ रुपये रहा.

विदेशी निवेशकों की इस खरीदारी का असर शेयर बाजार पर भी साफ दिखाई दिया. जुलाई के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी 50 दोनों में 2% से ज्यादा की बढ़त दर्ज की गई. इसके अलावा निफ्टी मिडकैप 100 करीब 2% और निफ्टी स्मॉलकैप 100 लगभग 2.5% चढ़ा.
विदेशी निवेशकों ने भारत में फिर निवेश क्यों बढ़ाया?
मार्केट एक्सपर्ट बताते हैं कि भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था, कंपनियों के बेहतर तिमाही नतीजे, महंगाई में कमी और भारतीय रिजर्व बैंक की स्थिर मौद्रिक नीति ने विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है. इसके अलावा, अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करने से भी निवेशकों का विश्वास मजबूत हुआ. भारत को वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स में शामिल किए जाने के कारण विदेशी निवेशकों ने डेट मार्केट में भी निवेश बढ़ाया है.
इन चीजों से बढ़ा निवेशकों का भरोसा
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि हाल के महीनों में AI से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में ऊंचे वैल्यूएशन के कारण बिकवाली देखने को मिली. खासकर दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों में चिप कंपनियों में निवेश का जोखिम बढ़ा है. इसके मुकाबले भारत में ऐसा जोखिम कम है, इसलिए विदेशी निवेशकों का रुझान भारतीय बाजार की ओर बढ़ा. इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी, पिछले चार महीनों में भारतीय बाजार के वैल्यूएशन में सुधार और कंज्यूमर सर्विस, मेटल तथा हेल्थकेयर सेक्टर में बेहतर अवसरों ने भी विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया.
क्या आगे भी जारी रहेगी FPI की खरीदारी?
विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले समय में विदेशी निवेशकों का रुख मुख्य रूप से दो बड़े कारकों पर निर्भर करेगा. पहला, कच्चे तेल की कीमतें. अगर ब्रेंट क्रूड 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहता है, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर माना जाएगा, लेकिन अगर तेल की कीमतें फिर से 100 डॉलर के आसपास पहुंचती हैं, तो इससे महंगाई बढ़ सकती है, रुपये पर दबाव आ सकता है और कंपनियों की कमाई प्रभावित हो सकती है. ऐसी स्थिति में विदेशी निवेशक फिर से भारतीय शेयरों से दूरी बना सकते हैं.
दूसरा बड़ा कारण अमेरिका की ब्याज दरें और AI सेक्टर हैं. अगर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊंची बनी रहती है, तो विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिका में निवेश ज्यादा आकर्षक रहेगा. वहीं, अगर माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन जैसी AI कंपनियां लगातार मजबूत नतीजे देती रहीं, तो विदेशी निवेशक भारतीय बाजार की बजाय AI कंपनियों में ज्यादा पैसा लगा सकते हैं. फिलहाल विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति और स्थिर नीतियां विदेशी निवेशकों का भरोसा बनाए हुए हैं, लेकिन वैश्विक हालात और तेल की कीमतें आगे की दिशा तय करेंगी.


