बच्चों की सेहत और पोषण किसी भी देश के भविष्य की नींव होते हैं, लेकिन हाल ही में जारी की गई केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के नए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण NFHS6 रिपोर्ट ने बच्चों के स्वास्थ्य कल्याण को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। इस रिपोर्ट में देश के अलगअलग राज्यों में बच्चों के विकास में रुकावट , कम वजन और एनीमिया के जो ताजा आंकड़े सामने आए हैं, वे नीतिनिर्माताओं से लेकर आम जनता तक के लिए एक बड़ा रियलिटी चेक हैं। आइए, इस आधिकारिक रिपोर्ट के जरिए विस्तार से समझते हैं कि देश के बच्चों की सेहत का वास्तविक हाल इस वक्त क्या है। गुजरे सालों की तुलना में क्या बच्चों की स्थिति में सुधार हुआ है या स्थिति और बिगड़ी है।

NFHS6 की रिपोर्ट में बच्चों में गंभीर कुपोषण की दर घटी
NFHS6 की रिपोर्ट के मुताबिक तीव्र कुपोषण के सबसे खतरनाक रूप ‘गंभीर वेस्टिंग’ की दर 7.7 प्रतिशत से घटकर 5.2 प्रतिशत हो गई है। इससे बच्चों की मौतों में कमी आने की उम्मीद है। लेकिन कुल वेस्टिंग में बहुत मामूली सुधार हुआ है। यह 19.3 प्रतिशत से घटकर 19 प्रतिशत पर पहुंचा है। इसका मतलब है कि देश में पांच साल से कम उम्र का लगभग हर पांचवां बच्चा अभी भी गंभीर कुपोषण का शिकार है। पूरी रिपोर्ट पर नजर डालने से बच्चों के पोषण की तस्वीर उतनी सकारात्मक नहीं दिखती। राष्ट्रीय स्तर पर सुधार जरूर हुआ है, लेकिन कई बड़े राज्यों में स्थिति बिगड़ी है और बाल पोषण से जुड़े कई अहम संकेतक अब भी चिंता बढ़ाने वाले हैं।
देश का हर तीसरा बच्चा अब भी कम वजन का शिकार
कम वजन वाले बच्चों यानी अंडरवेट की स्थिति में बहुत कम सुधार हुआ है। यह दर 32.1 प्रतिशत से घटकर सिर्फ 31.8 प्रतिशत हुई है। यानी आज भी देश में लगभग हर 3 में से 1 बच्चा कम वजन की समस्या से जूझ रहा है।
कई राज्यों में हालात और चिंताजनक हैं। झारखंड में कम वजन वाले बच्चों की संख्या 39.4 प्रतिशत से बढ़कर 41.1 प्रतिशत हो गई है। उत्तर प्रदेश में बच्चों में वेस्टिंग 17.3 प्रतिशत से बढ़कर 19.2 प्रतिशत हो गई, जबकि कम वजन वाले बच्चों की दर 32.1 प्रतिशत से बढ़कर 34.5 प्रतिशत पहुंच गई। वहीं राजस्थान में वेस्टिंग 16.8 प्रतिशत से बढ़कर 19.8 प्रतिशत और कम वजन वाले बच्चों की दर 27.6 प्रतिशत से बढ़कर 33.3 प्रतिशत दर्ज की गई है। आसान शब्दों में कहें तो देश के कई राज्यों में बच्चों में कुपोषण की समस्या अभी भी गंभीर बनी हुई है और कुछ जगहों पर पहले से ज्यादा खराब हुई है।
बच्चों की हाइट में सुधार
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के नए आंकड़ों के अनुसार, बच्चों की लंबाई से जुड़ी समस्या में सुधार देखने को मिला है। पहले 35.5 प्रतिशत बच्चे अपनी उम्र के हिसाब से अपेक्षित लंबाई से छोटे थे, लेकिन अब यह आंकड़ा घटकर 29.3 प्रतिशत रह गया है। आसान भाषा में कहें तो पहले हर 100 में से लगभग 36 बच्चों की हाइट उनकी उम्र के अनुसार कम थी, जबकि अब यह संख्या घटकर करीब 29 बच्चों तक पहुंच गई है। यह संकेत देता है कि बच्चों के पोषण, देखभाल और स्वास्थ्य सेवाओं में पहले की तुलना में सुधार हुआ है।
बच्चों को नहीं मिल रहा पर्याप्त पोषण
रिपोर्ट के मुताबिक 6 से 23 महीने की उम्र के केवल 15.3 प्रतिशत बच्चों को ही उनकी जरूरत के अनुसार पर्याप्त और संतुलित आहार मिल पा रहा है। यह आंकड़ा पहले के 11 प्रतिशत से बेहतर जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि इस अहम उम्र के 10 में से 8 से अधिक बच्चे सही पोषण से वंचित हैं। राजस्थान में केवल 8.7 प्रतिशत और बिहार में 11.9 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त आहार मिल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की लंबाई में सुधार के बावजूद भोजन की गुणवत्ता में कमी भविष्य में नई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकती है।
स्तनपान में गिरावट बढ़ा रही चिंता
रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंता शिशुओं को केवल मां का दूध पिलाने की घटती दर को लेकर जताई गई है। छह महीने से कम उम्र के बच्चों में यह दर 63.7 प्रतिशत से घट कर 55.8 प्रतिशत रह गई है। उत्तर प्रदेश में स्थिति और ज्यादा चिंताजनक है, जहां यह दर 59.7 प्रतिशत से घट कर 34.6 प्रतिशत पर पहुंच गई है। झारखंड और राजस्थान में भी इसमें उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। वहीं, केरल ने बेहतर प्रदर्शन करते हुए इस दर को 55.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 72.7 प्रतिशत तक पहुंचा दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या अस्पताल में प्रसव की कमी से नहीं, बल्कि प्रसव के बाद माताओं को स्तनपान से जुड़ी सही सलाह और सहयोग न मिलने से जुड़ी है। मां का दूध शिशु के लिए सबसे पौष्टिक और सुरक्षित आहार माना जाता है। यह न सिर्फ बच्चे को बीमारियों से बचाता है, बल्कि उसकी जीवित रहने की संभावना भी बढ़ाता है। ऐसे में कुपोषण से जूझ रहे राज्यों में स्तनपान की घटती दर एक गंभीर चेतावनी मानी जा रही है।
टीकाकरण में हुआ सुधार
बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों में टीकाकरण को लेकर प्रगति देखने को मिली है। देश में पूर्ण टीकाकरण प्राप्त करने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है और इसका कवरेज 83.8 प्रतिशत से बढ़कर 87.1 प्रतिशत हो गया है। इसका मतलब है कि अब पहले की तुलना में अधिक बच्चे गंभीर बीमारियों से बचाव के लिए जरूरी सभी टीके प्राप्त कर रहे हैं। सबसे बड़ा सुधार रोटावायरस वैक्सीन में दर्ज किया गया है। इस वैक्सीन का कवरेज 36.4 प्रतिशत से बढ़कर 85.4 प्रतिशत तक पहुंच गया है। रोटावायरस बच्चों में गंभीर दस्त की प्रमुख वजहों में से एक है, इसलिए इस टीके की बढ़ती पहुंच को बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये आंकड़े दर्शाते हैं कि राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम की पहुंच मजबूत हुई है और देश के अधिक से अधिक बच्चों तक जीवन रक्षक टीके पहुंच रहे हैं।
सुधार के साथ चुनौतियां भी बरकरार
NFHS6 के आंकड़े बताते हैं कि भारत ने बच्चों की लंबाई से जुड़ी समस्या को कम करने में अच्छी प्रगति की है। हालांकि बच्चों में कम वजन, कुपोषण, संतुलित आहार की कमी और स्तनपान की घटती दर जैसी समस्याएं अभी भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इन समस्याओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य में हो रहा सुधार धीमा पड़ सकता है। इसलिए सिर्फ कुपोषण कम करने पर ही नहीं, बल्कि बच्चों को बेहतर भोजन और सही देखभाल उपलब्ध कराने पर भी जोर देने की जरूरत है।
डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध रिपोर्ट और सार्वजनिक आंकड़ों पर आधारित है। किसी भी नीति या स्वास्थ्य संबंधी निर्णय के लिए आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों और विशेषज्ञ सलाह को प्राथमिकता दें।



